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मंजिलें और भी हैं: भाई की मौत ने लोगों को बचाने का जुनून पैदा किया

शिवा Updated Mon, 20 May 2019 11:56 AM IST
सच्ची घटना पर आधारित (प्रतीकात्मक तस्वीर)
सच्ची घटना पर आधारित (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया
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मैं हैदराबाद में रहता हूं। पिछले करीब पंद्रह साल से मैं शहर के हुसैन सागर लेक और आसपास के इलाकों में आत्महत्या की कोशिश करने वाले लोगों को बचाने का काम करता हूं। मैं जब छोटा था, तब बहुत शरारत करता था। इससे परेशान होकर मेरे माता-पिता ने मुझे होस्टल में डाल दिया था।
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मेरा होस्टल स्कूल से बहुत दूर था। एक दिन जब मैं स्कूल से होस्टल लौट रहा था, तो सड़क से एक धार्मिक जुलूस निकल रहा था और बहुत भीड़ थी। मैं भारी भीड़ देखकर डर गया और भागते-भागते भटक गया। मैं इतना बदकिस्मत था कि न होस्टल लौट पाया और न ही अपने मां-बाप से मिल पाया। मेरी जिंदगी एक झटके में बेहद नाटकीय ढंग से बदल गई। कहां मैं पढ़-लिखकर बड़ी नौकरी करता, और कहां अब मैं अपनी भूख मिटाने के लिए सड़क पर भीख मांग रहा था।

उसी दौरान एक महिला से मेरी मुलाकात हुई, जिसने मुझे अपना बेटा मान लिया। इस तरह सड़क पर मुझे दूसरी मां मिल गई थी। वह अपने बच्चों और मुझमें कोई भेदभाव नहीं करती थी। जल्दी ही मुझे एहसास हुो गया कि दूसरी मां से मिलाकर ईश्वर ने मेरे साथ हुए अन्याय का खात्मा कर दिया है। लेकिन मेरी खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी। एक दिन मेरे बड़े भैया हुसैन सागर लेक घूमने गए थे। वहां उन्होंने किसी को पानी में डूबते देखा, तो छलांग लगा ली। पर अनजान आदमी के साथ-साथ वह खुद भी डूब गए। यह खबर जब मां को मिली, तो रो-रोकर उनका बुरा हाल था।

मुझे बहुत अफसोस हो रहा था कि जिस महिला ने मुझ जैसे एक सड़क पर के लड़के को अपने बेटे की तरह पाला, उनके साथ ऐसा अन्याय नहीं होना चाहिए था। काश, भैया की जगह मैं होता। अफसोस की बात यह थी कि वे दोनों लाशें भी नहीं मिली थीं। उस हादसे के बाद मैंने दो प्रण किए। एक यह कि हुसैन सागर लेक में किसी को डूबकर मरने नहीं दूंगा। और दूसरा यह कि कोई उसमें डूबकर मर गया हो, तो उसका शव बाहर निकाल लाऊंगा, ताकि उसके परिवार वालों को अंतिम संस्कार में असुविधा न हो।

हुसैन सागर लेक बेहद खूबसूरत तो है ही, यहां बहुत लोग आत्महत्या करने के लिए भी आते हैं। मैंने अब तक यहां लगभग एक सौ लोगों की जान बचाई है। ये वे लोग हैं, जिन्होंने लेक में कूदकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। जबकि लेक से अभी तक एक हजार से अधिक शव मैंने निकाले हैं। मैं उन शवों का अंतिम संस्कार भी कर देता हूं, जिनके कोई रिश्तेदार नहीं मिलते। चूंकि मैं लंबे समय से यह काम कर रहा हूं, इसलिए स्थानीय पुलिस मेरी मदद करती है, और मेरी सहायता लेती भी है।

जैसे कि कभी-कभी वह देर शाम या रात को लेक में किसी शव के होने की मुझे सूचना देती है। मैं लाश को लेक से बाहर निकालने में पुलिस की मदद करता हूं। जिन लोगों की मैंने जान बचाई है, उनके परिजन भी मेरे अभियान में मदद करते हैं। मेरी कोई नौकरी नहीं है। त्योहारों पर लेक में जो प्रतिामाएं विसर्जित की जाती हैं, उनमें से लोहा और दूसरे धातु निकालकर मैं बाजार में बेचता हूं।

कभी-कभी पुलिस विभाग भी मेरी कुछ आर्थिक मदद करता है। मेरी आय काफी नहीं है, और राज्य सरकार ने भी मेरी कोई मदद नहीं की है। पर लोगों की जान बचाने के अपने काम से मैं संतुष्ट हूं। अभी तो मैं जवान हूं। जब तक मेरा शरीर साथ देगा, मैं यह काम करता रहूंगा। -विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित

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