NCP split: सियासी उथल-पुथल से विपक्ष को फिर मिली बड़ी ताकत, इस बार महाराष्ट्र बना 'बूस्टर प्लेटफार्म'
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विस्तार
महाराष्ट्र में मची सियासी उथल-पुथल के बीच में एक बार फिर से देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियों को बड़ी ताकत मिलती हुई नजर आ रही है। अब यह ताकत क्या वास्तव में एकजुटता की राह पर आगे बढ़ेगी या नहीं। यह तो विपक्षी दलों की होने वाली अगली बैठक में तय हो पाएगा। फिलहाल विपक्ष को एकजुट करने वाले प्रमुख दलों और नेताओं को उम्मीद इसी बात से है कि महाराष्ट्र के सियासी हंगामे से कम से कम विपक्षियों को एकजुट होने का एक और मौका तो मिल गया है। इससे पहले तमिलनाडु में मुख्यमंत्री की अनुमति के बगैर एक मंत्री को बर्खास्त किए जाने के मामले में भी सियासत गरमाई थी, और भाजपा को विपक्षियों ने निशाने पर लिया था। फिलहाल महाराष्ट्र में हुए राजनीतिक घटनाक्रम के बाद सभी प्रमुख विपक्षी राजनैतिक दलों ने सोमवार को बड़ी बैठक की।
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दिल्ली और तमिलनाडु के बाद महाराष्ट्र से साध रहे निशाना
विपक्षियों को एकजुट करने की तैयारियों में बिछाई जा रही विपक्षी पार्टियों की सियासी बिसात में महाराष्ट्र ने एक तरह से 'बूस्टर प्लेटफार्म' तैयार कर दिया है। महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हिमांशु शितोले कहते हैं कि जिस तरीके से महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और एकनाथ शिंदे की सरकार में एनसीपी ने शामिल होकर उनक समर्थन दिया, उससे महाराष्ट्र का महा विकास अघाड़ी गठबंधन और देश के प्रमुख विपक्षी दलों में तेजी से राजनीतिक सुगबुगाहट शुरू हो गई। यह सुगबुगाहट कुछ और नहीं बल्कि सियासी तौर पर खुद को एकजुट करने को लेकर हुई। इस संबंध में जहां महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी के अलग-अलग घटक दलों की प्रमुख बैठक हुई। वहीं दिल्ली में कांग्रेस और पटना में जेडीयू और आरजेडी के बड़े नेताओं की बैठक हुई। हिमांशु कहते हैं कि बैठक के पीछे सबसे बड़ी मंशा यही रही कि जो घटना महाराष्ट्र में हुई है वह दूसरे और राज्यों में न दोहराई जाए। इसलिए सभी विपक्षी दलों को और मजबूती के साथ आगे आकर अपनी ताकत तो दिखानी ही होगी।
भाजपा को लेकर इसलिए और ज्यादा अलर्ट है विपक्ष
विपक्षी दलों को एकजुट करने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों का मानना है कि भाजपा जिस तरीके से लोकसभा चुनावों से पहले माहौल बना रही है, वह परिस्थितियां उनके लिहाज से मुफीद नहीं लग रही। जेडीयू के नेता राजीव रंजन कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरीके से महाराष्ट्र में सत्ता को बरकरार रखने के लिए पावर बैलेंस का खेल खेला है वह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिहाज से बहुत चुनौतीपूर्ण है। तृणमूल कांग्रेस के नेता अरिंदम चटर्जी कहते हैं कि भाजपा ने दिल्ली सरकार को भी ऐसे ही परेशान किया। उसके बाद तमिलनाडु में भी वहां के गवर्नर में मुख्यमंत्री के अनुमति के बगैर एक मंत्री को बर्खास्त कर दिया। हालांकि उनका कहना है जब सियासी तौर पर दबाव पड़ा, तो वह फैसला वापस हुआ। एनसीपी के नेता अनिल देशमुख कहते हैं कि जिस तरीके से भारतीय जनता पार्टी महाराष्ट्र में बीते एक साल से सत्ता पाने के लिए सियासत का ड्रामा कर रही है। अब जो महाराष्ट्र में हालात बने हैं और भारतीय जनता पार्टी की ही देन है।
शुरू हुआ विपक्षी पार्टियों की बैठकों का दौर...
महाराष्ट्र के सियासी उथल पुथल के बाद विपक्ष में एकजुट होने को लेकर विपक्षी दलों की बैठकों का दौर शुरू हो गया है। बिहार में शुरू हुई जेडीयू और आरजेडी के बड़े नेताओं की बैठक में इस बात को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा हुई कि अगली विपक्षी दलों की बैठक में इस बात को लेकर फैसला ले लिया जाए कि छोटे-छोटे मुद्दों को दरकिनार कर हमें सिर्फ एकजुटता की बात पर ध्यान लगाना है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार अरुण वाडवलकर का मानना है कि जिस तरीके से सभी प्रमुख विपक्षी दल एकजुट होकर भाजपा से लड़ने की योजना बना रहे हैं, उसमें महाराष्ट्र का घटनाक्रम निश्चित तौर पर विपक्ष की एकता को मजबूत करने के लिए बड़ा मुद्दा है। वह कहते हैं कि हाल के दिनों में तमिलनाडु का भी मुद्दा विपक्षियों ने मजबूती के साथ उठाया और उसमें बाद में मंत्री को बर्खास्त करने का फैसला अमल में नहीं आ पाया।
आप के मामले में अभी भी फंसा है कांग्रेस का पेंच
कांग्रेस पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आम आदमी पार्टी की ओर से रखे जा रहे अध्यादेश के मुद्दे पर पार्टी के प्रमुख नेता अभी भी एकजुट होते नहीं दिख रहे हैं। पार्टी से जुड़े एक प्रमुख नेता कहते हैं कि दरअसल अध्यादेश के साथ-साथ आम आदमी पार्टी को समर्थन करने का मतलब कांग्रेस पार्टी को अपने बड़े जनाधार को उनके सुपुर्द कर देना होगा। पार्टी के कुछ प्रमुख नेता नहीं चाहते हैं कि आम आदमी पार्टी के साथ जुड़कर वह विपक्ष की एकता को मजबूत करने की कोई दिशा में कदम उठाएं। यही वजह है कि विपक्षी दलों की एकता में जब-जब आम आदमी पार्टी सामने आती है और फिर अध्यादेश के मामले में कांग्रेस से समर्थन की मांग करती है, तो विपक्षियों की एकजुटता का मामला किसी ठोस नतीजे से पहले ही बिखर जाता है। हालांकि कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र में हुए सियासी घटनाक्रम को बहुत गंभीरता से ले रही है। यही वजह है कि एनसीपी में हुए सियासी विद्रोह पर पार्टी ने अपने बड़े नेताओं की बैठक कर आगे की रणनीति पर विचार शुरू किया है।