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Mulayam Singh Yadav: अखिलेश के लिए चुनौती, राजनीति में 'कॉरपोरेट व मध्यवर्ग' के बीच कैसे आगे बढ़ेगा 'समाजवाद'

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 10 Oct 2022 04:41 PM IST
सार

Mulayam Singh Yadav: प्रसिद्ध चिंतक और लेखक डॉ. राघव शरण शर्मा बताते हैं, मुलायम सिंह को समझने के लिए बहुत पीछे जाना होगा। डॉ. राममनोहर लोहिया और राजनारायण की बात करनी पड़ेगी। भारतीय राजनीति में एक सच्चाई यह भी है कि लोहिया को अगर राजनारायण न मिले होते, तो वे पार्टी नहीं बनाते...

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Mulayam Singh Yadav: how Akhilesh yadav will manage socialism in politics between corporate and middle class
Mulayam Singh Yadav: मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

विस्तार

सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव का सोमवार को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। वे काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनके बेटे अखिलेश यादव, कई वर्षों से समाजवादी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं। राजनीति में मुलायम सिंह के रहते ही समाजवाद के साथ 'कॉरपोरेट' फैक्टर प्रवेश कर चुका था। प्रसिद्ध चिंतक और लेखक डॉ. राघव शरण शर्मा बताते हैं, मुलायम सिंह यादव के देहांत के बाद अब उनके बेटे अखिलेश यादव की चुनौती बढ़ गई हैं। राजनीति में अब शहरी मध्यवर्ग का बोलबाला है, गांव और शहर के बीच की दूरी सिमट रही है। ऐसे में अखिलेश यादव को 'कॉरपोरेट व मध्यवर्ग' के बीच सामंजस्य बैठाकर 'समाजवाद' को आगे बढ़ाना पड़ेगा। हालांकि राजनीति में अब विचारधारा जैसा कुछ रह नहीं गया है। गांव में पूंजीवाद पहुंच रहा है, तो वहीं सामाजिक न्याय की सोच बदल रही है, ऐसे में अखिलेश को बहुत संभलकर चलना होगा।

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राजनारायण ने मुलायम को आगे बढ़ाया

डॉ. राघव शरण शर्मा ने कहा, मुलायम सिंह को समझने के लिए बहुत पीछे जाना होगा। डॉ. राममनोहर लोहिया और राजनारायण की बात करनी पड़ेगी। भारतीय राजनीति में एक सच्चाई यह भी है कि लोहिया को अगर राजनारायण न मिले होते, तो वे पार्टी नहीं बनाते। दोनों के बीच बहुत भरोसे का रिश्ता था। राजनारायण ने अपने कई सहयोगियों को आगे बढ़ाया। चौ. चरण सिंह को सीएम व पीएम बनवाने में उनकी भूमिका रही। मुलायम सिंह की भी राजनारायण ने बहुत मदद की। वहीं से पिछड़ों की राजनीतिक खड़ी हुई। हालांकि राजनारायण में क्षेत्रवाद से लगाव, यह एक कमी थी। कुछ हद तक यहीं से उनका और मुलायम सिंह का झगड़ा शुरू हुआ। उन्होंने राम नरेश यादव को उत्तर प्रदेश का सीएम बना दिया। इसके बाद मुलायम सिंह नाराज हो गए। उस दौर में राजनारायण के बिना विरोधी दल की भूमिका के बारे में सोचा नहीं जा सकता था। उन्होंने इंदिरा गांधी से टक्कर ली। चुनावी और अदालती, दोनों तरह की लड़ाई जीतकर दिखाई।

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सपा में पहले ही आ गया था कॉरपोरेट!

राजनीति में मुलायम सिंह यादव को आगे बढ़ाने में राजनारायण की बड़ी भूमिका थी। समाजवादी पार्टी का गठन होने के बाद उसका कॉरपोरेट से भी जुड़ाव रहा। बतौर राघव शरण, छोटा अंबानी व सहारा जैसे उद्योगपति, सपा के करीब आते चले गए। पार्टी में कॉपोरेट का योगदान बढ़ने लगा। इन सब बातों में मुलायम सिंह के साथ अगर अमर सिंह का नाम न आए तो ठीक नहीं होगा। बहुत से विचारक यह भी मानते हैं कि समाजवाद तो पहले ही खत्म हो गया था। पिछले कई दशकों से वह नाम मात्र का रह गया है। जाति और धर्म की राजनीति आ गई। समाजवादी नेता, इस अखाड़े में भी उतरते नजर आए। यूपी में 'अजगर' यानी 'अहीर, जाट, गुज्जर व राजपूत' शब्दों को लाया गया। इस बाबत चौ. चरण सिंह और देवीलाल एक मंच पर आ गए थे। बिहार में भी ऐसी ही 'त्रिवेणी' संघ बना था। उत्तर प्रदेश में राजनारायण तो बिहार में कर्पूरी ठाकुर बड़े नेताओं के तौर पर सामने आए। इन दोनों की मौत के बाद ही मुलायम सिंह व लालू प्रसाद यादव उभरे।



मुलायम सिंह यादव के देहांत के बाद अखिलेश यादव को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। देश की राजनीति में अब शहरी मध्यवर्ग उभर गया है। इस वर्ग की एक समान सोच है। जैसे विकास और अपराध मुक्त वातावरण, आदि। इसे विज्ञान वाले लोगों की सोच भी कहते हैं। अब राजनीति, इसी वर्ग के आसपास घूमती है। अखिलेश यादव को इसी मध्यवर्ग पर टिकना है। केवल यादव और मुस्लिम, इस तालमेल से काम नहीं चलेगा। 'अजगर' व 'त्रिवेणी' संघ वाला फार्मूला, मुलायम दौर में चलता था। अब तो पिछड़ों में भी अति पिछड़े आ गए हैं।

क्षेत्रीय दलों से बेरुखी

राजनीति में अखिलेश यादव को नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, स्टालिन, केसीआर व केजरीवाल की तरह एक कॉमन वर्ग के बारे में सपा को आगे बढ़ना पड़ेगा। अखिलेश यादव, अपने चाचा शिवपाल से अलग हुए, तभी लोगों को यह अहसास हो गया था कि अब सपा, एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। मुलायम सिंह के वक्त समाज में उतनी जागरूकता नहीं थी। खासतौर पर, उत्तर प्रदेश जो मुलायम सिंह की कर्मस्थली रहा है, अब वहां की राजनीति बदल गई है। मुसलमान भी समझ रहे हैं कि क्षेत्रीय दल में ज्यादा कुछ नहीं रखा है। कोई विकास वाला मॉडल ही चलेगा। भले ही बाहर से कुछ हद तक जातिवाद नजर आए, लेकिन अंदर तो पूंजीवाद ही होगा। ऐसे में अखिलेश यादव को तय करना है कि वे समाजवाद को मौजूदा परिस्थितियों में किस तरह आगे बढ़ाते हैं।

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