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ट्रेड फेयर : स्वरोजगार के लिए पार की दहलीज, 100 से अधिक महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर

Wed, 23 Nov 2022 04:27 AM IST
वीरेंद्र शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: वीरेंद्र शर्मा Updated Wed, 23 Nov 2022 04:27 AM IST
सार

ट्रेड फेयर में डेढ़ सौ से ज्यादा एसएचजी समूह की महिलाएं अपने सामानों के साथ आई हैं, जिन्होंने समाज व घर परिवार की तमाम बंदिशें तोड़कर आत्मनिर्भर बनने का फैसला लिया।

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new delhi more than 150 women from SHG groups have come with their goods in the trade fair
सांकेतिक तस्वीर

विस्तार

ट्रेड फेयर में डेढ़ सौ से ज्यादा एसएचजी समूह की महिलाएं अपने सामानों के साथ आई हैं, जिन्होंने समाज व घर परिवार की तमाम बंदिशें तोड़कर आत्मनिर्भर बनने का फैसला लिया। कश्मीर घाटी की अफरोजा इनमें से एक हैं, जिन्होंने संघर्ष के साथ सफलता की इबारत लिखी। वह बचपन से सिलाई कढ़ाई में माहिर हैं। इस हुनर को स्वरोजगार में बदलने के लिए उन्होंने घर की दहलीज पार करने का निर्णय लिया तो गांव वालों ने उन्हें बदनाम किया। बेहतर काम के लिए उन्हें कमला देवी पुरस्कार से नवाजा गया। यह पुरस्कार लेने दिल्ली आईं, तो यह उनके तलाक की वजह बन गई।
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अफरोजा बारामूला जिले के पटनवारपुरा गांव में 100 महिलाओं के सहयोग से पश्मीना शॉल, शूट, जैकेट, साड़ी, दुपट्टे और कुर्ते इत्यादि बनाती हैं। उनके सामान को ट्रेड फेयर में हॉल सात ए बी सी में खरीदा जा सकता है। उन्होंने बताया कि ट्रेड फेयर में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली आना था तो उनके समूह की कोई भी महिला सदस्य इसके लिए तैयार नहीं थी। तब अफरोजा ने कहा कि मैं तो पहले से बदनाम हूं, सामान लेकर दिल्ली ट्रेड फेयर मैं ही जाऊंगी। क्योंकि किसी सदस्य की अभी शादी नहीं हुई तो किसी का पति उन्हें दिल्ली भेजने को तैयार नहीं था। अफरोजा 2004 से स्थानीय कारीगर के साथ जुड़कर सुई और आरी वर्क का काम करती थीं। इनके पिता, भाई और पांच बहने भी यही काम करते हैं।
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अफरोजा ने 2005 में एक बेहतर साड़ी बनाई, जिसके लिए दिल्ली में उन्हें कमला देवी पुरस्कार सेे सम्मानित किया गया। उन्होंने बताया कि पुरस्कार लेकर जब वह कश्मीर लौटीं। इसके बाद से ही गांव के लोगों ने उनके बारे में बातें बनानी शुरू कर दीं कि यह तो दिल्ली घूम रही है। उनके घर वालों को परेशान किया जाने लगा। उनकी शादी में रुकावट पैदा की। किसी तरह पिता ने 2008 में उनकी शादी की। इनके दो बच्चे भी हुए, लेकिन उन्होंने बच्चों की परवरिश के साथ अपना काम जारी रखा।
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2018 में अपना एसएचजी बनाया
अफरोजा ने 2018 में रोज स्वयं सहायता समूह बनाया। समूह में अन्य महिलाओं को जोड़ा और समूह के नाम से बैंक से दो लाख रुपये का लोन लेकर कपड़े बनाने का काम शुरू किया। बाद में किसान लोन लेकर काम को और मजबूत किया। अब उनके ग्रुप में 100 महिलाएं काम कर रही हैं और जो कि अब आत्मनिर्भर हैं।

दिल्ली आने की बात पर पति ने दिया तलाक 
अफरोजा 2014 में छत से गिर गईं, उनकी कमर में गंभीर चोट आई और वह चलने फिरने में असमर्थ हो गईं। डॉक्टर ने सर्जरी करने की सलाह दी थी, लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वह सर्जरी नहीं करा पाईं। करीब एक साल बाद वह फिर से धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ी हो पाईं और किसी के सहारे चलने फिरने लगीं। थोड़े दिनों बाद उन्होंने अपना काम फिर से शुरू कर दिया। लेकिन उनके पति को अब उनका घर से बाहर निकलना पसंद नहीं था। अफरोजा बताती हैं कि आए दिन वह दिल्ली जाने वाली बात को लेकर उनसे झगड़ा करते। आखिरकार 2016 में उन्होंने तलाक दे दिया। 



विनीता की भी संघर्ष से सफलता की कहानी
ट्रेड फेयर में मध्य प्रदेश के शिवपुरी की एसएचजी विनीता यादव की अफरोजा जैसी संघर्ष से सफलता की कहानी है। इनके पति की मौत के बाद सास ससुर ने तीन बच्चों के साथ उन्हें घर से निकाल दिया। इन्होंने गद्दे महाराज नाम के समूह से जुड़कर काम किया और मौजूदा समय वह पापड़, आंवले की कैंडी, चटनी, तेल, अमावट, मल्टी ग्रेन, कैंडी इत्यादि बनाकर मेले में आई हैं।
 
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