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कितना कारगर होगा 'मेरी मुंबई मेरी कांग्रेस' का नारा!

Wed, 06 Jan 2021 10:50 PM IST
मुकेश कुमार झा सुरेन्द्र मिश्र, मुंबई
सुरेन्द्र मिश्र, मुंबई Published by: मुकेश कुमार झा Updated Wed, 06 Jan 2021 10:50 PM IST
सार

  • जहां हुई थी कांग्रेस की स्थापना वहीं जनाधार के लिए तरस रही है पार्टी

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Mumbai Congress chief Ashok Jagtap slogan meri mubai meri congress, how much effective
Congress symbol - फोटो : social media

विस्तार

कांग्रेस के 136 वें स्थापना दिवस पर मुंबई में कांग्रेस की नई टीम तैयार हुई। मुंबई कांग्रेस के नए अध्यक्ष बने अशोक (भाई) जगताप ने नारा दिया 'मेरी मुंबई मेरी कांग्रेस'। साथ ही, अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा भी की है। लेकिन इस नारे को हकीकत में बदलने में कांग्रेस कार्यकर्ता ही सहज महसूस नहीं कर पा रहे है। वजह यह है कि कांग्रेस जिस मजबूत वोटबैंक के सहारे मुंबई फतह करती रही वह हिंदीभाषी उत्तर भारतीय, राजस्थानी और दलित समाज कांग्रेस से पूरी तरह कटा नजर आ रहा है।

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मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष अशोक (भाई) जगताप मराठा हैं और अखिल भारतीय मराठा महासंघ से जुड़े हुए हैं। मजदूर यूनियन के नेता के रूप में भी उनकी पहचान है। अगले साल बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव में भाई जगताप के नेतृत्व की परीक्षा होनी है। इसलिए कांग्रेस मुंबई में खुद को तैयार करने की जद्दोजहाद में लगी है। लेकिन मुंबई कांग्रेस केी नई टीम में जिन चेहरों को बरीयता दी गई है उससे महानगर में कांग्रेस का ग्राफ बढ़ने की संभवना नही दिखाई दे रही है।
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मुंबई कांग्रेस की नई टीम में हिंदीभाषा उत्तर भारतीयों की पूरी तरह उपेक्षा की गई है। एक समय में मुंबई के 40 लाख हिंदीभाषी उत्तर भारतीय कांग्रेस के मजबूत वोटबैंक माने जाते थे। जिनका अब मोहभंग हो चुका है। दलितों में भी कांग्रेस की पकड़ ढीली हो गई है। कांग्रेस की स्थापना मुंबई में हुई थी। जब कांग्रेस के अच्छे दिन थे तब मुंबई में भी कांग्रेस की तूती बोलती थी। लेकिन अब पार्टी देश की आर्थिक राजधानी में जनाधार के लिए तरस रही है।
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मुंबई कांग्रेस के एक बरिष्ठ नेता कहते हैं कि वोट बैंक का गणित पूरी तरह से समाज और जाति पर आधारित रहता है। मुंबई में सबसे बड़ी संख्या में हिंदीभाषि उत्तर भारतीय मतदाता हैं और कांग्रेस के कार्यकर्ता भी हैं। अब तक मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष का पद गैरमराठी भाषी और प्रदेशाध्यक्ष का पद मराठीभाषी को देने की परंपरा रही है। लेकिन इस बार मुंबई में मराठीभाषी अध्यक्ष पंजाबी मूल के चरणसिंह सप्रा को कार्याध्यक्ष बनाया गया है। जबकि कमेटियों में भी हिंदीभाषी उत्तर भारतीय समाज को महत्व नहीं मिला। यह कांग्रेस के लिए मंथन का विषय है।


भाषाई मुद्दा और ध्रुवीकरण की राजनीति में पिट रही है कांग्रेस
मुंबई कांग्रेस के महासचिव व पूर्व पार्षद बी के तिवारी कहते हैं कि दरअसल, भाषाई मुद्दा और ध्रुवीकरण की राजनीति में कांग्रेस पिट रही है। बीएमसी चुनाव में भाषाई मुद्दा और प्रतिष्ठा का ध्रुवीकरण हो जाता है। इसलिए मुंबई के मराठीभाषी शिवसेना के साथ गोलबंद हो जाते हैं। यही वजह रही कि बीएमसी और फिर विधानसभा चुनाव में शिवसेना-भाजपा के बीच मुकाबला रहा। जबकि कांग्रेस तीसरे नंबर पर पहुंच गई। 

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