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सेना भर्ती का 'टूर ऑफ ड्यूटी' मॉडल: क्या ये युवाओं के जुनून, देशभक्ति और सेना भावना का अपमान तो नहीं है?

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 07 Apr 2022 07:42 PM IST
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सार
युवा हल्लाबोल के राष्ट्रीय संयोजक अनुपम का कहना है, ये मॉडल कई देशों में अनिवार्य सेना ट्रेनिंग के तौर पर लागू है। हमारे देश में सरकार इसे नियमित भर्ती का विकल्प बनाना चाहती है। युवाओं को सरकार की नीयत पर शक है। वह इसलिए है कि सरकार, समय पर सेना भर्ती की प्रक्रिया को शुरू नहीं कर सकी। अपनी गलतियां छिपाने के लिए 'यूथ और सेना' के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया है...
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national convener of Yuva Halla Bol Anupam said, tour of duty proposal in indian army is insult to the passion, patriotism and army spirit of the youth
सेना भर्ती - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

विस्तार

भारतीय सेना में भर्ती के लिए केंद्र सरकार द्वारा कई नए बदलावों की आहट सुनाई पड़ रही है। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है, लगभग तीन वर्ष की अवधि वाली 'टूर ऑफ ड्यूटी' के जरिए अब सेना में भर्ती होगी। इससे सेना के खर्च में कमी आएगी। दूसरा, लंबे समय से खुली भर्ती प्रक्रिया शुरू न होने के कारण रिक्तियों का जो बैकलॉग बना है और जिसके चलते सरकार भारी दबाव में है, इन सभी का तोड़ 'टूर ऑफ ड्यूटी' को बताया जा रहा है। देश में बेरोजगारी को लेकर आवाज बुलंद कर रहे युवा हल्लाबोल के राष्ट्रीय संयोजक अनुपम का कहना है कि सरकार द्वारा सेना भर्ती के 'टूर ऑफ ड्यूटी' मॉडल का इस्तेमाल खुद दबाव मुक्त होने के लिए किया जा रहा है। यह कदम, सेना भर्ती के लिए वर्षों से पसीना बहा रहे युवाओं के जुनून, उनकी देशभक्ति और सेना भावना का अपमान होगा। ये देश सेवा के साथ खिलवाड़ है।

दिवंगत सीडीएस बिपिन रावत के समय से जारी है चर्चा

हालांकि देश में 'टूर ऑफ ड्यूटी' मॉडल पर पहली बार चर्चा नहीं हो रही है। पिछले कई वर्षों से इसका खाका तैयार किया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि दिवंगत चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, जनरल बिपिन रावत के समय में ही भर्ती के इस मॉडल पर चर्चा होने लगी थी। उन्होंने एक बार कहा भी था कि ये अवधारणा अभी प्रारंभिक चरण में है। इस बाबत कई तरह की रिपोर्ट्स् का अध्ययन करने की आवश्यकता है। इसकी व्यावहारिकता को बहुत सावधानी से परखना होगा। उसके बाद मौजूदा आर्मी चीफ जनरल एमएम नरवणे इस मॉडल पर गौर कर रहे हैं। सरकार के शीर्ष नेतृत्व से मंजूरी मिलने के बाद पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 'टूर ऑफ ड्यूटी' के पहले चरण में सौ अफसर और एक हजार जवानों की भर्ती निकाली जा सकती है।

युवाओं को सरकार की नीयत पर शक है

युवा हल्लाबोल के राष्ट्रीय संयोजक अनुपम का कहना है, ये मॉडल कई देशों में अनिवार्य सेना ट्रेनिंग के तौर पर लागू है। हमारे देश में सरकार इसे नियमित भर्ती का विकल्प बनाना चाहती है। युवाओं को सरकार की नीयत पर शक है। वह इसलिए है कि सरकार, समय पर सेना भर्ती की प्रक्रिया को शुरू नहीं कर सकी। अपनी गलतियां छिपाने के लिए 'यूथ और सेना' के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया है। 'टूर ऑफ ड्यूटी' मॉडल में युवाओं को ट्रेनिंग तो भारतीय सेना देगी, जबकि वे नौकरी कॉरपोरेट में करेंगे। सरकार का मॉडल तो ऐसा ही दिख रहा है। आईएएस में लेटरल भर्ती क्या है, वह भी तो ऐसी ही है। सरकार पहले ट्रेनिंग देगी, दो-तीन साल नौकरी करो और दोबारा से कॉरपोरेट में लौट जाओ। सेना भर्ती का यह मॉडल, देश की सुरक्षा को ठेके पर देने जैसा है जो कि खतरनाक है। आज सेना में यह मॉडल लागू किया जाएगा, कल सीएपीएफ में रिक्त पदों को भरने के लिए इसी मॉडल को लागू कर देंगे।  

‘जुनून और देश भक्ति' की वजह से सेना में आते हैं युवा

भारतीय सेना ज्वाइन करना और दूसरे विभागों में नौकरी, इसमें बहुत फर्क होता है। सेना में युवा 'जुनून और देश भक्ति' की वजह से आते हैं। सेना में भर्ती होने के लिए युवाओं को कई वर्षों तक कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। बतौर अनुपम, ऐसी स्थिति में युवा तीन साल की सेना की नौकरी पसंद नहीं करेंगे। सरकार जब तय समय पर प्रतियोगी परीक्षा या सामान्य भर्ती प्रक्रिया आयोजित नहीं कर पा रही है तो कम खर्च में अल्पकालिक अनुबंध पर सेना भर्ती की तैयारी शुरू कर दी। सरकार इस वक्त भारी दबाव में है। शॉर्ट सर्विस कमीशन तो पहले से है ही। 'टूर ऑफ ड्यूटी' मॉडल, सेना का अपमान है। देश की सेवा के साथ खिलवाड़ है। ठीक है कि आज देश में बेरोजगारी चरम पर है, लेकिन उसे कम करने का ये तरीका सही नहीं है। सरकार को डर है कि कहीं रेलवे भर्ती की तरह आर्मी भर्ती की तैयारी में जुटे युवाओं का गुस्सा उबाल न खा जाए। सरकार, अब सेना भर्ती की नई प्रक्रिया का इस्तेमाल अपने खातिर प्रेशर वॉल तैयार करने के लिए तो नहीं कर रही है।

लड़ाई में कई तरीकों से यूथ की मदद ले सकते हैं

एयर कमोडोर बीएस सिवाच (रिटायर्ड) के अनुसार, सेना भर्ती का एक मायना होता है। उसमें देश की सेवा के साथ-साथ प्यार होता है। अल्पकालिक अनुबंध पर भर्ती करने का मतलब युवाओं को सेना की ट्रेनिंग देना है। उनमें सेना के अनुशासन की भावना जागृत करना है। दूसरे देशों में इस तरह की भर्ती या ट्रेनिंग के प्रावधान हैं। जब युवाओं को सेना की ट्रेनिंग मिल जाएगी तो भले ही वे किसी दूसरे सेक्टर में काम कर रहे हों, जरूरत पड़ने पर वे आगे आ सकते हैं। लड़ाई में कई तरीकों से उनकी मदद ले सकते हैं। मुसीबत के समय अगर जरूरी हुआ तो उन्हें अग्रिम मोर्चों पर लड़ने के लिए भेज सकते हैं। बहुत से लोग इस भर्ती को कैजुअली ले लेते हैं। कम से कम उनका शरीर तो ठीक रहेगा। दूसरी तरफ सेना का खर्च कम होगा। रिक्तियों का दबाव कम किया जा सकेगा। इससे फौज को मजबूती मिलेगी। सेना की जरूरी ट्रेनिंग तो होनी ही चाहिए। नई प्रक्रिया के तहत भर्ती होने वाले युवाओं को तीन साल पूरे होने पर ड्यूटी से मुक्त कर दिया जाएगा। उन्हें आगे रोजगार लेने में कोई दिक्कत न हो, इसके लिए सेना की तरफ से मदद की जाएगी। इसके लिए सरकार कॉरपोरेट जगत से बात कर रही है। सेना में भर्ती के बाद जब वे युवा दूसरे सेक्टर में जाएंगे तो उनके लिए नौकरी के कई नए रास्ते खुलेंगे। यहां तक कि तकनीकी रूप से कार्यकुशल युवा, दूसरे मुल्कों में भी जॉब के लिए प्रयास कर सकते हैं।

इन देशों में अनिवार्य है सेना की ट्रेनिंग

इस्राइल में पुरुष और महिला, दोनों के लिए आर्मी सर्विस जरूरी है। ब्राजील में भी मिलिट्री सेवा अनिवार्य है। हर देश में भर्ती का तरीका और ट्रेनिंग की अवधि अलग-अलग होती है। दक्षिण कोरिया में राष्ट्रीय सैन्य सेवा को लोगों के जीवन का अनिवार्य अंग बनाया गया है। कई देशों में कुछ लोगों को अनिवार्य भर्ती से छूट भी दे जाती है। उसके लिए अलग मापदंड बनाए गए हैं। रूस में भी एक साल की सैन्य सेवा अनिवार्य है। सीरिया में सैन्य सेवा अनिवार्य तौर से लागू की गई है। यहां पर सैन्य सेवा की अवधि करीब 18 माह है। जो लोग सेना में सेवा नहीं देना चाहते, या जानबूझकर बच निकलते हैं तो उन्हें दंड मिलता है। स्विट्जरलैंड में पुरुषों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है। तुर्की में लड़कों के लिए सेना सेवा अनिवार्य है। यूक्रेन, ऑस्ट्रिया, ईरान और म्यांमार में भी लोगों के लिए सैन्य सेवा करना अनिवार्य है।

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