फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Mohan Bhagwat Madrassa Visit: Muslim community are seeing these efforts of RSS Chief as a positive initiative

Mohan Bhagwat Madrassa Visit: 'सरकारी' मुसलमानों से वार्ता से नहीं बनेगी बात, इन उपायों से मिलेंगे सही नतीजे

Fri, 23 Sep 2022 11:19 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Fri, 23 Sep 2022 11:19 PM IST
विज्ञापन
सार
Mohan Bhagwat Madrassa Visit: इस्लामिक मामलों के जानकार लोगों का मानना है कि हिंदू-मुसलमानों के बीच समस्या ऊपर के स्तर पर नहीं है। यह समस्या निचले स्तर पर है, जबकि दोनों समुदायों में मेल-मिलाप की बातें केवल ऊपर के लोगों से की जा रही हैं। इससे समस्या का समाधान होना संभव नहीं हैं...
loader
Mohan Bhagwat Madrassa Visit: Muslim community are seeing these efforts of RSS Chief as a positive initiative
RSS chief Mohan Bhagwat Madrassa Visit - फोटो : ANI

विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत पिछले एक सप्ताह में कई मुस्लिम नेताओं से मुलाकात कर चुके हैं। मुलाकात का यह सिलसिला आगे भी जारी रहने वाला है। माना जा रहा है कि इन मुलाकातों के जरिये आरएसएस मुस्लिम समुदाय में संघ को लेकर फैली आशंकाओं को दूर करते हुए उनसे बेहतर संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन स्वयं मुस्लिम समुदाय संघ की इन कोशिशों को किस तरह देख रहा है? भाजपा के कुछ नेताओं के द्वारा मुस्लिम समुदाय के लोगों के प्रति की जा रही आपत्तिजनक टिप्पणियों के बीच आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की ये कोशिश कितनी रंग लाएगी?

प्रयासों की गंभीरता को लेकर मुस्लिम समुदाय आशंकित

मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर लोग संघ की इन कोशिशों को एक सकारात्मक पहल के रूप में देख रहे हैं। उन्हें लगता है कि यदि संघ और भाजपा सही नीयत से मुसलमानों के साथ बेहतर संबंध बनाने की कोशिश करते हैं, तो इससे हिंदू-मुसलमान दोनों समुदायों के बीच बेहतर संबंध बनाने में मदद मिल सकती है। लेकिन इन मुलाकातों के पीछे संघ और भाजपा के प्रयासों की गंभीरता को लेकर मुस्लिम समुदाय आशंकित है। उन्हें लगता है कि मुलाकात की ये कोशिशें जमीनी होने की बजाय राजनीतिक कारणों से ज्यादा हैं, जिसका लंबे समय में कोई असर नहीं निकलेगा।



कुछ इस्लामिक मामलों के जानकार लोगों का मानना है कि हिंदू-मुसलमानों के बीच समस्या ऊपर के स्तर पर नहीं है। यह समस्या निचले स्तर पर है, जबकि दोनों समुदायों में मेल-मिलाप की बातें केवल ऊपर के लोगों से की जा रही हैं। इससे समस्या का समाधान होना संभव नहीं हैं। कुछ मुसलमान विद्वानों ने आरोप लगाया कि संघ और सरकार मुसलमानों के नाम पर जिन लोगों से बातचीत कर रहे हैं, वे 'सरकारी मुसलमान' हैं जो सत्ता से लाभ के लिए उसके अनुकूल बातें करते हैं, लेकिन इससे मुस्लिम समुदाय की समस्याओं का समाधान नहीं होता, जिससे किसी समस्या का हल नहीं निकलता। इन लोगों की राय है कि सरकार को निचले स्तर पर मुसलमान समुदाय के लोगों से बातचीत बढ़ानी चाहिए।  

कुछ मुस्लिम विद्वान मानते हैं कि इस देश के अशराफ (उच्च वर्ण के) मुसलमान स्वयं को भारतीय संस्कृति से जोड़कर नहीं देखते, वे स्वयं को देशी पसमांदा मुसलमानों से ऊपर और ज्यादा असली मुसलमान मानते हैं, लिहाजा अपना राजनीतिक महत्त्व बनाए रखने के लिए वे बातचीत में रोड़े अटकाते हैं। इन लोगों का मानना है कि यदि दोनों वर्गों में आपसी एकता बनानी है, तो इसके लिए पसमांदा मुसलमानों के प्रतिनिधियों से निचले स्तर तक बातचीत की जानी चाहिए। देशी भाषा, संस्कृति, बोली और खानपान में हिंदुओं के ज्यादा करीब इन मुसलमानों से बातचीत ज्यादा असरदार साबित हो सकती है।   

वैचारिक मतभेदों को सम्मान दिए बिना नहीं बनेगी बात

‘इमाम-ए-हिंद: राम’ पुस्तक के लेखक डॉ. मोहम्मद अलीम ने अमर उजाला से कहा कि आरएसएस का प्रयास सराहनीय है। किसी भी समस्या का हल बातचीत से ही निकलता है, इसलिए इस बातचीत का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन इस बात को समझना चाहिए कि हिंदू और मुसलमान दोनों धार्मिक समुदायों में कुछ मूलभूत अंतर हैं। जब तक इन मुद्दों पर किस तरह सहमति बनेगी, इसका खाका तैयार नहीं होता, दोनों समुदायों को आंतरिक रूप से करीब लाना मुश्किल होगा।

 

उन्होंने कहा कि डॉ. मोहन भागवत ने मुस्लिम धर्मगुरुओं से मुलाकात में मुसलमानों के द्वारा हिंदुओं को काफिर कहे जाने से बचने की बात कही है। लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि कुरान की दृष्टि में काफिर कौन है और क्या मुसलमान इससे अलग हो सकते हैं? उन्होंने कहा कि कुरान में ‘काफिर’ पर पूरी आयत है। इसमें बहुत स्पष्ट तरीके से कहा गया है कि जो भी ईश्वर के एक होने से इंकार करता है (या बहुदेववाद को स्वीकार करता है) वह काफिर है। क्या करोड़ों देवी देवताओं को मानने वाले हिंदू समुदाय से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने सभी देवी-देवताओं को छोड़कर केवल एक ईश्वर में विश्वास करें? यह संभव नहीं है।

इसी तरह कुरान को अपना सब कुछ समझे वाले मुसलमानों से भी यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अल्लाह के अलावा किसी अन्य ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करेगा। चूंकि, कुरान में बदलाव संभव नहीं है, ऐसे में मुसलमान अपनी इस धार्मिक सोच से अलग नहीं हो सकते। ऐसे में मोहन भागवत और अन्य नेताओं को समझना चाहिए कि ‘काफिर’ शब्द की व्याख्या कैसे की जाएगी और इस पर दोनों समुदायों के विचारों को एक धरातल पर कैसे लाया जा सकेगा? इस पर विचार किया जाना चाहिए।

गोमांस खाने पर विदेश से भी तोड़ेंगे संबंध?

डॉ. मोहम्मद अलीम ने कहा कि इसी प्रकार दोनों समुदायों को करीब लाने के लिए मुसलमानों से गोमांस खाने से परहेज करने की उम्मीद की जा रही है। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या इसी आधार पर भारत सरकार अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से भी अपना संबंध केवल तभी सुधारेगी, जब वहां के लोग गोमांस खाना बंद करेंगे? यदि उनके खानपान को हम उनके जीवन की चीज मानकर छोड़ सकते हैं, तो क्या यही सोच भारतीय मुसलमानों के संदर्भ में नहीं की जा सकती? उन्होंने कहा कि दोनों समुदायों को एक दूसरे की निजताओं का सम्मान करते हुए अपनी अलग पहचान बनाए रखने पर सहमति बनने से दोनों समुदायों में एकता की राह निकल सकती है।        

मुसलमानों के सही प्रतिनिधियों से बात करे आरएसएस

इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ही शीर्ष नेता मुसलमानों के मामलों पर लगातार गंभीरता दिखा रहे हैं। वे न केवल उनके विकास की बात कर रहे हैं, बल्कि दोनों समुदायों के बीच दूरी को पाटने के लिए भी काम करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। इस कोशिश का परिणाम अवश्य निकलेगा, लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि देश के मुसलमानों का असली प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है और किससे बात करने से अपेक्षित परिणाम निकल सकते हैं। चंद धर्मगुरुओं की बजाय उन्हें उन लोगों से बात करनी चाहिए जो देश के बहुसंख्यक मुसलमानों के बीच स्वीकार्य हों।

डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने कहा कि देश के कुल मुसलमानों की 90 फीसदी आबादी गरीब पसमांदा मुसलमानों की है। ये वे मुसलमान हैं जो मूलरूप से हिंदू थे और इतिहास में उन्हें बाद में मुसलमान बना दिया गया। लेकिन इन लोगों की भाषा, बोलचाल, संस्कृति और खानपान आज भी हिंदुओं से बहुत ज्यादा मिलती-जुलती है। आज भी इन मुसलमानों का हिंदू परिवारों से बेहतर संबंध बना हुआ है। उन्होंने कहा कि इसी कारण इस वर्ग से बात करने पर दोनों समुदायों के संबंध बेहतर हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि मोहन भागवत ने जिन लोगों से हाल ही में मुलाकात की है, वे सभी अशराफ वर्ग से हैं और भारतीय मुसलमान उन्हें अपना प्रतिनिधि नहीं मानता। लिहाजा केवल इस स्तर पर बातचीत से बहुत सकारात्मक परिणाम नहीं निकलेंगे। स्वयं को विदेशी मूल का मानने वाले अशराफ मुसलमानों से बात की जाएगी, तो इसके अपेक्षित परिणाम नहीं निकलेंगे क्योंकि उनकी सोच और रहन-सहन भारतीय नहीं है।

बातचीत का असर कार्यों में भी दिखे

फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुकर्रम ने कहा कि बातचीत का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इस बातचीत का असर निचले स्तर पर कार्यों में भी दिखाई पड़ना चाहिए। यदि ऊपरी स्तर पर बातचीत की जाएगी, और निचले स्तर पर भाजपा नेता मुसलमानों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग करेंगे तो इससे कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकलेगा।   

मुस्लिम विद्वान असगर वजाहत ने कहा कि दुनिया की सबसे गंभीर समस्याओं का समाधान बातचीत से निकला है, ऐसे में बातचीत ही दोनों समुदायों में एकता स्थापित करने का सबसे सशक्त और अंतिम माध्यम हो सकती है। उन्होंने कहा कि वे इस बातचीत का स्वागत करते हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed