Netaji Subhash Chandra Bose: भारत की आजादी के लिए नेताजी ने सोवियत नेताओं से मांगी थी मदद, 1939 में लिखा था खुफिया पत्र
देश को आजाद कराने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इस काम में मदद के लिए सोवियत यूनियन के नेताओं को खुफिया पत्र भी लिखा था।
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महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज 125वीं जयंती है। 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' का वादा करने वाले नेताजी का नाम देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा है। उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को बंगाल के एक संपन्न परिवार में हुआ था। देश को दासता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन भारत माता के नाम कर दिया। संघर्ष के दिनों में उन्होंने देश की आजादी के लिए उन्होंने सोवियत नेताओं से भी मदद मांगी थी और उन्हें खुफिया पत्र लिखा था।
नेताजी ने भतीजे आमिया बोस को भारत की आजादी में मदद की मांग करने वाला एक खुफिया पत्र सोवियत नेताओं तक पहुंचाने का काम दिया था। यह पत्र अक्तूबर 1939 में यानी द्वितीय विश्व युद्ध से बमुश्किल एक महीने पहले ब्रिटेन में एजेंटों तक पहुंचाया जाना था। आमिया जब ब्रिटेन पहुंचे तो न्यू स्कॉटलैंड यार्ड के अधिकारियों ने उनकी तलाशी भी ली थी लेकिन वह पत्र ले जाने में सफल रहे थे। इनमें से एक पत्र भारतीय मूल की ब्रिटिश कम्युनिस्ट नेता रजनी पालमी दत्त और एक पत्र एक सोवियत एजेंट को दिया गया था।
नेताजी ने 1939 में अमिया को कैंब्रिज से भारत बुलाया था
समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक साक्षात्कार में आमिया बोस की बेटी माधुरी बोस ने कहा, 'मेरे पिता बताते थे कि उनके चाचा ने उन्हें मई 1939 में कैंब्रिज से भारत बुलाया था और एक रूसी अभियान पर जाने के लिए कहा था। उनके पिता को इस बात की जानकारी थी लेकिन उनकी माता को इस बारे में कुछ नहीं पता था। उन्हें उनके ओवरकोट की जेब में संदेश ले जाने के लिए कहा गया था।'
माधुरी के अनुसार आमिया बोस ने नेताजी से कहा था कि अगर में पकड़ा गया तो आपको निश्चित तौर पर फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा। इस पर नेताजी ने जवाब दिया था कि मैं यह खतरा मोल लेने के लिए खुशी-खुशी तैयार हूं। माधुरी ने 'दि बोस ब्रदर्स' नामक किताब भी लिखी है।
सोली बाटलीवाला ने किया था नेताजी की योजना का समर्थन
सुभाष चंद्र बोस ने सोवियत रूस की सरकार से संपर्क बनाने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) के साथ भी बैठकें की थीं। माधुरी बताती हैं कि ऐसी ही एक बैठक में सीपीआई का प्रतिनिधित्व करने वाले सोली बाटलीवाला ने भी नेताजी बोस की इस योजना का समर्थन किया था। बाटलीवाला के एक हस्तलिखित नोट के अनुसार नेताजी ने उनसे कहा था कि मेरी रणनीति और सुझाव यह है कि हम आजादी के लिए भारत में बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन शुरू करेंगे और इसी दौरान सोवियत रूस उत्तर की ओर से आगे बढ़ेगा।
सोवियत रूस पर नेताजी सुभाष ने जताया था विश्वास
नेताजी ने बाटलीवाला से यह भी कहा जाता है कि इस बात को लेकर सोवियत रूस पर भरोसा किया जा सकता है कि वह स्थिति का लाभ नहीं उठाएगा और देश पर कब्जा करने की कोशिश नहीं करेगा। सीपीआई ने इस योजना का समर्थन तो नहीं किया था लेकिन इस बात पर सहमति जताई थी कि यह संदेश मास्को तक पहुंच जाए। इसी को लेकर तय हुआ कि सुभाष चंद्र बोस अमिया बोस के जरिए सोवियत रूस के साथ सीधे संवाद करेंगे।
खुफिया अधिकारियों की मानसिकता अच्छे से समझते थे नेताजी
अमिया नेताजी का संदेश लेकर एक समुद्री जहाज के जरिए ब्रिटेन के पूल पोर्ट पहुंचे थे। यहां पर उनसे करीब तीन घंटे तक पूछताछ की गई थी और उनके पूरे सामान की तलाशी ली गई थी। ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके दाढ़ी बनाने के सामान वाले डिब्बे तक को नहीं छोड़ा था लेकिन अमिया बोस के ओवरकोट की तलाशी उन्होंने नहीं ली, जिसकी जेब में यह खुफिया पत्र रखे हुए थे। अमिया बोस ने बाद में इसे लेकर कहा था कि नेताजी को स्पष्ट तौर पर खुफिया अधिकारियों की मानसिकता के बारे में बहुत अच्छी समझ थी।
सोवियत सरकार की ओर से नहीं आया पत्र का कोई जवाब
इसके बाद अमिया बोस ने रजनी पालमी दत्त से संपर्क किया जो ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी की तत्कालीन सचिव थे। दत्त को अमिया ने एक पत्र दिया। इसके बाद दत्त ने अमिया के लिए ब्रिस्टल होटल में एक सोवियत एजेंट से मिलने की व्यवस्था की। यहां अमिया ने सोवियत नेतृत्व को संबोधित एक पत्र उस एजेंट को दिया। माधुरी बताती हैं कि सोवियत यूनियन की ओर से इस पत्र का कोई जवाब नहीं आया। मेरे पिता कहा करते थे कि जिस दिन सोवियत दस्तावेजों का पूरी तरह खुलासा होगा तब वह पत्र भी सबके सामने आएगा।