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Maharashtra: 'आरोपी का कोई गलत इरादा नहीं था', अदालत ने नाबालिग लड़की को चूमने के आरोपी को बरी किया
Wed, 10 Sep 2025 02:48 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ठाणे
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, ठाणे
Published by: नितिन गौतम
Updated Wed, 10 Sep 2025 02:48 PM IST
सार
अदालत ने कहा, 'जिस आरोप के लिए आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाया गया, उसे गलत तरीके से छूने की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। पीड़िता की उम्र को देखते हुए, कोई भी व्यक्ति जो बच्चों से प्यार करता है, उसे गोद में उठा सकता है। उसके गाल पर प्यार से चुंबन दे सकता है, जो आमतौर पर समाज में होता है।'
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सांकतिक तस्वीर
- फोटो : ANI
विस्तार
महाराष्ट्र के ठाणे की एक विशेष अदालत ने साल 2021 में एक तीन साल की बच्ची चूमने और उसके साथ कथित छेड़छाड़ के आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि आरोपी का कोई गलत इरादा नहीं था। अदालत ने कहा कि बच्चों को प्यार करने वाला कोई भी व्यक्ति स्वभाविक तौर पर ऐसा कर सकता है।
अदालत ने आरोपी को दिया संदेह का लाभ
अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए कहा कि आरोपी का कोई गलत इरादा नहीं था और अभियोजन पक्ष उसके खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा। 22 अगस्त को पारित इस आदेश में, पोक्सो कानून से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही विशेष न्यायाधीश रूबी यू मालवंकर ने 54 वर्षीय ओमप्रकाश रामबचन गिरि को बरी कर दिया। ओमप्रकाश रामबचन गिरी पर 9 जनवरी, 2021 को दो अलग-अलग मौकों पर नाबालिग बच्ची को गले लगाने और चूमने का आरोप था। पुलिस ने उनके खिलाफ POCSO अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 (महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) के तहत मामला दर्ज किया था।
अदालत ने कहा, 'जिस आरोप के लिए आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाया गया, उसे गलत तरीके से छूने की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। पीड़िता की उम्र को देखते हुए, कोई भी व्यक्ति जो बच्चों से प्यार करता है, उसे गोद में उठा सकता है। उसके गाल पर प्यार से चुंबन दे सकता है, जो आमतौर पर समाज में होता है।'
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ये भी पढ़ें- SC: 'राज्यपाल, मंत्रिपरिषद की सलाह लेने के लिए बाध्य', तेलंगाना सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
अदालत ने की ये टिप्पणी
अदालत ने कहा कि 'हमारे जैसे देश में, जब तक कि वह बच्चे को चोट न पहुंचा रहा हो या उसका व्यवहार आपत्तिजनक या अपमानजनक नहीं माना जाता। इसलिए, इस मामले में भी आरोपी बिल्कुल अजनबी नहीं था और वह उसी इलाके का निवासी था, इसलिए इसे पूरी तरह से आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि कथित घटनाओं के दौरान बच्चा दर्द से नहीं रोया। न्यायाधीश ने निष्कर्ष निकाला, पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुंचाने का तत्व लगभग नदारद है और प्यार भरे व्यवहार को सिर्फ शक के आधार पर आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। पीड़िता ने सात साल की उम्र में गवाही दर्ज कराई थी, जिसे अदालत न विश्वसनीय नहीं माना। पीड़िता ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उसके पिता ने उसे बताया था कि अदालत में क्या कहना है।
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अदालत ने आरोपी को दिया संदेह का लाभ
अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए कहा कि आरोपी का कोई गलत इरादा नहीं था और अभियोजन पक्ष उसके खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रहा। 22 अगस्त को पारित इस आदेश में, पोक्सो कानून से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही विशेष न्यायाधीश रूबी यू मालवंकर ने 54 वर्षीय ओमप्रकाश रामबचन गिरि को बरी कर दिया। ओमप्रकाश रामबचन गिरी पर 9 जनवरी, 2021 को दो अलग-अलग मौकों पर नाबालिग बच्ची को गले लगाने और चूमने का आरोप था। पुलिस ने उनके खिलाफ POCSO अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 (महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) के तहत मामला दर्ज किया था।
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अदालत ने कहा, 'जिस आरोप के लिए आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाया गया, उसे गलत तरीके से छूने की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। पीड़िता की उम्र को देखते हुए, कोई भी व्यक्ति जो बच्चों से प्यार करता है, उसे गोद में उठा सकता है। उसके गाल पर प्यार से चुंबन दे सकता है, जो आमतौर पर समाज में होता है।'
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अदालत ने की ये टिप्पणी
अदालत ने कहा कि 'हमारे जैसे देश में, जब तक कि वह बच्चे को चोट न पहुंचा रहा हो या उसका व्यवहार आपत्तिजनक या अपमानजनक नहीं माना जाता। इसलिए, इस मामले में भी आरोपी बिल्कुल अजनबी नहीं था और वह उसी इलाके का निवासी था, इसलिए इसे पूरी तरह से आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि कथित घटनाओं के दौरान बच्चा दर्द से नहीं रोया। न्यायाधीश ने निष्कर्ष निकाला, पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुंचाने का तत्व लगभग नदारद है और प्यार भरे व्यवहार को सिर्फ शक के आधार पर आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। पीड़िता ने सात साल की उम्र में गवाही दर्ज कराई थी, जिसे अदालत न विश्वसनीय नहीं माना। पीड़िता ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उसके पिता ने उसे बताया था कि अदालत में क्या कहना है।
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