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मिजोरम चुनावः परंपरा और गुटबाजी बनी कांग्रेस की राह का रोड़ा
चुनाव डेस्क, अमर उजाला
Updated Fri, 02 Nov 2018 07:01 PM IST
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Congress
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मिजोरम का चुनावी इतिहास और अंदरुनी गुटबाजी ही दस साल से राज्य में शासन कर रही कांग्रेस की वापसी की राह में सबसे बड़ी बाधा है। शायद यही वजह है कि दबे-छिपे और धीमे-धीमे ही सही, राज्य में बदलाव की बयार चलने लगी है। पार्टी के कम से कम आधा दर्जन प्रमुख नेता हाल के दिनों में पार्टी का साथ छोड़ गए हैं।
इनमें से एक बुद्ध धन चकमा को तो भाजपा ने हाथोंहाथ लपकते हुए अपना उम्मीदवार भी बना दिया है। चकमा कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे हैं। उनके अलावा 81 वर्षीय विधानसबा अध्यक्ष हाईफेई भी कांग्रेस का टिकट ठकरा कर भाजपा के साथ पींगे बढ़ा रहे हैं।
बीते तीन दशकों से राज्य का चुनावी इतिहास भी अबकी बदलाव का संकेत दे रहा है। यहां हर दस साल के बाद सत्ता बदलती रही है। कांग्रेस ने वर्ष 1988 से 1998 तक यहां सरकार बनाई और चलाई थी। उसके बाद अगले दस वर्षों तक यहां जोरमथांगा की अगुवाई वाले मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का राज रहा।
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उसके बाद अब ललथनहवला की कांग्रेस सरकार ने भी अपने 10 साल पूरे कर लिए हैं। इस लिहाज से अब उस पर खतरे की तलवार लटक रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि हर दस साल पर सत्ता में बदलाव का कोई फार्मूला कोई अचूक नहीं है। लेकिन बावजूद इसके इस बार राज्य की इस परंपरा की चर्चा तो होने ही लगी है।
अबकी विधानसभा चुनावों में पहले के मुकाबले एक बदलाव नजर आ रहा है। वह यह है कि पहले जहां हर चुनाव में कांग्रेस का मुकाबला एमएनएफ या दूसरे क्षेत्रीय दलों के साथ था वहीं अबकी भाजपा के उदय ने राजनीतिक समीकरणों को कुछ हद तक बदल दिया है। हालांकि ज्यादातर लोगों को यह नहीं लगता कि पार्टी अबकी ज्यादा कुछ कर पाएगी।
दूसरी ओर, कांग्रेस अपने नेताओं के पलायनों से परेशान है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ललथनहवला का दावा है कि कुछ नेताओं के जाने से चुनावी संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कांग्रेस से पलायन करने वालों की सूची में ताजा नाम जुड़ा है विधानसभा अध्यक्ष हाइफेई का।
उन्होंने दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ मुलाकात की है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जी.वे. लूना कहते हैं कि उनको इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। उधर, कांग्रेस के नेता भूपेन बोरा कहते हैं कि प्रदेश कांग्रेस ने आलाकमान से हाईफेई की उम्मीदवारी वापस लेने का अनुरोध किया है।
उन्होंने कहा कि हाईफेई के अनुभव व उम्र को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने उनको टिकट देने का फैसला किया था। लेकिन पार्टी के ज्यादातर कार्यकर्ता इस फैसले का विरोध कर रहे थे। अबकी उनके जीतने की संभावना भी कम थी।
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इनमें से एक बुद्ध धन चकमा को तो भाजपा ने हाथोंहाथ लपकते हुए अपना उम्मीदवार भी बना दिया है। चकमा कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे हैं। उनके अलावा 81 वर्षीय विधानसबा अध्यक्ष हाईफेई भी कांग्रेस का टिकट ठकरा कर भाजपा के साथ पींगे बढ़ा रहे हैं।
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बीते तीन दशकों से राज्य का चुनावी इतिहास भी अबकी बदलाव का संकेत दे रहा है। यहां हर दस साल के बाद सत्ता बदलती रही है। कांग्रेस ने वर्ष 1988 से 1998 तक यहां सरकार बनाई और चलाई थी। उसके बाद अगले दस वर्षों तक यहां जोरमथांगा की अगुवाई वाले मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का राज रहा।
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उसके बाद अब ललथनहवला की कांग्रेस सरकार ने भी अपने 10 साल पूरे कर लिए हैं। इस लिहाज से अब उस पर खतरे की तलवार लटक रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि हर दस साल पर सत्ता में बदलाव का कोई फार्मूला कोई अचूक नहीं है। लेकिन बावजूद इसके इस बार राज्य की इस परंपरा की चर्चा तो होने ही लगी है।
अबकी विधानसभा चुनावों में पहले के मुकाबले एक बदलाव नजर आ रहा है। वह यह है कि पहले जहां हर चुनाव में कांग्रेस का मुकाबला एमएनएफ या दूसरे क्षेत्रीय दलों के साथ था वहीं अबकी भाजपा के उदय ने राजनीतिक समीकरणों को कुछ हद तक बदल दिया है। हालांकि ज्यादातर लोगों को यह नहीं लगता कि पार्टी अबकी ज्यादा कुछ कर पाएगी।
दूसरी ओर, कांग्रेस अपने नेताओं के पलायनों से परेशान है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ललथनहवला का दावा है कि कुछ नेताओं के जाने से चुनावी संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कांग्रेस से पलायन करने वालों की सूची में ताजा नाम जुड़ा है विधानसभा अध्यक्ष हाइफेई का।
उन्होंने दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ मुलाकात की है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जी.वे. लूना कहते हैं कि उनको इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। उधर, कांग्रेस के नेता भूपेन बोरा कहते हैं कि प्रदेश कांग्रेस ने आलाकमान से हाईफेई की उम्मीदवारी वापस लेने का अनुरोध किया है।
उन्होंने कहा कि हाईफेई के अनुभव व उम्र को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने उनको टिकट देने का फैसला किया था। लेकिन पार्टी के ज्यादातर कार्यकर्ता इस फैसले का विरोध कर रहे थे। अबकी उनके जीतने की संभावना भी कम थी।