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नीतीश चाहें तो पकड़ ले नई राह, लेकिन भाजपा नहीं देगी बड़े भाई का दर्जा

Sat, 07 Jul 2018 05:09 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Updated Sat, 07 Jul 2018 05:09 PM IST
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Nitish kumar may consider mahagathbandhan or bjp

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नई दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी को संबोधित करने तथा अपने 22 राज्यों के नेताओं का मन टटोलने आ रहे हैं, लेकिन इन सब राजनीतिक पहल के बाद भी भाजपा उन्हें बड़े भाई का दर्जा नहीं देने वाली। भाजपा के उच्चपदस्थ सूत्र बताते हैं कि लोकसभा चुनाव 2019 के बाबत अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता। अंदरखाने से एक खबर यह भी है कि नीतीश कुमार कम से कम 15 सीटें जद(यू) के लिए चाहते हैं, लेकिन उनकी यह मांग पूरी कर पाना भाजपा के पैर का पसीना सिर पर चढ़ाने जैसा है।

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2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बिहार की 40 सीटों में से 22 मिली थी। दो पर जद(यू) के उम्मीदवार चुनाव जीते थे। यह चुनाव शरद यादव और नीतीश कुमार की जद(यू) ने अकेले दम पर लड़ा था। जबकि भाजपा ने राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और कुशवाहा की रालोसपा के साथ मिलकर लड़ा था। लोजपा को छह और रालोसपा को तीन सीटें मिली थी। ऐसे में भाजपा के ऊपर अपने दोनों सहयोगियों की क्रमश: छह और तीन सीटों को तालमेल में देने का नैतिक दबाव है। सूत्र का कहना है कि 22, छह और तीन मिलाकर 31 सीटें होती हैं। इन्हें बनाए रखने का नैतिक दबाव सा है।
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भाजपा से जुड़े राजनीतिक प्रेक्षकों का एक तर्क और है। उनका कहना है कि यदि राज्य में भाजपा 25 सीटों पर चुनाव लड़ती है तो वह सरकार विरोधी लहर का सामना करने के बाद भी 12-14 सीट जीत सकती है। यदि वह 31 सीट पर लड़ती है तो 14-16 सीटें उसके खाते में आ सकती है। ऐसे में भाजपा के सामने बड़ा सवाल है कि वह सीटों की संख्या घटाए या बढ़ाए। माना यह जा रहा है कि भाजपा जद(यू) को अधिकतम आठ से नौ सीट पर चुनाव लडऩे का अंतिम प्रस्ताव दे सकती है। यदि जद(यू) इस पर सहमत है तो ठीक अन्यथा दूसरे विकल्प पर विचार कर सकती है।
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नीतीश कुमार को चुनना होगा

भाजपा के शीर्ष नेता का मानना है। उनका कहना है कि राजद और कांग्रेस का साथ छोडक़र जद(यू) के नेता नीतीश कुमार भाजपा के साथ आए हैं। भाजपा ने जद(यू) के साथ मिलकर सरकार बनाई है। यह नीतीश कुमार को महसूस करना चाहिए कि भाजपा के साथ वह अच्छे वातावरण में सरकार चला रहे हैं। इसलिए यह उन्हें तय करना है कि किसके साथ रहना है। उसके साथ जहां न्यूसेंस कम है या फिर वहां जहां से न्यूसेंस का खतरा ज्यादा है। पार्टी के शीर्ष नेताओं में से एक के मुताबिक पार्टी का रुख साफ है। भाजपा अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के साथ सहयोगियों को उचित सम्मान देकर उनका साथ बनाए रखना चाहती है। इसके आगे जद(यू) के नेतृत्व को तय करना है।

क्यों हड़बड़ी में हैं नीतीश?

बिहार के मुख्यमंत्री जद(यू) के हित की रक्षा को लेकर चिंतित हैं। जद(यू) का अब वह इकलौता चेहरा हैं। 2013 में उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए से अलग होने का फैसला किया था। लोकसभा चुनाव भी अपने चेहरे और पार्टी के बूते पर लड़े थे। महज दो सीट जीत पाने पर बिहार के मुख्यमंत्री पद से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिए थे। इसके बाद बिहार विधानसभा चुनाव में सामने खड़ी चुनौती देखकर राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन का हिस्सा बने। चुनाव में महागठबंधन को सफलता मिली।

पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, लेकिन अधिक दिनों तक नहीं चल पाई। पिछले साल नीतिश कुमार ने नाता तोड़ लिया और जद(यू) फिर एनडीए में शामिल हो गया। इसको लेकर जद(यू) दो फाड़ हो गई। पार्टी के वरिष्ठ नेता, जद(यू) के संस्थापकों में से एक तथा समता पार्टी में अपने दल का विलय करने वाले शरद यादव का गुट नीतीश कुमार के इस निर्णय के खिलाफ बागी हो गया। अब लोकसभा चुनाव में जद(यू) का मान-सम्मान, प्रभाव नीतीश कुमार के लिए नाक का सवाल बन गया है। राम विलास पासवान की लोजपा और उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा के सामानांतर गठबंधन में दहाई के आस-पास की सीटें किसी बड़े अपमान से कम नहीं लग रही है।

आगे कुआं, पीछे खाई

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास तीन विकल्प हैं। पहला यह कि वह ठीक ठीक सीटें पाने का राजनीतिक दबाव बनाकर एनडीए के साथ 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ें। दूसरा विकल्प, एनडीए से अलग होकर यूपीए या महागठबंधन में शामिल होने का प्रयास करें। तीसरा विकल्प भी है। वह बिहार में कुछ अन्य छोटे दलों या फिर विकल्प का सहारा लेकर जद(यू) की प्रमुखता बनाए रखकर चुनाव में उतरें। लेकिन तीनों ही विकल्पों में आगे कुआं, पीछे खाई जैसी स्थिति है। उपचुनावों में हार ने भी बिहार में उनके राजनीतिक प्रभाव तथा अल्पसंख्यक वर्ग पर पकड़ को लेकर कई सवाल खड़े किए थे।


ऐसे में पहले विकल्प को लेकर एनडीए में बने रहने के लिए कम सीटों से समझौता और इसके बदले में चलने वाले राजनीतिक टांट को झेलने, प्रोफाइल के कमजोर होते जाने का खतरा। महागठबंधन का हिस्सा बनने में राजद, शरद यादव, जीतन राम मांझी के अवरोध तथा राजनीतिक टांट(पलटू राम) से पार पाना। खुद की छवि के और कमजोर होते का खतरा। इसी तरह से तीसरे विकल्प में कम सीटें जीतने जैसे भविष्य के हालात। कुल मिलाकर नीतीश कुमार के सामने चुनौती काफी जटिल है। राजनीति के चतुर खिलाड़ी शरद यादव महा गठबंधन से जद(यू) के अलग होने के दौरान इसी स्थिति के आगे आने का ईशारा भी कर रहे थे।

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