सोहराबुद्दीन केस : सरकारी वकील ने माना था कि सीबीआई ने जल्दबाजी में दाखिल की चार्जशीट
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देश की सियासत में खलबली मचाने वाले बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख, उसकी पत्नी कौसर बी और शेख के सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ में मौतों के मामले में आखिरकार एक-एक करके सारे आरोपी बरी हो गए। गौर करने वाली बात है कि इसके संकेत बहुत पहले मिलने शुरू हो गए थे।
बीते पांच दिसंबर को ही मामले की अंतिम बहस के दौरान सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक बी. पी. राजू ने स्वीकार किया था कि मामले में कई लूप होल्स हैं। सीबीआई ने चार्जशीट जल्दबाजी में दाखिल की। दूसरी बात यह कि कथित शेख फर्जी एनकाउंटर के पांच साल बीत जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामला सीबीआई को सौंपा गया था। जांच के लिहाज से यह देरी को ठीक नहीं थी।
यही नहीं सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने केस ट्रांसफर करने की मांग करते वक्त दलील दी थी कि गवाहों पर दबाव न डाला जा सके इसलिए इस सुनवाई गुजरात से बाहर होनी चाहिए। मामले में माना जा रहा है कि सीबीआई का शक भी वाजिब था।
अदालत ने कहा, नेताओं को फंसाना चाहती थी सीबीआई
विशेष सीबीआई अदालत ने यह भी कहा है कि केंद्रीय जांच एजेंसी ने सोहराबुद्दीन शेख, उसकी पत्नी कौसर बी और उसके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ की जांच एक पहले से सोचे समझे गए एक सिद्धांत के साथ कई राजनीतिक नेताओं को फंसाने के लिए की। विशेष सीबीआई न्यायाधीश एस जे शर्मा ने 21 दिसंबर को मामले में 22 आरोपियों को बरी करते हुए 350 पृष्ठों वाले फैसले में यह टिप्पणी की।
अपने आदेश में न्यायाधीश शर्मा ने कहा कि उनके पूर्वाधिकारी (न्यायाधीश एमबी गोस्वामी) ने आरोपी संख्या 16 (भाजपा अध्यक्ष अमित शाह) की अर्जी पर आरोपमुक्त आदेश जारी करते हुए कहा था कि जांच राजनीति से प्रेरित थी।
फैसले में कहा गया है, ‘‘मेरे समक्ष पेश किए गए तमाम सबूतों और गवाहों के बयानों पर करीब से विचार करते हुए मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि सीबीआई जैसी एक शीर्ष जांच एजेंसी के पास एक पूर्व निर्धारित सिद्धांत और पटकथा थी, जिसका मकसद राजनीतिक नेताओं को फंसाना था।’’
गौरतलब है कि तीनों लोग (मृतक) हैदराबाद से एक बस में महाराष्ट्र के सांगली लौट रहे थे, जिन्हें 22 - 23 नवंबर 2005 की दरम्यिानी रात एक पुलिस टीम ने कथित तौर पर हिरासत में ले लिया और दंपती को एक वाहन में ले जाया गया जबकि प्रजापति को दूसरे वाहन में ले जाया गया।
सीबीआई के मुताबिक शेख 26 नवंबर 2005 को कथित तौर पर गुजरात और राजस्थान पुलिस की एक संयुक्त टीम ने मार गिराया और तीन दिन बाद कौसर बी मारी गई। प्रजापति 27 दिसंबर 2006 को गुजरात - राजस्थान सीमा पर एक मुठभेड़ में मारा गया।
एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह रही कि गवाहों के बयान 12 साल में दर्ज किए गए। नतीजतन, 210 गवाहों में से 92 पलट गए। गौरतलब यह भी कि ट्रायल शुरू होने से पहले ही सभी बड़े नाम बरी हो गए थे। शेष बचे थे गुजरात और राजस्थान पुलिस के छोटे कर्मचारी जिन्हें आखिरकार अदालत ने शुक्रवार को बरी कर दिया।