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NCP Split: एनसीपी में विवाद पर क्या जब्त होगा चुनाव चिह्न, पहले किन पार्टियों का छिना निशान? जानें नियम

Fri, 07 Jul 2023 07:36 PM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Fri, 07 Jul 2023 07:36 PM IST
सार

जब भी पार्टियां टूटती हैं तो उनके चुनाव चिह्न पर दावे को लेकर विवाद उत्पन्न होने की संभावना रहती है। चुनाव आयोग प्रतीक आदेश, 1968 का उपयोग करते हुए मामले पर निर्णय देता है। चुनाव आयोग के पास किसी राजनीतिक दल में इसके अधिकार से जुड़े विवाद पर चुनाव चिह्न को जब्त करने की शक्ति है। 
 

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NCP Split: will election commission freeze NCP election symbol, here are the rules
लड़ाई चुनाव चिह्न की - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

महाराष्ट्र की सियासत में अजित पवार की बगावत के बाद सरगर्मी तेज हो गई है। पार्टी में फूट के बाद शुरू हुई लड़ाई अब एनसीपी पर अधिकार पर आ गई है। दरअसल, निर्वाचन आयोग में अजित पवार की ओर से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और उसके चिह्न पर दावा करने वाली याचिका दायर की गई है। वहीं, शरद पवार खेमे ने भी आयोग के समक्ष एक कैविएट दायर किया है। इस रस्साकशी के बीच चुनाव आयोग पार्टी के चुनाव चिह्न को जब्त कर सकता है। हालांकि, अक्तूबर 2022 में शिवसेना के साथ भी यही हुआ था, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का एक धड़ा टूटकर एनडीए में आ गया था। 
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इन घटनाक्रमों के बीच जानना जरूरी है कि चुनाव चिह्न जब्त करने का नियम क्या है? चुनाव आयोग कैसे तय करता है कि चुनाव चिह्न किसे मिलेगा? उस गुट का क्या होता है जिसे मूल पार्टी का चिह्न नहीं मिलता? अब तक कितने दलों के चुनाव चिह्न जब्त किए जा चुके? आइए जानते हैं...
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NCP Split: will election commission freeze NCP election symbol, here are the rules
Election Commission of India - फोटो : Social Media
चुनाव चिह्न जब्त करने का नियम क्या है?
जब भी पार्टियां टूटती हैं तो उनके चुनाव चिह्न पर दावे को लेकर विवाद उत्पन्न होने की संभावना रहती है। ईसीआई प्रतीक आदेश, 1968 के पैरा 15 का उपयोग करते हुए मामले पर निर्णय देता है। चुनाव आयोग के पास किसी राजनीतिक दल में इसके अधिकार से जुड़े विवाद पर चुनाव चिह्न को जब्त करने की शक्ति है। ईसीआई को 1968 के आदेश के तहत राजनीतिक दलों को पहचान देने और चिह्न आवंटित करने का भी अधिकार है। 

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मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार। - फोटो : Social Media
चुनाव आयोग कैसे तय करता है कि चुनाव चिह्न किसे मिलेगा?
1968 के आदेश का पैरा 15 कहता है, 'जब आयोग संतुष्ट हो जाता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में प्रतिद्वंद्वी वर्ग या समूह बन गए हैं और दोनों ही दल पर दावा कर रहे हैं। तब आयोग मामले के सभी उपलब्ध तथ्यों, परिस्थितियों को ध्यान में रखकर और उनके प्रतिनिधियों या सुनवाई के इच्छुक अन्य व्यक्तियों को सुनने के बाद निर्णय ले सकता है। यह निर्णय ऐसे सभी प्रतिद्वंद्वी वर्गों या समूहों पर बाध्यकारी होगा।'

यह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय और राज्य पार्टियों (जैसे शिवसेना या एलजेपी) के विवादों पर लागू होता है, लेकिन इनके अलावा अन्य पार्टियों में विवाद पर ईसीआई आमतौर पर प्रतिद्वंद्वी गुटों को अपने मतभेदों को आंतरिक रूप से सुलझाने या अदालत का दरवाजा खटखटाने की सलाह देता है। हालांकि, 1968 से पहले चुनाव आयोग चुनाव संचालन नियम, 1961 के तहत अधिसूचनाएं और कार्यकारी आदेश जारी करता था। 
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चुनाव आयोग (फाइल फोटो)
उस समूह का क्या होता है जिसे मूल पार्टी का प्रतीक नहीं मिलता?
चुनाव आयोग ने एक नया नियम पेश किया जिसके तहत पार्टी के अलग हुए समूह (उस समूह के अलावा जिसे पार्टी का प्रतीक मिला है) को खुद को एक अलग पार्टी के रूप में पंजीकृत करना होगा। इसके साथ ही गुट केवल पंजीकरण के बाद राज्य या आम चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर राष्ट्रीय या राज्य पार्टी का दर्जा पाने का दावा कर सकता है। 

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एनसीपी पर खींचतान। - फोटो : अमर उजाला
अब जानते हैं एनसीपी का मामला क्या है?
बीते रविवार को महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा उलटफेर हुआ, जब अजित पवार ने एनसीपी से बगावत कर दी। पार्टी में फूट के बाद एनसीपी पर अधिकार पर चाचा-भतीजे आमने-सामने हैं। अजित पवार गुट ने चुनाव आयोग में हलफनामा दायर किया है। वहीं, शरद पवार खेमे ने भी चुनाव आयोग में एक कैविएट दायर कर अनुरोध किया है कि पार्टी की लड़ाई के संबंध में कोई भी निर्देश पारित करने से पहले उनकी बात सुनी जाए। 

सूत्रों का कहना है कि चुनाव आयोग आने वाले दिनों में इन आवेदनों पर कार्रवाई कर सकता है। इसके लिए वह दोनों पक्षों से उसके समक्ष प्रस्तुत संबंधित दस्तावेजों का आदान-प्रदान करने के लिए कह सकता है।

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एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे - फोटो : सोशल मीडिया
एक साल पहले शिवसेना में हुई अधिकार की जंग 
जून 2022 में शिवसेना में बगावत के महीनों बाद पार्टी के प्रतीक और नाम पर नियंत्रण को लेकर एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के बीच अदालती लड़ाई शुरू हुई थी। महाराष्ट्र में एक मान्यता प्राप्त राज्य पार्टी शिवसेना के उद्धव और शिंदे गुट 'असली' शिवसेना के रूप में मान्यता के लिए खींचतान में लगे हुए थे। जिसके बाद अक्तूबर 2022 में एक अंतरिम आदेश में चुनाव आयोग ने अस्थायी रूप से शिवसेना के चुनाव चिह्न 'धनुष और तीर' को जब्त कर दिया। फिलहाल, एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना के दो गुट ढाल तलवार और मशाल को नए चुनाव चिन्हों के रूप में उपयोग कर रहे हैं।

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पशुपति कुमार पारस, चिराग पासवान - फोटो : अमर उजाला
लोक जनशक्ति पार्टी में चली चाचा-भतीजे की लड़ाई 
जून 2021 में चुनाव आयोग ने लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के 'बंगला' चुनाव चिह्न को जब्त कर लिया। तब दिवंगत राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व वाली पार्टी में दो गुट बंट गए थे। चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अपने प्रतीक के रूप में 'बंगला' का उपयोग करने से प्रतिबंधित कर दिया। पशुपति कुमार पारस ने छह सांसदों के साथ मिलकर चिराग पासवान के खिलाफ बगावत कर दी और चिराग को बाहर कर दिया। 

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AIADMK - फोटो : social media
एआईएडीएमके का हाल
तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी एआईएडीएमके में चुनाव चिह्न की लड़ाई 2016 में दिसंबर में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद शुरू हुई। तब एआईएडीएमके के एक खेमे का नेतृत्व ओ. पन्नीरसेल्वम ने किया था और दूसरे की कमान वीके शशिकला ने था। चुनाव चिह्न को लेकर लड़ाई हुई, तो चुनाव आयोग ने इसे फ्रीज कर दिया। 

अपना फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग ने कहा कि विवाद को खत्म करने से पहले दोनों गुट आधिकारिक प्रतीक या नाम का इस्तेमाल नहीं कर सकते। फिर मार्च 2017 में चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को दो अलग-अलग नाम दिए। ओ पन्नीरसेल्वम के गुट को एआईएडीएमके (पुरैची थलाइवी अम्मा) नाम दिया गया, जबकि ई. पलानीस्वामी के गुट को एआईएडीएमके (अम्मा) की पहचान मिली। हालांकि, बंटवारे के छह महीने बाद अगस्त 2017 में दोनों गुटों का औपचारिक रूप से विलय हो गया।

जनता पार्टी का चिह्न वापस
जनता दल में विलय के बाद जनता पार्टी का मूल चिह्न (हल लिए किसान) को वापस ले लिया गया। विभिन्न क्षेत्रीय दलों में विभाजित होने के बाद जनता दल का मूल प्रतीक पहिया भी जब्त कर लिया गया था। 1994 में जॉर्ज फर्नांडीस और नीतीश कुमार ने पहले जनता दल से अलग होने के बाद समता पार्टी की स्थापना की। तब चुनाव आयोग ने समता पार्टी को 'जलता हुआ मशाल' चुनाव चिह्न दिया था।

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इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि - फोटो : facebook
जब कांग्रेस हुई दोफाड़ 
1968 के आदेश के बाद 1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में पहली बार बंटवारा हुआ। तीन मई 1969 को राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद पार्टी के भीतर एक गुट इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गया। के कामराज, नीलम संजीव रेड्डी, एस निजलिंगप्पा और अतुल्य घोष के नेतृत्व में कांग्रेस के पुराने नेता (सिंडिकेट गुट) के रूप में जाने जाते थे। सिंडिकेट ने रेड्डी को इस पद के लिए नामांकित किया। तब प्रधानमंत्री इंदिरा ने उपराष्ट्रपति वीवी गिरि को निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने के लिए समर्थन जताया।

गिरि के जीतने के बाद इंदिरा को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया और पार्टी निजलिंगप्पा के नेतृत्व वाली पुरानी कांग्रेस (ओ) और इंदिरा के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस (जे) में बंट गई। पुरानी कांग्रेस ने दो बैलों की जोड़ी के पार्टी चिह्न को बरकरार रखा, जबकि अलग हुए गुट को बछड़े के साथ गाय का प्रतीक दिया गया।

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CPI (M) - फोटो : PTI
सीपीआई में बंट गए धड़े 
1968 से पहले किसी पार्टी का सबसे हाई-प्रोफाइल बंटवारा 1964 में सीपीआई का था। एक अलग हुआ समूह दिसंबर 1964 में ईसीआई पहुंचा और उनसे सीपीआई (मार्क्सवादी) के रूप में मान्यता देने का आग्रह किया। उन्होंने आंध्र प्रदेश, केरल और पश्चिम बंगाल के उन सांसदों और विधायकों की सूची प्रदान की, जिन्होंने उनका समर्थन किया था। ईसीआई ने इस गुट को सीपीआई (एम) के रूप में मान्यता दी। इस दौरान आयोग ने पाया कि अलग हुए समूह का समर्थन करने वाले सांसदों और विधायकों द्वारा प्राप्त वोट तीन राज्यों में चार फीसदी से अधिक था।
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