{"_id":"5aa64bd44f1c1bbb758b502c","slug":"maharashtra-farmers-protest-its-not-only-maharashtra-farmers-its-all-about-india","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"किसानों के इस सैलाब की ताकत को पहचानिए...","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
किसानों के इस सैलाब की ताकत को पहचानिए...
अतुल सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 12 Mar 2018 03:20 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महाराष्ट्र के हजारों किसान एक बानगी भर हैं। ये किसान और इनके सर की लाल टोपी इस बात का संकेत हैं कि चुनावी राजनीति चाहे जैसी हो,सत्ता पलटने के खेल में बेशक आप बाजी मार ले जाएं, लेकिन ज़मीनी हकीकत आज भी वही है जो चार साल पहले थी, जो एक दशक पहले थी या जो बरसों से चली आ रही है।
औद्योगीकरण, विकास और किसानों के नाम पर चमकदार मलाई खाने वाले सियासतदान देश की इस ज़मीनी हकीकत से वाकिफ तो खूब हैं, लेकिन उन्हें हमेशा से लगता रहा है कि इस लोकतांत्रिक देश में ऐसी आवाज़ों को आश्वासनों और वादों के ज़रिये,खूबसूरत सपनों की बदौलत आराम से दबाया जा सकता है। यही दस्तूर बरसों से चला आ रहा है। लेकिन महाराष्ट्र में पिछली सात तारीख से निरंतर बढ़ता किसानों का यह सैलाब जब मुंबई पहुंचा तो कई मिसालें सामने आ गईं।
महाराष्ट्र के किसानों ने बताया कि आंदोलन क्या होता है, आंदोलन या महामार्च का मतलब आम लोगों को तकलीफ देना नहीं, बच्चों को स्कूल जाने से रोकना नहीं, सड़कें जाम करना या अस्पतालों के कामकाज ठप करना भी नहीं, हिंसा या आगजनी करना तो कतई नहीं होता। लाल झंडे,हसिया हथौड़ा के निशान, लाल टोपी या किसान सभा के आकर्षक बैनर पोस्टर, ऊर्जा से लबरेज़ नाचती गाती किसान मंडलियां, ज़िंदगी की आखिरी दहलीज़ तक पहुंच चुके नंगे पैर पैदल मार्च करते बीमार और बुजुर्ग किसान।
विज्ञापन
यह एक अलग ही संस्कृति है – जनता की संस्कृति या जन संस्कृति। अपनी मांग मनवाने के लिए, अपनी बात कहने के लिए और अपनी तकलीफों का इज़हार करने के लिए आंदोलन की राह पर उतरे ये किसान ज्यादा कुछ नहीं मांग रहे – बस उन्हें वही चाहिए जो आपने कहा था, वादा किया था।
विज्ञापन
औद्योगीकरण, विकास और किसानों के नाम पर चमकदार मलाई खाने वाले सियासतदान देश की इस ज़मीनी हकीकत से वाकिफ तो खूब हैं, लेकिन उन्हें हमेशा से लगता रहा है कि इस लोकतांत्रिक देश में ऐसी आवाज़ों को आश्वासनों और वादों के ज़रिये,खूबसूरत सपनों की बदौलत आराम से दबाया जा सकता है। यही दस्तूर बरसों से चला आ रहा है। लेकिन महाराष्ट्र में पिछली सात तारीख से निरंतर बढ़ता किसानों का यह सैलाब जब मुंबई पहुंचा तो कई मिसालें सामने आ गईं।
विज्ञापन
महाराष्ट्र के किसानों ने बताया कि आंदोलन क्या होता है, आंदोलन या महामार्च का मतलब आम लोगों को तकलीफ देना नहीं, बच्चों को स्कूल जाने से रोकना नहीं, सड़कें जाम करना या अस्पतालों के कामकाज ठप करना भी नहीं, हिंसा या आगजनी करना तो कतई नहीं होता। लाल झंडे,हसिया हथौड़ा के निशान, लाल टोपी या किसान सभा के आकर्षक बैनर पोस्टर, ऊर्जा से लबरेज़ नाचती गाती किसान मंडलियां, ज़िंदगी की आखिरी दहलीज़ तक पहुंच चुके नंगे पैर पैदल मार्च करते बीमार और बुजुर्ग किसान।
विज्ञापन
यह एक अलग ही संस्कृति है – जनता की संस्कृति या जन संस्कृति। अपनी मांग मनवाने के लिए, अपनी बात कहने के लिए और अपनी तकलीफों का इज़हार करने के लिए आंदोलन की राह पर उतरे ये किसान ज्यादा कुछ नहीं मांग रहे – बस उन्हें वही चाहिए जो आपने कहा था, वादा किया था।
किसान आंदोलन देशभर में फैलने में कामयाब होगा
चार साल हो गए तो ये किसान बस हिसाब मांग रहे हैं, जवाब मांग रहे हैं। किसानों का पूरा कर्ज माफ करने का वादा, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने का वादा, फसलों की लागत का डेढ़ गुना कीमत देने का वादा, जंगलों की फसलों पर किसानों के हक का वादा या बुजुर्ग किसानों को पेंशन का वादा।
अखिल भारतीय किसान सभा की महाराष्ट्र इकाई का यह एक ट्रेलर है। देश के तमाम राज्यों में किसानों की समस्या एक सी है। गुजरात के कपास या मूंगफली उगाने वाले किसान हों या पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश या बिहार के किसान – कर्जमाफी और फसलों की कीमत के मामले में उनका दर्द एक सा है। उन्हें मोदी जी, योगी जी और तमाम नेताओं की बातें अच्छी तो ज़रूर लगती हैं लेकिन उन बातों में कितना सच है, इसकी असली जानकारी भी उनके ही पास है। ऐसे में वो बार बार यही पूछते हैं कि ‘क्या हुआ तेरा वादा...’ ।
दरअसल 2019 की आहट और भाजपा के लगातार लहराते परचम के बीच विपक्ष के लिए ये किसान उम्मीद की एक किरण बनकर आए हैं। उन्हें लगता है कि ये असंतोष देश भर के किसानों का है, रोज़गार के सवाल पर देशभर के युवा भी ऐसे ही असंतोष से भरे हैं। अगर ये मिल गए और वाकई एक देशव्यापी आंदोलन खड़ा हो गया तो हो सकता है कि तस्वीर का रूख बदल जाए। दूसरे ये कि त्रिपुरा में भगवा सरकार बनने के बाद कुछ हताश से हुए वामपंथियों को भी यहां से नई संजीवनी मिली है और उनका हौसला एक बार फिर लौटा है कि जो हवा वामपंथ के बारे में फैलाई जा रही थी, देश को उसकी असली ताकत का एक अंदाज़ा तो महाराष्ट्र के किसानों ने ज़रूर दे दिया है।
ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि सात दिनों तक महाराष्ट्र के तमाम इलाकों से पैदल मार्च करके आए ये हजारों किसान मुख्यमंत्री फड़नवीस से मिलकर और एक और वादा लेकर लौट जाते हैं या फिर आंदोलन की एक नई ज़मीन तैयार होकर देशभर में फैलाने में कामयाब होते हैं।
अखिल भारतीय किसान सभा की महाराष्ट्र इकाई का यह एक ट्रेलर है। देश के तमाम राज्यों में किसानों की समस्या एक सी है। गुजरात के कपास या मूंगफली उगाने वाले किसान हों या पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश या बिहार के किसान – कर्जमाफी और फसलों की कीमत के मामले में उनका दर्द एक सा है। उन्हें मोदी जी, योगी जी और तमाम नेताओं की बातें अच्छी तो ज़रूर लगती हैं लेकिन उन बातों में कितना सच है, इसकी असली जानकारी भी उनके ही पास है। ऐसे में वो बार बार यही पूछते हैं कि ‘क्या हुआ तेरा वादा...’ ।
दरअसल 2019 की आहट और भाजपा के लगातार लहराते परचम के बीच विपक्ष के लिए ये किसान उम्मीद की एक किरण बनकर आए हैं। उन्हें लगता है कि ये असंतोष देश भर के किसानों का है, रोज़गार के सवाल पर देशभर के युवा भी ऐसे ही असंतोष से भरे हैं। अगर ये मिल गए और वाकई एक देशव्यापी आंदोलन खड़ा हो गया तो हो सकता है कि तस्वीर का रूख बदल जाए। दूसरे ये कि त्रिपुरा में भगवा सरकार बनने के बाद कुछ हताश से हुए वामपंथियों को भी यहां से नई संजीवनी मिली है और उनका हौसला एक बार फिर लौटा है कि जो हवा वामपंथ के बारे में फैलाई जा रही थी, देश को उसकी असली ताकत का एक अंदाज़ा तो महाराष्ट्र के किसानों ने ज़रूर दे दिया है।
ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि सात दिनों तक महाराष्ट्र के तमाम इलाकों से पैदल मार्च करके आए ये हजारों किसान मुख्यमंत्री फड़नवीस से मिलकर और एक और वादा लेकर लौट जाते हैं या फिर आंदोलन की एक नई ज़मीन तैयार होकर देशभर में फैलाने में कामयाब होते हैं।