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क्या विपक्ष एकजुट होगा? : लगातार कोशिश कर रहीं ममता बनर्जी, जानें कितने सफल रहे हैं सत्ताधारी दल के खिलाफ बने गठबंधन

Tue, 19 Apr 2022 11:44 AM IST
जयदेव सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Tue, 19 Apr 2022 11:44 AM IST
सार

2019 लोकसभा चुनाव से पहले भी विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशें हुई थीं। चुनाव से पहले ममता के न्योते पर विपक्षी दलों के नेता कोलकाता में एकजुट भी हुए थे। सब ने मंच भी साझा किया। हालांकि, चुनाव में कोई औपचारिक गठबंधन नहीं बन सका था।

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विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में ममता बनर्जी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री जल्द ही मुंबई में मिल सकते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है। ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव बीते कुछ दिनों से विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में लगे हुए हैं। इन दोनों की कोशिश कितनी सफल होगी ये तो वक्त बताएगा, लेकिन ऐसा नहीं है कि इस तरह की कोशिश पहली बार हो रही है।

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पहले भी कुछ मौकों पर भाजपा के खिलाफ इस तरह के गठबंधन की कोशिश हो चुकी है। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के पहले भी कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ इस तरह के गठबंधन बने हैं। आइये जानते हैं देश की राजनीति में पहले कितनी सफल रही हैं इस तरह की कोशिशें? 

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ममता बनर्जी और चंद्रशेखर राव - फोटो : अमर उजाला

मौजूदा दौर में ममता बनर्जी और के. चंद्रशेखर राव की ओर से इस तरह की कोशिश जारी है। चंद्रशेखर राव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार हमले कर रहे हैं। इसके साथ ही तेलंगाना के बाहर भी अपनी सरकार की उपलब्धियों के प्रचार कर रहे हैं। 10 मार्च को जब पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आ रहे थे तब भी के चंद्रशेखर राव महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मिलने पहुंचे थे।

वहीं, ममता बनर्जी भी लगातार अपनी पार्टी का काडर बढ़ाने में लगी हैं। बंगाल के बाहर खासतौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों में कई बड़े कांग्रेस नेता उनकी पार्टी में शामिल हो चुके हैं। पार्टी मजबूत करने के साथ ही ममता विपक्ष को एकजुट करने में लगी हुई हैं। चाहे उत्तर प्रदेश में अखिलेश के लिए वोट मांगने जाना हो या फिर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन से मिलना, ममता हर विपक्षी नेता को एक मंच पर लाने में लगी हुई हैं। 

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी इस तरह की कोशिश हुई थी।

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2019 में भी एक मंच पर दिखे थे विपक्ष के कई नेता। - फोटो : अमर उजाला

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले भी विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशें हुई थीं। चुनाव से पहले ममता के न्योते पर विपक्षी दलों के नेता कोलकाता में एकजुट भी हुए थे। सब ने मंच भी साझा किया। अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक इस मंच पर दिखे थे। लोकसभा चुनाव से पहले तेलंगाना विधानसभा चुनाव में मिली जीत से उत्साहित के चंद्रशेखर राव भी इस तरह की कोशिशों में जुटे थे। हालांकि, चुनाव में कोई औपचारिक गठबंधन नहीं बन सका था। अब एक बार फिर ममता और चंद्रशेखर राव 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं।     

पहला सफल प्रयोग थी 1977 की विपक्षी एकता 
1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया। करीब डेढ़ साल बाद जनवरी 1977 में जब इंदिरा ने चुनाव कराने की बात कही। इसके बाद राजनीतिक कैदियों को छोड़ा गया। 23 जनवरी 1977 को जनसंघ, भारतीय लोकदल, स्वतंत्र पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी जैसी विपक्षी पार्टियों का विलय करके एक नई पार्टी बनाई गई। नाम मिला जनता पार्टी मिला। चुनाव हुए और जनता पार्टी को बहुत बड़ी जीत मिली। 

सत्ताधारी दल के खिलाफ बना गठबंधन सफल रहा। हालांकि, लम्बा नहीं चल सका। आपसी कलह के चलते तीन साल में ही जनता सरकार गिर गई। पार्टी के समाजवादी, राष्ट्रवादी धड़े अलग-अलग हो गए। 1980 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने फिर से वापसी की। जनता पार्टी के अलग-अलग टुकड़ों से ही भारतीय जनता पार्टी, लोकदल जैसी पार्टियां अस्तित्व में आईं। 



 
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1989 राजीव विरोधी गठबंधन को मिली जीत

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राजीव गांधी और सोनिया गांधी। - फोटो : अमर उजाला

1989 में एक बार फिर सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ विपक्ष एकजुट हुआ। इस बार ये काम किया वीपी सिंह ने। कभी राजीव गांधी के खास रहे वीपी सिंह ने उन्ही के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। 1988 में उनके नेतृत्व में जनता पार्टी से अलग हुईं लोकदल, जन मोर्चा और कांग्रेस (जगजीवन) जैसी पार्टियों को मिलाकर एक नया दल जनता दल बनाया।

1989 के लोकसभा चुनाव में वीपी सिंह के जनता दल ने आध्र प्रदेश की तेलगू देशम पार्टी, तमिलनाडु के डीएमके और असम की असम गढ़ परिषद जैसे क्षेत्रीय दलों को अपने साथ लिया तो दक्षिणपंथी भाजपा के साथ ही वमपंथी लेफ्ट पार्टियां भी इस गठबंधन का हिस्सा बनीं। वीपी सिंह का नेशनल फ्रंट राजीव गांधी को हराने में सफल रहा। ये गठबंधन सत्ता में तो आ गया, लेकिन ज्यादा समय तक टिक नहीं सका। भाजपा के समर्थन वापस लेने से वीपी सिंह की सरकार गिर गई।

जनता दल के दो हिस्से हो गए। चंद्रशेखर के धड़े ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई। हालांकि, ये सरकार भी ज्यादा नहीं टिकी। गठबंधन ही नहीं, जनता दल का विघटन भी साल दर साल होता रहा। इसी जनता दल से टूटकर समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल सेक्युलर, जनता दल यूनाइटेड जैसे कई दल बने। 

चुनाव बाद बना गठबंधन, दो साल में ही सत्ता से बाहर
1977 और 1989 में चुनाव पूर्व पार्टियों के विलय और गठबंधन बने। चुनाव में इन्हें जीत मिली और सत्ताधारी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। 1996 का गठबंधन पिछली दो बार के मुकाबले अलग रहा। 1996 के लोकसभा चुनाव में किसी भी दल या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला। चुनाव नतीजों के बाद जनता दल, वाम दलों और कई क्षेत्रीय दलों ने मिलकर एक गठबंधन बनाया। 13 दलों के इस गठंधन को संयुक्त मोर्चा नाम मिला। गठबंधन के साथ ही संयुक्त मोर्चा सत्ता में आया। कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन से सरकार बनी। दो साल में इस गठबंधन से दो प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री बदलने के बाद भी गठबंधन लम्बा नहीं चल सका। दो साल में ही सत्ता से बाहर हो गया। सत्ता जाने के बाद इस गठबंधन में भी बिखराव होता चला गया।   

1990 के दशक में गठबंधन सरकारों का दौर चला। संयुक्त मोर्चा के सत्ता से बाहर जाने के बाद चुनाव हुए। 1998 में भाजपा ने 20 से अधिक छोटी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाई। 2004 और 2009 में जब यूपीए सत्ता में आई तब भी कई दलों का गठबंधन था। हालांकि, सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस थी। करीब तीन दशक बाद 2014 में किसी पार्टी को अकेले दम पर बहुमत मिला। जब भाजपा ने 282 सीटों पर जीत दर्ज की। 

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