मणिपुर: कोबरा कमांडो दुनिया की टॉप कमांडो फोर्सेज को देते हैं टक्कर, 'जंगल युद्ध' में हैं पारंगत; खासियत जानें
देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' की कोबरा इकाई (कमांडो बटालियन फॉर रेजोल्यूट एक्शन) के जांबाज, जिन्हें अब मणिपुर में भेजा गया है, वे वैश्विक स्तर पर टॉप कमांडो फोर्सेज को टक्कर देते हैं
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देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' की कोबरा इकाई (कमांडो बटालियन फॉर रेजोल्यूट एक्शन) के जांबाज, जिन्हें अब मणिपुर में भेजा गया है, वे वैश्विक स्तर पर टॉप कमांडो फोर्सेज को टक्कर देते हैं। ये कमांडो 11 दिन तक बिना किसी मदद के जंगल में दुश्मन से लड़ सकते हैं। 'कोबरा' कमांडो को अमेरिका की मरीन फोर्स की तर्ज पर ट्रेनिंग दी गई है। यही वजह है कि इन्हें मरीन फोर्स की टक्कर का माना जाता है। ये कमांडो, 'जंगल युद्ध' में पारंगत होते हैं। देश के विभिन्न राज्यों में हुए नक्सलियों के खात्मे में कोबरा इकाई का अहम योगदान रहा है।
जंगलों में गुरिल्ला युद्ध के लिए सीआरपीएफ की इस विशेष इकाई का गठन 2008-09 में किया गया था। फिलहाल इस फोर्स की कुल दस बटालियन (दस हजार से अधिक जवान) हैं। हथियार, खुफिया जानकारी, आईईडी का पता लगाना और दूसरे तकनीकी उपकरणों के मामले में यह फोर्स किसी दूसरे संगठन पर निर्भर नहीं होती। कोबरा के पूर्व आईजी केके शर्मा बताते हैं, इस फोर्स की सबसे बड़ी खासियत है कि इसने लड़ कर सीखा है। किसी भी मोर्चे पर जाने से पहले ट्रेनिंग तो दी जाती है, लेकिन कोबरा ने खूंखार नक्सलियों के बीच हर पल सीखा है। ये कमांडो आईईडी से निपटने में ट्रेंड हैं तो वहीं एंबुश से बाहर कैसे आना है, इसमें भी कोबरा जवान एक्सपर्ट हैं।
आतंक रोधी अभियानों में खुद को किया साबित ...
कोबरा कमांडो ने नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों की कमर तोड़ने में बड़ी भूमिका अदा की है। अब इस यूनिट को मणिपुर में उग्रवादियों के खिलाफ विशेष ऑपरेशन में लगाया गया है। कश्मीर में भी इस यूनिट को बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना है। साल 2015 में गणतंत्र दिवस की परेड में पहली बार सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो राष्ट्र के सामने आए थे। कोबरा यूनिट का गठन करने से पहले यूएस मेरिन कमांडो, उनकी ट्रेनिंग, वर्किंग स्टाइल, सर्जीकल स्ट्राइक और दूसरे कई तरह के ऑपरेशन की जानकारी ली गई। इन सबके बाद ही कोबरा यूनिट स्थापित हुई थी।
दूसरे सभी बलों से अलग है 'कोबरा' ...
यह विशिष्ट कमांडो फोर्स जंगल में बिना किसी मदद के छह से 11 दिन तक लड़ सकती है। इसी वजह से कोबरा विश्व में उच्च स्थान पर है। नक्सलियों, आतंकियों से लड़ने और दूसरे बड़े ऑपरेशनों के लिए इस विशिष्ट फोर्स को खास तरह की ट्रेनिंग दी गई है। हथियार, वर्दी एवं तकनीकी उपकरणों के मामले में भी 'कोबरा' दूसरे सभी बलों से पूरी तरह अलग है। अमेरिकन मरीन कमांडो बिना किसी मदद के जंगल में लगातार तीन रातों तक लड़ सकते हैं। दूसरी ओर कोबरा के हर जवान के लिए ट्रेनिंग के दौरान सात दिन तक जंगल में लड़ने की परीक्षा पास करना अनिवार्य है।
23 किलो वजन के साथ 11 रातें जंगल में…
कोबरा ने सारंडा (झारखंड) के घने जंगलों में 11 दिन तक बिना किसी सहायता के एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया था। वजन लेकर जंगल में नियमित रूप से लड़ते रहने का रिकॉर्ड ब्रिटेन के विशिष्ट कमांडो दस्ते 'एसएएस' के नाम पर है। यह दस्ता 30 किलो वजन उठाकर दस रातें जंगल में गुजार सकता है, जबकि कोबरा 23 किलो वजन के साथ 11 रातों तक गहन जंगल से गुजरने में समर्थ है।
जंगल में जीवित रहने का प्रशिक्षण...
चूंकि कोबरा को बाहर से कोई मदद नहीं मिलती, इसलिए इन्हें खास प्रशिक्षण दिया जाता है। मैगी जैसी कोई खाद्य सामग्री इन्हें प्रदान की जाती है। पानी की बोतल को झरने या तालाब से भरना पड़ता है। खाने का सामान खत्म हो जाता है तो जंगली सामग्री से काम चलाना पड़ेगा।जवानों को ट्रेनिंग में कई जंगली वनस्पतियों की जानकारी दी जाती है।कोबरा कमांडो अपने जूते और वर्दी एक मिनट के लिए भी नहीं उतारते।
कोबरा कमांडो की खासियत...
- यूएस मेरिन कमांडो की तर्ज पर कोबरा को मरपट (मेरिन पैटर्न) वर्दी मिलती है
- इसमें सभी तकनीकी उपकरण लगे होते हैं
- कोबरा कमांडो को यूएस आर्मी जैसा पैसजट (पर्सनल आर्मर सिस्टम-ग्राउंड टू्रप्स) हेलमेट
- यूएस के एम-1 हेलमेट के अलावा जर्मन आर्मी का ‘स्टेहेलम’ हेलमेट भी कोबरा की शान
- इस्राइल निर्मित एमटीएआर व एक्स-95 राइफल
- खुखरी की तर्ज पर कोबरा कमांडो ‘मैशे’ चाकू से लैस हैं
- जीपीएस के अलावा रात को दिखने में मदद करने वाला चश्मा