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महाराष्ट्र: धुएं से काले पड़े बच्चों के शरीर, परिजन बोले- एक बार सीने से तो लगा लेने दो
Sat, 09 Jan 2021 01:28 PM IST
Tanuja Yadav
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: Tanuja Yadav
Updated Sat, 09 Jan 2021 01:28 PM IST
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महाराष्ट्र के भंडारा में 10 नवजात बच्चों की मौत
- फोटो : ANI
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महाराष्ट्र के भंडारा जिला अस्पताल में लगी आग की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खिड़की तोड़कर शिशु केयर यूनिट के अंदर घुसे अस्पताल के गार्ड तक सांस ले नहीं पा रहे थे। पूरी यूनिट में आग फैल चुकी थी और चारों तरफ धुआं था। सिर्फ सात बच्चों को ही जिंदा बचाया जा सका, जबकि दस नवजात शिशुओं की इस दर्दनाक हादसे में मौत हो गई। अस्पताल के सुरक्षा स्टाफ से जुड़े गौरव रहपाड़े की जुबानी हादसे की कहानी।
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मैं शुक्रवार रात 9 बजे अस्पताल पहुंचा। रात करीब 1.30 बजे अस्पताल के अंदर ड्यूटी पर था। तभी फोन आया कि पहली मंजिल पर सिक न्यूबोर्न केयर यूनिट में धुआं निकल रहा है। मैंने कुछ और सिक्योरिटी गार्ड्स को बुलाया और सभी पहली मंजिल पर पहुंचे। वार्ड के बाहर पहुंचने पर हमने देखा कि आईसीयू के गेट से गाढ़े काले रंग का धुआं निकल रहा था। इसके बाद हमने दरवाजा खोलकर भीतर जाने की कोशिश की, लेकिन हम कामयाब नहीं हुए। हमने फायर एक्सटिंग्विशर की मदद से धुएं को हटाने और आग को बुझाने का प्रयास भी किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। धुएं की वजह से वहां सांस लेना भी मुश्किल था। इस वजह से हम नीचे भागे। तब तक फायर ब्रिगेड की गाड़ी पहुंच चुकी थी। हम उसकी सीढ़ी को पीछे से लगाकर वार्ड की खिड़की तक पहुंचे। खिड़की तोड़ी और पीछे के रास्ते से बच्चों को बाहर निकाला। अफसोस है कि हम सिर्फ सात बच्चों को ही बचा सके।
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काले पड़ गए थे बच्चों के शरीर
घटनास्थल पर मौजूद एक अन्य सिक्योरिटी गार्ड ने बताया कि कमरे में चारों ओर धुआं ही धुआं फैला था। कई बच्चों के शरीर काले पड़ गए थे। दो इन्क्यूबेटर में से आग निकल रही थी। उसमें रखे बच्चे बुरी तरह से झुलस चुके थे। पूरा दृश्य दिल दहला देने वाला था।
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नेशनल फायर कालेज और नागपुर स्थित विश्वेश्वरय्या राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान आग लगने की वजहों का पता लगा रहे हैं। फायर ब्रिगेड की टीम और अस्पताल के गार्डों ने तत्काल कदम उठाया और सात बच्चों की जान बचाने में कामयाब हुए।
-अनिल देशमुख, गृहमंत्री, महाराष्ट्र
एक शख्स ने बताया कि हम फायर ब्रिगेड की सीढ़ी की सहायता से बालकनी में चढ़े और दरवाजा तोड़ दिया। अंदर देखा तो आधे बच्चे जल चुके थे और जो बच्चे नहीं भी जले थे, उनमें जान नहीं बची थी। ड्यूटी पर तैनात नर्सों को सबसे पहले लगा कि बच्चों के आईसीयू से धुंआ आ रहा है। कमरे में इतना धुआं भरा हुआ था कि नर्सों को भी सांस लेने में दिक्कत हो रही थी।
वार्ड में मौजूद शिशुओं का शरीर काला पड़ गया था यानि कि कमरे में काला धुआं काफी लंबे समय तक था। इस हादसे से अस्पताल की लापरवाही को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। पहला ये कि जब बच्चों के कमरे का दरवाजा खोला गया तो वहां कोई स्टाफ नहीं था।
इसके अलावा कुछ परिजनों का आरोप है कि दस दिन उन्हें अपने बच्चे से नहीं मिलने दिया जा रहा था, जबकि नियम कहता है कि बच्चे की मां फीडिंग के लिए वहां जा सकती है। वार्ड में स्मोक डिटेक्टर क्यों नहीं लगा था, अगर ये लगा होता तो इससे जानकारी मिल जाती और बच्चों की जान बच जाती।
इस दर्दनाक घटना से दस माताओं की कोख सूनी हुई है। एक मां रो-रोकर कहती रह गई कि एक बार उसे अपने बच्चे को आखिरी बार देखने दो, एक बार उसे प्यार से गला तो लगाने दो। इस दौरान कई मां-बाप अपने बच्चों को आखिरी बार भी देख नहीं पाए। शनिवार सुबह से परिजन अस्पताल में डॉक्टरों से गुहार लगाए हुए हैं एक बार वो अपने बच्चों को देख लें।
वहीं महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद बताया। वहीं स्वास्थ्य मंत्री मृतकों के परिजनों को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की। इसके अलावा महाराष्ट्र राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि इस लापरवाही के पीछे असली दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त से कार्रवाई होनी चाहिए।