फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   New Education Policy 2020, Experts Are Thinking About Its Implementation, It Should Not Be Just A Jumla

केवल ‘जुमला’ न साबित हो शिक्षा नीति 2020, लागू करने को टेढ़ी खीर मान रहे हैं विशेषज्ञ

Mon, 03 Aug 2020 08:34 AM IST
योगेश साहू अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Mon, 03 Aug 2020 08:34 AM IST
सार

  • वर्तमान में जीडीपी का 4.14 फीसदी खर्च करती है सरकार, योजना पर जीडीपी का 6 फीसदी खर्च करना बड़ा लक्ष्य   
  • शिक्षा नीति के प्रावधानों से सहमत लोग भी मान रहे, संसाधन जुटाना भारी चुनौती  

विज्ञापन
New Education Policy 2020, Experts Are Thinking About Its Implementation, It Should Not Be Just A Jumla
छात्र-छात्राएं (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

विस्तार

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 (National Education Police, 2020) की घोषणा हो चुकी है। इसमें सभी बच्चों को अनिवार्य तौर पर स्कूल तक पहुंचाने, स्कूल से निकलने वाले हर छात्र के हाथ में कम से कम एक रोजगार होने और देश को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनाने का बारीक खाका खींचा गया है।

विज्ञापन


इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने का बड़ा वादा भी किया गया है। लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस नीति में दावे तो बहुत बड़े किए गये हैं, लेकिन इस बात की कोई जानकारी नहीं दी गई है कि जिस देश में सभी स्कूलों को अब तक पक्की छत तक उपलब्ध न कराई जा सकी हो, लाखों विद्यालय केवल एक शिक्षक के सहारे चलते हों, वहां इतने बड़े लक्ष्य को हासिल कैसे किया जाएगा। आर्थिक संसाधन जुटाने पर भी शिक्षा नीति पूरी तरह मौन है। ऐसे में आशंका है कि कहीं यह बड़ा दावा एक और जुमला साबित होकर न रह जाए।       
विज्ञापन


कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने रविवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि यूपीए-2 के अंतिम वर्ष में शिक्षा पर जीडीपी का 4.14 प्रतिशत खर्च किया गया था, लेकिन वर्तमान सरकार ने इस खर्च को लगातार घटाया और अब यह केवल 3.2 प्रतिशत रह गया है। कोरोना के कारण आई आर्थिक मंदी में संसाधनों की कमी के माहौल में इसके और अधिक कमी आने की आशंका जताई जा रही है। इस प्रकार सरकार की कथनी और करनी में बड़ा फर्क साफ दिखाई पड़ रहा है।  
विज्ञापन
विज्ञापन


कांग्रेस नेता और अर्थशास्त्री गौरव वल्लभ कहते हैं कि सरकार ने उच्च शिक्षा में प्रवेश न्यूनतम 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य तय किया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस शिक्षा नीति से पढ़कर निकले छात्र बाजार की चुनौतियों के लिए कितने सक्षम होंगे। यहां इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि शिक्षा की गुणवत्ता पर एएसईआर की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले 50 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा की पुस्तक भी नहीं पढ़ पाते।

इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि पांचवीं कक्षा तक के 72 प्रतिशत बच्चे दूसरी कक्षा के सवाल भी हल नहीं कर पाते। एम्प्लॉयमेंट सर्वे के मुताबिक 80 प्रतिशत इंजीनियर किसी नौकरी के योग्य नहीं हैं। ऐसे में केवल छात्रों को ऑनलाइन या पत्राचार के माध्यम से डिग्री देना आसान है, लेकिन उनकी शिक्षा की गुणवत्ता कैसे तय की जाएगी, सरकार को इस बारे में ज्यादा स्पष्ट विचार रखना चाहिए।  

ऑनलाइन शिक्षा का बड़ा सपना
केंद्र सरकार ने सौ प्रतिशत नामांकन के लिए ऑनलाइन और पत्राचार के जरिए शिक्षा देने का विचार किया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि देश में इंटरनेट और कंप्यूटर की पहुंच समाज के बड़े तबके तक नहीं है। यहां तक कि सरकार के स्कूलों तक में इनकी उपलब्धता आज तक नहीं सुनिश्चित हो सकी है। ऐसे में सबको ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा देने की बात कल्पनात्मक ज्यादा और यथार्थ कम लगती है।   

यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन ऑन स्कूल एजुकेशन, स्कूल शिक्षा विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक केवल 9.85 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में ही कंप्यूटर है और केवल 4.09 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट पहुंच पाया है। ऐसे में सरकार यह लक्ष्य कैसे पूरा करेगी, यह विचार किया जाना चाहिए।   

उच्च शिक्षा में आरक्षण क्यों नहीं?
दलित महिला कांग्रेस अध्यक्ष ऋतु चौधरी कहती हैं कि यूपीए सरकार ने समाज के सभी वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए समुचित व्यवस्था की थी। उच्च शिक्षा में दलितों/महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए उन्हें उच्च शिक्षा में आरक्षण दिया गया था। लेकिन वर्तमान शिक्षा नीति दलित, अल्पसंख्यक और महिलाओं को शिक्षा में आरक्षण देने के मामले पर मौन है। 

‘जामिया-जेएनयू में जो हुआ वह क्या था’
ऋतु चौधरी कहती हैं कि नई शिक्षा नीति में स्वतंत्र और तार्किक सोच को विकसित करने पर बल दिया गया है। लेकिन इसी सरकार के कार्यकाल में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय सहित अनेक विश्वविद्यालयों में छात्रों की स्वतंत्र सोच को कुचलने का प्रयास किया गया है। रोहित वेमुला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया गया है, ऐसे में इस बात की कल्पना कैसे की जा सकती है कि इसी सरकार की शिक्षा नीति में स्वतंत्र और तार्किक सोच को बढ़ावा दिया जाएगा? 

‘सरकार के इरादे ठीक नहीं’
उन्होंने कहा कि सरकार उच्च शिक्षा को बोर्ड ऑफ गवर्नर के जरिए संचालित करने की बात कह रही है। अब तक के अनुभव से क्या इस बात की आशंका नहीं बनती’ है कि इस बोर्ड में केवल एक विशेष विचारधारा को मानने वाले लोग होंगे और उसके सहारे देश को हांकने की कोशिश की जाएगी। उन्होंने कहा कि इस शिक्षा मॉडल को लागू करने के पहले संसद में बहस तक का इंतजार नहीं किया गया जो इस बात की तरफ साफ इशारा करता है कि सरकार के इरादे ठीक नहीं हैं और इसके जरिये देश के भगवाकरण की तैयारी की जा रही है। 

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के भरोसे सरकार
नई शिक्षा नीति में सबसे बड़ा बदलाव तीन साल से छह साल की उम्र के छोटे बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए औपचारिक शिक्षा में प्रवेश कराने को लेकर माना जा रहा है। लेकिन क्या आंगनबाड़ी केंद्र इसके लिए दक्ष हैं? आंगनबाड़ी केंद्रों की शुरूआत शिक्षा से वंचित बच्चों को कुछ ज्ञान देने के साथ-साथ उन्हें कुपोषण से बचाने के लिए की गई थी।

आंगनबाड़ी केंद्रों के कार्यकर्ताओं और उनके सहायकों को क्रमशः 4500 रुपये और 2250 रुपये मासिक मानदेय दिया जाता है। वे शिक्षण कार्य में भी दक्ष नहीं होते। ऐसे में उनसे इस बात की उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे देश के बच्चों की शिक्षा नींव बेहतर ढंग से रख सकेंगे।

सरकार ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को छह महीने का डिप्लोमा देकर उन्हें इसके लिए दक्ष बनाने का लक्ष्य तय किया है। लेकिन इस तरह दक्ष अध्यापक की कमी को पूरा नहीं किया जा सकता।  

दिसंबर 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 3 लाख 62 हजार 940 आंगनबाड़ी केंद्रों में शौचालय की सुविधा तक नहीं है और एक लाख 59 हजार 568 केंद्रों में पीने के लिए साफ जल तक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इन केंद्रों के सहारे देश के करोड़ों बच्चों को उचित शिक्षा देने के दावे पर सवाल उठना स्वाभाविक है।   

शिक्षकों की भारी कमी
प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक, मेडिकल से लेकर इंजीनियरिंग तक हर जगह शिक्षकों की कमी है। अनेक प्राथमिक विद्यालय केवल एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। 3 जुलाई 2018 तक देश में 10 लाख अध्यापकों की कमी थी। आर्थिक संसाधनों की कमी के चलते नई नियुक्तियां लगातार टाली गईं और वर्तमान समय में यह कमी और अधिक बढ़ चुकी है। ऐसे में यह कैसे संभव हो पाएगा कि सरकार अचानक से देश में शिक्षकों की सारी कमी पूरी कर दे।

निजीकरण हर समस्या का हल
दिल्ली विश्वविद्यालय एकेडेमिक काउंसिल के सदस्य राजेश झा कहते हैं कि इसी सरकार ने चंद दिनों पहले सभी विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थाओं को अपने स्तर पर बाजार से फंड की व्यवस्था करने के निर्देश दिए थे। यह साबित करता है कि उसके पास उच्च शिक्षण संस्थानों का खर्च उठाने की हालत नहीं रह गई है। ऐसे में अचानक सरकार के पास इतना धन कहां से आएगा कि वह जीडीपी का 6 फीसदी खर्च करते हुए इतना बड़ा लक्ष्य हासिल कर ले। उन्होंने कहा कि इन चीजों को देखकर सरकार के दावों पर यकीन करना कठिन है।      

बड़ा लक्ष्य, लंबा समय
वहीं नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट के अध्यक्ष एके भागी कहते हैं कि सरकार ने इस लक्ष्य को इसी वर्ष हासिल करने का लक्ष्य नहीं निर्धारित किया है। इसके लिए 15 वर्ष की समय सीमा निर्धारित की गई है। वर्तमान में भी सरकार शिक्षा पर जीडीपी का चार प्रतिशत से अधिक खर्च करती है। ऐसे में 15 वर्षों की समय सीमा में 6 प्रतिशत का लक्ष्य बहुत बड़ा नहीं है। यह लक्ष्य तो 1964 में ही तय किया गया था। इसलिए अगर सरकार के इरादे सही हैं तो इसे हासिल करने में बड़ी मुश्किल नहीं आने वाली। 


उन्होंने कहा कि शुरुआती पांच साल की शिक्षा इस अर्थ में बहुत महत्वपूर्ण है कि इससे अवैध प्ले स्कूलों को एक ढांचे के अंतर्गत लाया जा सकेगा। शिक्षकों की पक्की नियुक्ति से तदर्थ शिक्षकों को भारी राहत मिलेगी।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed