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Maharashtra Elections: क्या कुनबी के कुनबे में फंसे फडणवीस? नागपुर दक्षिण-पश्चिम सीट पर कांग्रेस की कड़ी टक्कर
Sun, 17 Nov 2024 05:16 AM IST
शुभम कुमार
सुरेन्द्र मिश्र
सुरेन्द्र मिश्र
Published by: शुभम कुमार
Updated Sun, 17 Nov 2024 05:16 AM IST
सार
महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस का गढ़ नागपुर दक्षिण-पश्चिम सीट पर इस बार मुकाबला आसान नहीं लग रहा है। कांग्रेस ने इस बार इस सीट से कुनबी (मराठा) समाज के प्रफुल्ल गुडधे पाटिल को चुनावी मैदान में उतारा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस बार फडणवीस कुनबी के कुनबे में फंस जाएंगे? या फिर महिलाओं के वर्चस्व वाली इस सीट पर लाडकी बहना से लाभान्वित महिलाएं उनका बेरा पार लगाएंगी। तो आईए यहां के कुछ चुनावी समीकरण पर ध्यान देते हैं।
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Maharashtra Assembly Election 2024
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनाव में महज तीन दिनों का समय शेष रह गया है। 288 विधानसभा सीटों पर होने वाले चुनाव की प्रत्येक सीट की अपनी-अपनी खासियत है लेकिन कुछ सीटें ऐसी हैं जिसपर सभी की निगाहें टिकी हैं। ऐसी ही सीटों में से एक है नागपुर दक्षिण-पश्चिम विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र। यहां से भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस (देवा भाऊ) चुनाव लड़ रहे हैं।
देखा जाए तो फडणवीस बार वह कुनबी के कुनबे में फंसते नजर आ रहें है। क्योंकि सीट पर कांग्रेस ने इस बार कुनबी (मराठा) समाज के प्रफुल्ल गुडधे पाटिल को उतारा है। पाटिल नागपुर से भाजपा के पहले विधायक और पूर्व मंत्री विनोद गुडधे पाटिल के पुत्र हैं। यह सीट महिलाओं के वर्चस्व वाली हैं। यहां पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या अधिक है इसलिए कहा जा रहा है कि लाडकी बहना योजना से लाभान्वित हुई महिलाएं फडणवीस का बेड़ा पार लगा सकती हैं।
जीत का छक्का लगाने को तैयार फडणवीस
देवेन्द्र फडणवीस लगातार पांच बार से विधायक हैं और विजयी छक्का लगाने के लिए नागपुर दक्षिण-पश्चिम सीट से लगातार चौथी बार मैदान में उतरे हैं। परिसीमन के बाद 2009 में यह सीट बनी और तब से फडणवीस ही जीतते रहे हैं। इससे पहले वह नागपुर पश्चिम से विधायक रहे। पार्षद से नागपुर के महापौर तक की राजनीतिक यात्रा के बाद फडणवीस का सफर 1999 से विधानसभा के लिए शुरू हुआ और तब से अजेय बने हुए हैं।
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समझिए कुछ समीकरण...
फडणवीस और पाटिल के बीच 2014 में भी मुकाबला हो चुका है लेकिन तब मोदी लहर थी। इस लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी गठबंधन महा विकास आघाड़ी (एमवीए) मजबूत होकर उभरा है। फडणवीस के सामने उस कुनबी समाज की चुनौती है, जिस समाज के मनोज जरांगे पाटिल हैं और मराठा आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे हैं। फडणवीस लगातार मनोज जरांगे के निशाने पर हैं।
इस सीट पर महिलाओं का वर्चस्व
किसे मिलेगा आशीर्वाद
हालांकि विदर्भ में कुनबी समाज पहले से ही पिछड़े वर्ग में हैं, जबकि मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र का कुनबी (मराठा) समाज आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहा है। लोकसभा चुनाव में कुनबी समाज भाजपा के खिलाफ था, जिससे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की जीत का अंतर काफी कम हो गया था। फडणवीस के सामने इस खाई को पाटने की भी चुनौती है।
वहीं इस विधानसभा क्षेत्र के जयसिंह चव्हाण कहते हैं कि कुनबी मतों में बिखराव होगा, जिससे कांग्रेस को नुकसान होगा। वहीं, हिंदू दलित बड़ी संख्या में जो भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं लेकिन लाडकी बहना का जिसे आशीर्वाद मिलेगा वही विजयी होगा।
यह है जातीय गणित का समीकरण
इस निर्वाचन क्षेत्र में लगभग एक लाख दलित, 70,000 कुनबी, 60,000 ब्राह्मण, 30,000 तेली और 20,000 माली के अलावा 35000 उत्तर भारतीय मतदाता हैं। दलितों में नवबौद्ध का झुकाव कांग्रेस की ओर है, जबकि हिंदू दलित भाजपा के समर्थक हैं। इस विधानसभा क्षेत्र के निवासी शुभम मिश्र कहते हैं कि 90 फीसदी उत्तर भारतीय फडणवीस के साथ हैं। इसका मूल कारण सुरक्षा है। जब से फडणवीस मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री बने, तब से उत्तर भारतीय समाज सुरक्षित महसूस कर रहा है। यहां के मतदाता फडणवीस को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। फडणवीस हर वर्ग को साध रहे हैं, जबकि पाटिल का पूरा जोर ओबीसी, कुनबी (मराठा), अल्पसंख्यक और दलित मतों को अपने पाले में लाने की है।
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देखा जाए तो फडणवीस बार वह कुनबी के कुनबे में फंसते नजर आ रहें है। क्योंकि सीट पर कांग्रेस ने इस बार कुनबी (मराठा) समाज के प्रफुल्ल गुडधे पाटिल को उतारा है। पाटिल नागपुर से भाजपा के पहले विधायक और पूर्व मंत्री विनोद गुडधे पाटिल के पुत्र हैं। यह सीट महिलाओं के वर्चस्व वाली हैं। यहां पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या अधिक है इसलिए कहा जा रहा है कि लाडकी बहना योजना से लाभान्वित हुई महिलाएं फडणवीस का बेड़ा पार लगा सकती हैं।
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जीत का छक्का लगाने को तैयार फडणवीस
देवेन्द्र फडणवीस लगातार पांच बार से विधायक हैं और विजयी छक्का लगाने के लिए नागपुर दक्षिण-पश्चिम सीट से लगातार चौथी बार मैदान में उतरे हैं। परिसीमन के बाद 2009 में यह सीट बनी और तब से फडणवीस ही जीतते रहे हैं। इससे पहले वह नागपुर पश्चिम से विधायक रहे। पार्षद से नागपुर के महापौर तक की राजनीतिक यात्रा के बाद फडणवीस का सफर 1999 से विधानसभा के लिए शुरू हुआ और तब से अजेय बने हुए हैं।
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समझिए कुछ समीकरण...
फडणवीस और पाटिल के बीच 2014 में भी मुकाबला हो चुका है लेकिन तब मोदी लहर थी। इस लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी गठबंधन महा विकास आघाड़ी (एमवीए) मजबूत होकर उभरा है। फडणवीस के सामने उस कुनबी समाज की चुनौती है, जिस समाज के मनोज जरांगे पाटिल हैं और मराठा आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे हैं। फडणवीस लगातार मनोज जरांगे के निशाने पर हैं।
इस सीट पर महिलाओं का वर्चस्व
| श्रेणी | संख्या |
|---|---|
| पुरुष | 2,02,298 |
| महिला | 2,08,914 |
| कुल मतदाता | 4,11,241 |
किसे मिलेगा आशीर्वाद
हालांकि विदर्भ में कुनबी समाज पहले से ही पिछड़े वर्ग में हैं, जबकि मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र का कुनबी (मराठा) समाज आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहा है। लोकसभा चुनाव में कुनबी समाज भाजपा के खिलाफ था, जिससे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की जीत का अंतर काफी कम हो गया था। फडणवीस के सामने इस खाई को पाटने की भी चुनौती है।
वहीं इस विधानसभा क्षेत्र के जयसिंह चव्हाण कहते हैं कि कुनबी मतों में बिखराव होगा, जिससे कांग्रेस को नुकसान होगा। वहीं, हिंदू दलित बड़ी संख्या में जो भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं लेकिन लाडकी बहना का जिसे आशीर्वाद मिलेगा वही विजयी होगा।
यह है जातीय गणित का समीकरण
इस निर्वाचन क्षेत्र में लगभग एक लाख दलित, 70,000 कुनबी, 60,000 ब्राह्मण, 30,000 तेली और 20,000 माली के अलावा 35000 उत्तर भारतीय मतदाता हैं। दलितों में नवबौद्ध का झुकाव कांग्रेस की ओर है, जबकि हिंदू दलित भाजपा के समर्थक हैं। इस विधानसभा क्षेत्र के निवासी शुभम मिश्र कहते हैं कि 90 फीसदी उत्तर भारतीय फडणवीस के साथ हैं। इसका मूल कारण सुरक्षा है। जब से फडणवीस मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री बने, तब से उत्तर भारतीय समाज सुरक्षित महसूस कर रहा है। यहां के मतदाता फडणवीस को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। फडणवीस हर वर्ग को साध रहे हैं, जबकि पाटिल का पूरा जोर ओबीसी, कुनबी (मराठा), अल्पसंख्यक और दलित मतों को अपने पाले में लाने की है।