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Mayawati: अगले साल खुलेंगे मायावती के 'सियासी पत्ते', यह पांच महीने तय करेंगे आगे की ऐसी राह

Thu, 20 Jul 2023 06:14 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Thu, 20 Jul 2023 06:14 PM IST
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सार
Mayawati: राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनावों से पहले जितने राज्यों में विधानसभा के चुनाव होंगे, वहां पर मायावती फिलहाल अकेले ही सियासी मैदान में नजर आएंगी। इसमें इस साल होने वाले चार राज्यों के चुनावों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना शामिल हैं...
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Mayawati political cards will open next year, these five months will decide the way forward
Mayawati - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने तय किया है कि उनका सियासी गठबंधन किसी से नहीं होगा। इसी के साथ बसपा आने वाले चुनावों में फिलहाल अकेले ही सियासी मैदान में नजर आएगी। लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मायावती की किसी भी दल से गठबंधन न करने की योजना फिलहाल इस साल होने वाले वाले विधानसभा के चुनावों तक के लिए ही लग रही है। जैसे ही लोकसभा चुनाव से पहले के राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव खत्म होंगे, तो मायावती के असली सियासी पत्ते खुलने शुरू होंगे। फिर तय होगा कि मायावती राजनीतिक गठबंधन का रुख किस ओर जाएगा।

यह भी पढ़ें: कुरुक्षेत्र: सिर्फ नेता पर ही नहीं, नाम और मुद्दों पर भी होगा 2024 का लोकसभा चुनाव

चार राज्यों में मायावती का होगा अकेले लड़ने वाला टेस्ट

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनावों से पहले जितने राज्यों में विधानसभा के चुनाव होंगे, वहां पर मायावती फिलहाल अकेले ही सियासी मैदान में नजर आएंगी। इसमें इस साल होने वाले चार राज्यों के चुनावों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना शामिल हैं। वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषण जटाशंकर सिंह कहते हैं कि जिन राज्यों में इस साल चुनाव होने हैं मायावती वहां पर अकेले चुनाव लड़कर अपनी पार्टी का सियासी कद आंकना चाह रही हैं। वह कहते हैं इन राज्यों में होने वाले विधानसभा के चुनावों के परिणाम और बहुजन समाज पार्टी को मिले वोट प्रतिशत से लोकसभा के चुनावों में होने वाले गठबंधन की दशा और दिशा मायावती तय करेंगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मायावती ने जो भी योजना बनाई है, वह फिलहाल इस साल होने वाले चार राज्यों के विधानसभा के चुनावों के मद्देनजर ही बनती हुई नजर आ रही है।

दलित और मुस्लिम वोटों पर पकड़ से तय होगा पैमाना

राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला का कहना है कि मायावती जिस तरीके से दलितों और मुस्लिमों को अपने साथ जोड़ कर बड़ी सियासी चाल चल रही हैं, उससे तो यही लगता है कि यह चार राज्य उनके लिए सियासी प्रयोग की जमीन बनेगी। जीडी शुक्ला कहते हैं कि मायावती ने जो भी फॉर्मूला तय किया है, वह बहुत ही सोच समझकर और अपनी पार्टी को दोबारा जिंदा करने और मजबूत हैसियत में खड़ा करने के लिहाज से ही तय किया है। क्योंकि बीते कुछ चुनावों में बसपा पार्टी का सियासी ग्राफ जिस तरीके से नीचे गिरा है, उससे फिलहाल पार्टी किसी भी तरीके के गठबंधन से बचना चाह रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस साल होने वाले राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के चुनावों में मायावती का वोट प्रतिशत जिस तरह से होगा, उसके आधार पर ही लोकसभा के चुनाव की रणनीति बनाई जाएगी। क्योंकि 2018 के इन चार राज्यों में हुए चुनावों में मायावती की पार्टी का वोट प्रतिशत एक से डेढ़ फीसदी के करीब ही रहा था। बहुजन समाज पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि उनकी पार्टी इस बार राज्यों में ज्यादा वोट प्रतिशत के साथ विधानसभा की सीटें भी जीतेगी। सियासी जानकारों का कहना है कि मायावती इस बार दलित और मुस्लिम के कॉन्बिनेशन को सियासत में मजबूती के साथ सभी राज्यों में उतार रही है।

लोकसभा में बसपा की वजह से सपा का वोट हुआ था कम

लोकसभा के चुनावों का अगर आकलन किया जाए, तो पता चलता है कि मायावती के वोट प्रतिशत में फिलहाल इन चुनावों में तो सेंधमारी नहीं हो पाई है। आंकड़ों के मुताबिक 2014 में बहुजन समाज पार्टी की एक भी सीट नहीं थी। बावजूद इसके बसपा का वोट प्रतिशत 19.60 था। जबकि 2019 में देश के सबसे बड़े सियासी गठबंधन में से एक कहे जाने वाले सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल के साथ जब मायावती चुनाव में उतरीं, तो उन्हें 10 सीटें मिलीं, लेकिन वोट प्रतिशत 2014 के मुकाबले तकरीबन बराबर ही रहा। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनावों के वोट प्रतिशत को अगर सियासी नजरिए से देखें, तो सबसे बड़ी सेंधमारी समाजवादी पार्टी के वोट बैंक में हुई। 2014 में समाजवादी पार्टी को 22.20 वोट मिले थे। जबकि 2019 में बहुजन समाज पार्टी के साथ हुए गठबंधन में महज 17.96 फीसदी ही वोट मिल सके। इस दौरान सपा की सीटें भी पांच ही रही। जबकि 2014 की तुलना में 2019 में भाजपा का वोट प्रतिशत 7 फ़ीसदी से ज्यादा हुआ, जो कि 49.6 फीसदी के पास है पहुंच गया था।

इसीलिए मायावती लोकसभा चुनावों के लिए खेल रही है 'सेफ गेम'

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लोकसभा के चुनावों में मिले वोट प्रतिशत को आधार मानते हुए ही मायावती बहुत सेफ गेम खेल रहीं हैं। सियासी विश्लेषक जटाशंकर सिंह कहते हैं कि जिस तरीके से समाजवादी पार्टी इस बार के चुनाव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ों के सियासी कॉन्बिनेशन सियासी मैदान में आगे तो बढ़ रही हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की राजनीति में फिलहाल यह कहना कि सिर्फ समाजवादी पार्टी ही उनकी रहनुमाई करेगी, यह अब के दौर में थोड़ा कठिन दिख रहा है। उनका कहना है जिस तरीके से कर्नाटक के चुनाव में मुसलमानों ने कांग्रेस पर भरोसा जताया। उत्तर प्रदेश में बसपा लगातार मुसलमानों पर भरोसा जताते हुए उनको टिकट भी दे रही है। बसपा इसी का पॉलिटिकल माइलेज उठाना चाह रही हैं। यही वजह है कि मायावती फिलहाल सियासी गठबंधन के लिए कोई जल्दबाजी नहीं दिखाना चाह रही है।

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