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नेशनल हेरल्ड मामला: क्यों घिरे हैं सोनिया-राहुल?

Fri, 12 May 2017 05:09 PM IST
amarujala.com- Submitted by: आनंद
amarujala.com- Submitted by: आनंद Updated Fri, 12 May 2017 05:09 PM IST
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National Herald case: why are Sonia-Rahul surrounded?
दिल्ली हाई कोर्ट ने नेशनल हेरल्ड मामले में यंग इंडिया लिमिटेड के खिलाफ आयकर विभाग की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर भी धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं।
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समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस चंद्रशेखर ने कंपनी से कहा है कि वे आयकर अधिकारी से संपर्क करें। यंग इंडिया लिमिटेड ने आयकर विभाग की कार्यवाही पर रोक लगाने और नोटिस को रद्द करने के लिए हाई कोर्ट में अपील की थी।
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क्या है नेशनल हेरल्ड मामला

National Herald case: why are Sonia-Rahul surrounded?
ये मामला नेशनल हेरल्ड अखबार से जुड़ा है जिसकी स्थापना 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने की थी। उस समय से यह अखबार कांग्रेस का मुखपत्र माना जाता रहा। अखबार का मालिकाना हक एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड यानी 'एजेएल' के पास था जो दो और अखबार भी छापा करती थी। हिंदी में 'नवजीवन' और उर्दू में 'कौमी आवाज'।

आजादी के बाद 1956 में एसोसिएटेड जर्नल को अव्यवसायिक कंपनी के रूप में स्थापित किया गया और कंपनी एक्ट धारा 25 के अंतर्गत इसे कर मुक्त भी कर दिया गया। वर्ष 2008 में 'एजेएल' के सभी प्रकाशनों को निलंबित कर दिया गया और कंपनी पर 90 करोड़ रुपए का कर्ज भी चढ़ गया।

फिर कांग्रेस नेतृत्व ने 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' नाम की एक नई कंपनी बनाई जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित मोतीलाल वोरा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और सैम पित्रोदा को निदेशक बनाया गया। इस नई कंपनी में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास 76 प्रतिशत शेयर थे जबकि बाकी के 24 प्रतिशत शेयर अन्य निदेशकों के पास थे।
 

आरोप

National Herald case: why are Sonia-Rahul surrounded?
कांग्रेस पार्टी ने इस कंपनी को 90 करोड़ रुपए बतौर ऋण भी दे दिया। इस कंपनी ने 'एजेएल' का अधिग्रहण कर लिया। भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने वर्ष 2012 में एक याचिका दायर कर कांग्रेस के नेताओं पर 'धोखाधड़ी' का आरोप लगाया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' ने सिर्फ 50 लाख रुपयों में 90।25 करोड़ रुपए वसूलने का उपाय निकाला जो 'नियमों के खिलाफ' है। याचिका में आरोप है कि 50 लाख रुपए में नई कंपनी बना कर 'एजेएल' की 2000 करोड़ रुपए की संपत्ति को 'अपना बनाने की चाल' चली गई।

दिल्ली की एक अदालत ने मामले में चार गवाहों के बयान दर्ज किए और 26 जून 2014 को अदालत ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित नई कंपनी में निदेशक बनाए गए सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और मोतीलाल वोरा को पेश होने का समन भेज दिया। अदालत ने 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' के सभी निदेशकों को 7 अगस्त 2014 को अपने सामने पेश होने का निर्देश दिया। मगर कांग्रेस के नेताओं ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई के बाद निचली अदालत की ओर से जारी समन पर रोक लगा दी गई।


कांग्रेस के नेताओं ने अदालत में दलील दी कि 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' नाम की संस्था को 'सामजिक और दान करम' के कार्यों के लिए बनाया गया है। नेताओं की यह भी दलील थी कि 'एजेएल' के शेयर स्थानांतरित करने में किसी 'गैर कानूनी' प्रक्रिया को 'अंजाम नहीं दिया गया' बल्कि यह शेयर स्थानांतरित करने की 'सिर्फ एक वित्तीय प्रक्रिया' थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेस के नेताओं की ओर से दायर 'स्टे' की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि एक 'सबसे पुराने राष्ट्रीय दल की साख दांव पर' लगी है क्योंकि पार्टी के नेताओं के पास ही नई कंपनी के शेयर हैं।
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सवाल

National Herald case: why are Sonia-Rahul surrounded?
हाई कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के लिए यह जरूरी कि वो मामले की बारीकी से सुनवाई करे ताकि पता चल पाये कि 'एजेएल' को ऋण किन सूरतों में दिया गया और फिर वो नई कंपनी 'यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड' को कैसे ट्रांसफर किया गया। जनवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी से कहा कि वे स्पीडी ट्रायल के लिए हाई कोर्ट में जाएँ, क्योंकि इस अपील पर वो सीधे सुनवाई नहीं कर सकता।

उसी साल दिसंबर में हाई कोर्ट ने उनकी अपील पर अपना फैसला सुरक्षित रखा लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी को समन जारी करने के निचली अदालत के फैसले को रद्द करने से मना कर दिया।

9 दिसंबर 2015 को सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीस और सुमन दुबे पटियाला हाउस कोर्ट में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुए। फिर उन्हें जमानत मिल गई। लेकिन फरवरी 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने इस सभी पाँच लोगों को अदालत में निजी तौर पर पेश होने से छूट तो दे दी लेकिन मामले को रद्द करने से मना कर दिया।
 
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