फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Manglesh Dabral: A Poet who lived poetry like a life values

मंगलेश डबराल: कविता को जीवन मूल्यों की तरह जीने वाला कवि 

Thu, 10 Dec 2020 06:31 AM IST
Amit Mandal यश मालवीय, वरिष्ठ कवि 
यश मालवीय, वरिष्ठ कवि  Published by: Amit Mandal Updated Thu, 10 Dec 2020 06:31 AM IST
विज्ञापन
Manglesh Dabral: A Poet who lived poetry like a life values
मंगेश डबराल

मंगलेश डबराल ने साहित्यिक सफर इलाहाबाद से ही शुरू किया था और पत्रकारिता की धार भी उन्हें इलाहाबाद से ही मिली। इलाहाबाद में उन्होंने 'अमृत प्रभात' में घूमता आइना स्तंभ शुरू किया था, जिसे उनके कवि मित्र वीरेन डंगवाल लिखा करते थे। रामजी पांडेय, मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल की तिकड़ी को महादेवी जी त्रिदेव कहा करती थीं। तब कॉफी हाउस में मंगलेश भाई नियमित बैठकी करते थे। उन्हें विजय देव नारायण साही जी संग कविता पर विमर्श करते देखा। उन्हीं दिनों उनका पहला कविता संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन' प्रकाशित हुआ। 

विज्ञापन


जगदीश गुप्त, लक्ष्मीकांत वर्मा, विपिन अग्रवाल और केशवचंद्र वर्मा ने 80 के दशक में इस बड़े कवि को पहचान लिया था। उनका न रहना कविता की मुख्यधारा को एक बड़ा नुकसान है। मंगलेश जी कविता को प्यार करते थे, क्योंकि जीवन को प्यार करते थे। जनसत्ता में रहते हुए उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता का मानक रचा था। अपनी संगतकार कविता में उन्होंने मुख्य गायक के साथ संगत करते कलाकार की त्रासदी को गहरी मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। हिंदी कविता का बड़ा आसमान थे। 
विज्ञापन


सांप्रदायिकता के खिलाफ एक्टिविस्ट कवि के रूप में भी सामने आते थे। कविता को जीवन मूल्यों की ही तरह उन्होंने जिया, कभी ठेठ कवि सम्मेलनी माहौल में भी उन्हें जनता से गंभीर संवाद करते देखा। एक बार भोपाल में उनके कविता संग्रह 'घर का रास्ता' पर विमर्श हुआ। आयोजक थे कवि भगवत रावत। उन्होंने कहा था कि घर का रास्ता ही वस्तुत: कविता का रास्ता है, क्योंकि यह नए मनुष्य की प्रतिष्ठा करती है।  
विज्ञापन
विज्ञापन


उनकी कविता, कविता के व्यस्त ट्रैफिक में बाएं हाथ चलने की तमीज भी देती थी। उन्होंने कहा है कि जो अपने समय से जुड़कर कलम चलाता है, वही कालजयी भी होता है। शब्द की सत्ता वह बखूबी जानते थे, इसलिए शब्दों संग अंतिम समय तक रहे। अस्वस्थ होने से पहले वह मुंबई के मनीष गुप्ता के हिंदी कविता के मंच से सार्थक संवाद कर रहे थे। प्रखर कवि पंकज चतुर्वेदी ने एक आयोजन में उन्हें आलीशान कमरे में ठहरा दिया, मंगलेश भाई बोले कि मुझे उस कमरे में ले चलो, जहां चारों तरफ किताबें हों। उनकी दौलत किताबें ही थीं, तभी वह 'लेखक की रोटी' जैसा विलक्षण गद्य रच सके। कृष्णा सोबती कहती थीं कि लेखक की जिंदगी उसकी मौत के बाद शुरू होती है। उनका लिखा हिंदी कविता के कीर्तिपुरुष शमशेर बहादुर सिंह के शब्दों में काल से होड़ लेता हुआ सा है। पिछले ही महीने हिंदी कविता की लय पर फोन पर ही वह डूबकर बात कर रहे थे। इस कठिन समय में, उनके न रहने पर उम्मीद फाज़ली साहब का एक शेर इस वक्त याद आ रहा है- कल उसकी आंखों ने क्या जिंदा गुफ्तगू की थी, गुमान तक न हुआ वो बिछुड़ने वाला है...। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed