कोविड-19 की जांच का सिस्टम बनाना भारत के लिए बड़ी चुनौती
- पर्याप्त संख्या में जांच किट न होने से बढ़ी परेशानी
- आईसीएमआर और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय लगातार ढूढ रहा है उपाय
- संक्रमितों की संख्या बढऩे से बढ़ा खतरा, अभी लॉकडॉऊन का ही सहारा
- शुरुआती जांच के लिए खून के नमूने लेकर लिम्फोसाइट, ल्यूकोसाइट या ब्लड प्लेटलेट से ही हो रहा आकलन
विस्तार
कोविड-19 (कोरोना) के संक्रमण की जांच की समुचित व्यवस्था भारत के लिए चुनौती बनी हुई है। एक तरफ आरएनए एक्सट्रैक्शन किट की खरीद के लिए टेंडर जारी करने की प्रक्रिया चल चुकी है, दूसरी ओर टेस्टिंग किट की गुणवत्ता पर सवाल बने हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की पूरी टीम और आईसीएमआर के वैज्ञानिक सभी इसकी काट ढूंढने में जुटे हैं। समस्या यह भी है कि कोरोना का संक्रमण जहां दुनिया के लिए नई बीमारी है, वहीं इसके संक्रमित को दी जाने वाली दवा और इलाज का संशय अब भी बना हुआ है। इसमें भी इलाज से पहले सवाल है जांच किट का न होना।
किट और किट की प्रमाणिकता
संकट प्रामाणिक किट की उपलब्धता का भी है। हालांकि इस संकट से निबटने के लिए आईसीएमआर ने सात लाख किट लेने की प्रक्रिया शुरू की है। आईसीएमआर को इसके लिए अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग द्वारा स्वीकृत स्तर की आरएनए एक्सट्रैक्शन किट चाहिए। बताते हैं पुणे की माई लैब द्वारा तैयार किट इस प्रतिपर्धा में सबसे आगे हैं। लेकिन भारतीय चिकित्सा विज्ञानियों को अभी इन भारतीय जांच किट के सफल हो पाने का भरोसा कम है। नार्थ दिल्ली मेडिकल कालेज के प्रो. राम भी इस किट की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। प्रो. राम का कहना है कि अभी इसमें काफी झोल नजर आ रहा है। मुझे लग रहा है कि जिस तरह से कोरोना के संक्रमित लोगों की संख्या बढऩे का अनुमान है, उसे ध्यान में रखकर हमारे उपाय बहुत कारगर नहीं है। केन्द्र सरकार को इसमें तेजी लानी होगी। अमेरिका, जर्मनी या कुछ देशों से जांच किट का आयात करना होगा क्योंकि जबतक संक्रमण का सही पता नहीं लगेगा, हम बीमारी का इलाज क्या करेंगे?
4-6 घंटे लग रहे हैं जांच में
सूत्र बताते हैं कि अभी एक कोरोना संक्रमित व्यक्ति की आईसीएमआर की नेशनल इंस्टीट्यूट लैब, पुणे में जांच होने में 4-6 घंटे का समय लग जा रहा है। देश की यही एक मात्र प्रयोगशाला है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मान्यता प्राप्त है। हालांकि केन्द्र सरकार ने कोरोना संक्रमण की संभावना को देखते हुए देश की तमाम पैथालिजी लैब और अस्पतालों को इसके नमूने लेकर आरंभिक जांच की अनुमति दी है, लेकिन किसी के कोरोना से संक्रमित होने या न होने की पुष्टि पुणे से मुहर लगने के बाद होती है। इसके लिए व्यक्ति के नाक, गले, या फेफड़े से पदार्थ लेकर उसका परीक्षण किया जाता है। कफ (म्यूकस) को लेकर उसकी जांच की जाती है और तब कोरोना के संक्रमण का पता लगता है। संक्रमण की शुरुआती जांच के लिए दिल्ली, एनसीआर और देश का पैथालिजी विभाग खून के नमूने लेकर लिम्फोसाइट, ल्यूकोसाइट या ब्लड प्लेटलेट से ही इसका आकलन कर रहा है।
इटली और यूरोप की स्थिति न होने लगे....
राम मनोहर लोहिया अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक कोरोना के संक्रमण को बड़ी चिंता जताते हैं। जानकारों का कहना है कि इसके पाजिटिव मरीज रोज बढ़ रहे हैं। पाजिटिव प्रमाणति होने से पहले इनके द्वारा तमाम लोगों में संक्रमण बांट देने की संभावना है लेकिन हम सभी संभावितों का परीक्षण नहीं कर पा रहे हैं। इसके आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत में मई तक करीब 10 लाख लोग कोरोना से संक्रमित हो सकते हैं। इसकी चपेट में आने से 10 हजार लोगों की जान जा सकती है। बताते हैं इटली में भी यही गलती हुई थी। अब वहां बूढ़े और बच्चे इसका तेजी से शिकार हो रहे हैं। इटली की सरकार ने स्थिति की भयावहता को देखते हुए निर्णय किया है कि वह बच्चों, युवाओं, अधिक इम्यूनिटी वाले लोगों पर ध्यान देगी ताकि उन्हें बचाया जा सके। वृद्ध लोगों का वह पूरी तरह से इलाज कर पाने में अक्षम है। सूत्र का कहना है कि अमेरिका ने भी इसी तरह की नीति को अहमियत दी है। जानकार कह रहे हैं कि हमें तो डर लग रहा है कि कहीं यह नीति भारत में भी न अपनानी पड़े।
किट आएगी तब जांच होगी...तब तक...
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के एक वरिष्ठ फिजिशियन का कहना है कि समस्या कई हैं। दुनिया के अधिकांश देश कोरोना के दंश से पीडि़त हैं। इसलिए चीन, दक्षिण कोरिया समेत अन्य जांच या सुरक्षा किट दे सकने वाले देशों के माल मांगने वाले देशों की लाइन लगी है। अमेरिका और यूरोप की कंपनी भी जांच किट आपूर्ति में पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। वैसे भी हमारे पास संसाधन सीमित है। हमारे पास सैनिटाइज करने की भी कामचलाऊ व्यवस्था का अभाव है। इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी आम नागरिकों द्वारा बरती जाने वाली सावधानी ही है। ऐसे समय में लॉकडाऊन से अच्छा कोई उपाय नहीं है।