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आरएसएस की अल्पसंख्यकों के प्रति नरमी से आश्वस्त नहीं हैं मुसलमान

Sun, 11 Nov 2018 06:19 PM IST
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली Updated Sun, 11 Nov 2018 06:19 PM IST
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Mohan Bhagwat

सितंबर महीने में राष्ट्रीय सेवक संघ (आरएसएस) ने दिल्ली में 'भविष्य का भारत' नाम से एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस कार्यक्रम के दूसरे दिन 18 सितंबर को बोलते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि संघ मुसलमानों के खिलाफ नहीं है। वह ऐसे हिंदुत्व की बात करते हैं जिसमें मुसलमानों के साथ सभी वर्गों के लोग एक साथ रह सकते हों। इसे भागवत की आरएसएस की परंपरागत 'कट्टर हिंदूवादी छवि' को बदलने की कोशिश के तौर पर देखा गया। इसी क्रम पर चलते हुए मोहन भागवत ने एक बार फिर इसाई अल्पसंख्यकों के प्रति अपने नरम रुख का परिचय दिया है।

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उन्होंने दत्तोपंत ठेंगड़ी पर दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक व्याख्यान माला के दौरान इसाइयों के प्रति अपने नरम रुख का संकेत देते हुए कहा कि भारत अनेक धर्म-संप्रदाय वाला देश है। यहां सबको साथ लेकर चलना पड़ता है, और चलना भी चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें भी कुछ लोग 31 दिसंबर को नए वर्ष की शुभकामनाएं देते हैं। वे इसे अस्वीकार नहीं करते, बल्कि उसे भी धन्यवाद देते हैं। उनके मुताबिक भारत जैसे बहुलतावादी देश में सबकी भावनाओं को साथ में लेकर चलना ही उचित होता है। 
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'संघ की 'डॉग व्हिसिल पॉलिटिक्स'
आरएसएस के इस 'नरम' रवैये पर अपनी टिप्पणी देते हुए राष्ट्रीय जनता दल के नेता मनोज झा कहते हैं कि यह संघ की 'डॉग व्हिसिल पॉलिटिक्स' है, यानी दिखाने के लिए उसके बोल अलग होते हैं, लेकिन उसके मन में इरादा कुछ और होता है। उनका कहना है कि आरएसएस  का यह बदलाव उसकी पुरानी छवि में कोई बदलाव नहीं ला सकता जिसमें संघ कई बार सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर दिखने की कोशिश करता है। वह सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से उलट जाकर कानून-संविधान के परिवर्तन के आदर्श से प्रेरित होकर काम करता है। एक वर्ग विशेष के प्रति उसकी भावनाएं क्या रही हैं, इसे न तो किसी को बताने की जरुरत है और न ही उसमें कुछ बयानों से कोई अंतर आ सकता है। 
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'आरएसएस की चुनावी चाल'
वहीं कांग्रेस नेता राशिद अल्वी इसे आरएसएस की चुनावी चाल बताते हैं। उन्होंने कहा कि जब से सरकार सत्ता में आई है, उसने लगातार अल्पसंख्यकों के प्रति कटुतापूर्ण माहौल बनाने की कोशिश की। अनेक ऐसे फैसले हुए जो अल्पसंख्यकों की भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले थे।

उन्होंने कहा कि अब चुनाव आ गए हैं। सरकार और संघ को इस बात का एहसास हो गया है कि सभी अल्पसंख्यक एक होकर उसके खिलाफ वोट करने वाले हैं, तब संघ इस तरह नरम होने का संकेत देना चाहता है। दरअसल, वह अल्पसंख्यकों को एक होने से रोकना चाहता है। 

'बदलाव की बजाय सच्चाई सामने आ रही'
विपक्षी दलों से अलग आरएसएस के आनुषांगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद (विहिप) का कहना है कि आरएसएस या विहिप कभी भी पूरे मुस्लिम समाज के खिलाफ नहीं रहा है। यह विपक्षी पार्टियों का दुष्प्रचार रहा है जो अब लोगों के सामने खुल रहा है। विहिप के सह सचिव विजय शंकर तिवारी ने कहा कि हमारे कार्यक्रमों में हमेशा वीर अब्दुल हमीद, अशफाक उल्ला खां और अब पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जैसे लोगों का सम्मान किया जाता रहा है।


ऐसे में इन संगठनों को पूरे मुस्लिम या किसी अन्य के खिलाफ होने की बात करना बेहद अनुचित है। सच्चाई यह है कि उनकी खिलाफत केवल उन लोगों से है जो भारत तेरे टुकड़े होंगे वाले 'गैंग' का समर्थन करते हैं। तिवारी के मुताबिक यह संघ या विहिप की नीतियों में किसी बदलाव की बजाय सच्चाई सामने आने की तरह देखा जाना चाहिए।   

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