हिंदू-मुस्लिम डीएनए: यूपी चुनाव पर असर डालेगा भागवत का यह बयान या बदलेगा आरएसएस की छवि?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का हिंदू-मुस्लिम डीएनए वाला बयान अब सियासी हलकों में खलबली मचा रहा है। विपक्षी नेताओं ने एक सुर में भागवत पर हमला बोल दिया। साथ ही, मॉब लिंचिंग का मामला भी गरमा गया। सवाल तो ये भी उठ रहे हैं कि क्या भागवत ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह बयान दिया? या नई पीढ़ी के बीच अपनी जगह बनाने के लिए संघ उग्र हिंदुत्व की छवि से बाहर निकलने की कवायद में जुटा है?
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गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने कहा कि सभी भारतीयों का डीएनए एक है। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा भागवत मॉब लिंचिंग पर भी खुलकर बोले। उन्होंने कह दिया कि जो लोग लिंचिंग करते हैं, वे हिंदुत्व विरोधी हैं। भागवत के इस बयान के बाद सियायी पारा एकदम से चढ़ गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भागवत ने अपने बयान से हिंदुत्व के दार्शनिक आधार को व्यापक रूप दिया।
अपने बयान से वह भाजपा को अब हर धर्म और हर समुदाय के लिए स्वीकार्य पार्टी के तौर पर स्थापित करने के लिए मनोवैज्ञानिक समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे आलोचकों और विरोधियों को जवाब दिया जा सके कि केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को हर धर्म और हर समुदाय का समर्थन हासिल है। उन पर अल्पसंख्यकों को हाशिए पर रखने के जो आरोप हैं, वे बेबुनियाद हैं।
विपक्षी दलों के निशाने पर यूं आए भागवत
विपक्षी दलों ने भागवत के बयान को उत्तर प्रदेश चुनाव से जोड़ दिया। कांग्रेस, बसपा और एआईएमआईएम उन पर हमलावर हो गईं। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि मोहन भागवत यह विचार क्या आप अपने शिष्यों, प्रचारकों, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को भी देंगे? क्या यह शिक्षा आप मोदी-शाह और भाजपा के मुख्यमंत्री को भी देंगे? वहीं, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी भागवत पर निशाना साधा।
उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, 'आरएसएस के भागवत ने कहा कि लिंचिंग करने वाले हिंदुत्व विरोधी। इन अपराधियों को गाय और भैंस में फर्क नहीं पता होगा, लेकिन कत्ल करने के लिए जुनैद, अखलाक, पहलू, रकबर, अलीमुद्दीन के नाम ही काफी थे। यह नफरत हिंदुत्व की देन है। इन मुजरिमों को हिंदुत्ववादी सरकार की पुश्त पनाही हासिल है। बसपा प्रमुख मायावती ने तो आरएसएस प्रमुख के बयान को मुंह में राम और बगल में छुरी जैसा बताया।
बयान का उत्तर प्रदेश चुनाव से क्या कनेक्शन?
भागवत का यह बयान उग्र हिंदुत्व की अपनी छवि सुधारने की कोशिश भर है या वाकई उत्तर प्रदेश चुनाव से इसका कोई कनेक्शन है? दरअसल, उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक दलों की नजर मुस्लिम वोट बैंक पर रहती है। अगले छह महीने में प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। यहां 20 प्रतिशत मुस्लिम वोट बैंक सबसे ज्यादा मायने रखता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 125 सीटें ऐसी हैं, जहां मुसलमानों के वोट की अहम भूमिका होती है।
ऐसे में सभी पार्टियां मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में करने की जोड़-तोड़ में लगी रहती हैं। समाजवादी पार्टी खुद को मुस्लिम वोट बैंक का सबसे बड़ा अधिकारी बताती है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में मुसलमानों ने सपा पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया। हालांकि, उससे पहले मुस्लिम वोट मायावती के खाते में जाता था। ऐसे में मायावती भी इस वोट बैंक को साधने में कोई कसर नहीं रखना चाहतीं।
मुस्लिम वोट बैंक के लिए चले जा रहे दांव
प्रियंका गांधी की अगुआई में कांग्रेस सलमान खुर्शीद जैसी नेताओं की मदद से उलेमाओं और मुस्लिम समुदायों के बीच पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। इसके मद्देनजर यूपी के लोकप्रिय कवि इमरान प्रतापगढ़ी को कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग का अध्यक्ष बनाया गया। उधर, ओवैसी ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर से गठबंधन करके दूसरे दलों में बेचैनी बढ़ा दी। ओवैसी की पार्टी से सबसे ज्यादा परेशान सपा है, क्योंकि उसे मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी का डर सता रहा है।
बंगाल की तरह उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण का डर
गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा इस बार वोटों के ध्रुवीकरण से बचना चाहती है, क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वह इससे नुकसान उठा चुकी है। भाजपा के रणनीतिकार अच्छी तरह समझते हैं कि उनके लिए उत्तर प्रदेश चुनाव हर हाल में जीतना जरूरी है। हालांकि, जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में जीत हासिल करने के बाद पार्टी उत्साहित है। ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी 2022 में भाजपा की सरकार बनने का दावा कर रहे हैं। ऐसे में भागवत के बयान को इसी ध्रुवीकरण से बचने की एक कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले तीन तलाक के मुद्दे ने मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोकप्रिय बना दिया। ऐसे में संघ के जरिए मुसलमानों के हक की बात करने से पार्टी को फायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।