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ऑस्कर को सिनेमाई श्रेष्ठता का पैमाना नहीं मानते थे सेन, स्लमडॉग मिलेनियर को बताया था खराब फिल्म

Mon, 31 Dec 2018 05:13 AM IST
Gaurav Pandey रीता तिवारी, कोलकाता
रीता तिवारी, कोलकाता Published by: Gaurav Pandey Updated Mon, 31 Dec 2018 05:13 AM IST
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Mrinal Sen did not think Oscar Award as scale to measure cinematic excellence
मृणाल सेन (फाइल फोटो)

फिल्मकार मृणाल सेन मौजूदा दौर की फिल्मों के गिरते स्तर से बेहद निराश थे। बीते सात-आठ वर्षों से बीमारियों की वजह से उन्होंने सार्वजनिक समारोहों में जाना बंद कर दिया था। उससे पहले वह कोलकाता फिल्मोत्सव समेत तमाम साहित्यिक और सांस्कृतिक समारोह में सक्रिय रहते थे। उन्होंने आखिरी बार 2009 में अपने 87वें जन्मदिन पर पत्रकारों से बात की थी।

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दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित फिल्मकार मृणाल सेन मानते थे कि ऑस्कर सिनेमाई श्रेष्ठता का पैमाना नहीं है। महान फिल्मकारों को कभी इन पुरस्कारों से नवाजा नहीं गया। उन्होंने कहा था कि क्या कभी चार्ली चैपलिन या सत्यजीत रे की किसी फिल्म को ऑस्कर मिला? ऑस्कर के लिए फिल्मकार अपनी प्रविष्टियां भेजते हैं, जबकि महान फिल्मकारों ने कभी इसके लिए अपनी फिल्में नहीं भेजी होंगी। 
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आठ ऑस्कर जीतने वाली भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ पर मृणाल ने कहा था कि मैंने फिल्म देखी नहीं है, लेकिन यह जरूर बहुत खराब फिल्म होगी। झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले लड़के के करोड़पति बनने की कहानी से पता नहीं वे क्या दिखाना चाहते हैं। इसकी थीम ही खराब है। मृगया, भुवन सोम, रातभोर और पदातिक जैसी बेहतरीन फिल्में बना चुके वयोवृद्ध फिल्मकार ने कहा था कि मैंने कुछ चर्चित फिल्में देखी हैं, लेकिन पसंद नहीं आई। मैं उनके बारे में बात भी नहीं करना चाहता। 

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अपनी फिल्मों के मास्टर प्रिंट नष्ट होने पर थे व्यथित

अपनी क्लासिक फिल्मों के मास्टर प्रिंट नष्ट होने से व्यथित मृणाल ने बताया था कि सत्तर के दशक में बनी प्रतिदिन, कलकत्ता 71 और खंडहर जैसी 1984 में बनी फिल्म के प्रिंट भी नष्ट होने की कगार पर हैं। फिल्मों के संरक्षण की बात वे कई साल से कहते रहे हैं। मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं उन्हें बचा सकूं। वह कहते थे कि फिल्में हमारी धरोहर हैं। हम अपनी धरोहर को यूं खो नहीं सकते। 

सत्यजीत रे की कालजई फिल्म पाथेर पांचाली के मास्टर प्रिंट भी लंदन फिल्म महोत्सव के दौरान खराब हो गए थे। फोर्ड फाउंडेशन ने लाखों रुपये खर्च करके उसे बचाया था। मृणाल की फिल्मों पुनश्च (1961) और प्रतिनिधि (1964) के मास्टर प्रिंट भी नष्ट हो चुके हैं। उन्होंने कहा था कि यह दुखद है, लेकिन मुझे सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा।

...काश और अधिक फिल्में बना सकता

आखिरी बार 2002 में आमार भुवन नाम की फिल्म बनाने वाले मृणाल ने निर्देशन का दामन नहीं छोड़ा था, लेकिन उन्हें सही पटकथा का इंतजार था। इस फिल्मकार ने तब कहा था कि वह रोज सुबह उठने पर नई पटकथा लिखने के बारे में सोचते हैं। बीते सात साल से ऐसा ही कर रहे हैं, लेकिन पता नहीं सही कहानी कब मिलेगी। 

अपनी सृजनात्मक क्षुधा को कैसे शांत करते हैं? इस सवाल पर उन्होंने कहा था कि मैं ऐसी बहुत सी चीजें करना चाहता हूं जो नहीं कर पाया। अपनी हर फिल्म को जब मैं देखता हूं तो मुझे वह ड्रेस रिहर्सल लगती है। मुझे लगता है कि इससे बेहतर कर सकता था। लगता है कि काश अपनी जिंदगी को दोबारा जी सकता और अधिक फिल्में बना सकता।

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