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भोजशाला का इतिहास क्या है: मंदिर कब बना मस्जिद? जानें कैसे इस विवाद ने बदल दी मध्य प्रदेश की सियासी दिशा

Fri, 15 May 2026 08:46 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 15 May 2026 08:46 AM IST
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सार
धार में जिस भोजशाला को लेकर विवाद है, उसका इतिहास क्या है? यहां हिंदू-मुस्लिम पक्ष कब-कब आमने-सामने आए? इस मुद्दे पर राजनीति कैसे और कब शुरू हुई? विवाद की मौजूदा स्थिति क्या है? भारत की पुरातत्व सर्वेक्षण एजेंसी (एएसआई) का इस जगह को लेकर क्या कहती है? कोर्ट में इस मामले में कब-क्या हुआ? आइये जानते हैं....
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Madhya Pradesh Dhar Bhojshala Temple Mosque Controversy Politics Rivalry BJP Congress ASI Survey Supreme Court
धार में स्थित भोजशाला। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मध्य प्रदेश में एक जिला है 'धार', जो इस वक्त चर्चा में है। आमतौर पर शांत रहने वाला ये शहर अक्सर तब सुर्खियों में आता है जब बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़ती है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने धार भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर फैसला सुना दिया है। हाईकोर्ट ने इसे मंदिर माना है, इससे पहले 12 मई को आखिरी सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा था। धार की भोजशाला को हिन्दू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। 


ऐसे में यह जानना अहम है कि धार में जिस भोजशाला को लेकर विवाद की स्थिति बनी है, उसका इतिहास क्या है?  यहां हिंदू-मुस्लिम पक्ष कब-कब आमने-सामने आए? इस मुद्दे पर राजनीति कैसे और कब शुरू हुई? विवाद की मौजूदा स्थिति क्या है? भारत की पुरातत्व सर्वेक्षण एजेंसी (एएसआई) का इस जगह को लेकर क्या कहती है? कोर्ट में इस मामले में कब-क्या हुआ? आइये जानते हैं....



 

क्या है भोजशाला का इतिहास?
भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से शुरू होता है। कहा जाता है कि यहां पर देवी सरस्वती का मंदिर था। 12वीं-13वीं सदी में इस मंदिर को तबाह कर दिया गया और इसी जगह पर एक मकबरा और उसके करीब मस्जिद का निर्माण हुआ। 

दस्तावेजों में क्या जिक्र है?

रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में प्रकाशित माइकल विलिस के एक रिसर्च पेपर- 'धार, भोज और सरस्वती' के मुताबिक 'भोजशाला' शब्द का इस्तेमाल पहली बार जर्मनी आधारित एक भारतविद् एलॉइस एंटोन फ्यूहरर की तरफ से किया गया था, जो कि 1893 में भारत आए थे और भारतीय पुरातत्व विभाग के लिए काम करते थे। 

इस पेपर के मुताबिक, फ्यूहरर ने इसे भोजशाला (Bhoja's School) कहा। हालांकि, बाद में फ्यूहरर को एएसआई से हटा दिया गया था। बाद में इस शब्द का इस्तेमाल ब्रिटिश सरकार में राज्य शिक्षा के सुपरिटेंडेंट केके लेले द्वारा किया गया, जो कि1902 में धार में एएसआई के दफ्तर की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उन्होंने यहां मिले संस्कृत शिलालेखों की व्याख्या का कार्य भी शुरू करवाया था। यहीं से सामने आया कि जो ढांचा खड़ा है, उसमें ध्वस्त किए गए मंदिर के अवशेषों से पुनर्निर्मित किया गया।

क्या है भोजशाला का आजादी के बाद का इतिहास?

1951: आजादी मिलने के बाद भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। 
1952: हिंदुओं ने मंदिर परिसर के पास भोज दिवस मनाने का निर्णय लिया, जिससे क्षेत्र में तनाव पैदा हुआ। 
1953: जवाब में 1953 में मुस्लिम समुदाय ने उर्स (सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती की जयंती) मनाना शुरू किया।

अगले कुछ दशकों तक यह व्यवस्था बनी रही कि मुस्लिम समुदाय शुक्रवार को नमाज अदा करता था और हिंदू समुदाय बसंत पंचमी पर पूजा के लिए एकत्रित होता था।

1961: इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन गए और वाग्देवी की प्रतिमा के भारतीय मूल के होने के साक्ष्य प्रस्तुत किए, हालांकि मूर्ति वापस नहीं आई।
 

अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद चरम पर पहुंचा तनाव

1992: अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद, मध्य प्रदेश में दक्षिणपंथी संगठनों ने भोजशाला को पूरी तरह हिंदू पूजा के लिए खोलने, शुक्रवार की नमाज पर प्रतिबंध लगाने और सरस्वती की मूर्ति स्थापित करने की मांग तेज कर दी।

1994: विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने स्मारक पर झंडा फहराने की धमकी के बाद जिले में कर्फ्यू लगा दिया गया। बाद में दोनों पक्षों के बीच शांति वार्ता हुई और मंगलवार-शुक्रवार को प्रार्थना का सिललिसा चलता रहा।

1997: एक बार फिर विहिप ने स्मारक पर झंडा फहराने का एलान किया और प्रशासन ने यहां जनता के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी।ॉ


ये भी पढ़ें: Dhar Bhojshala: 'सूर्योदय से सूर्यास्त तक प्रार्थना कर सकेंगे'; धार भोजशाला मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

विवाद, जिसने बदल दी मध्य प्रदेश की सियासत


जनवरी 2003: भोजशाला को लेकर तनाव सबसे ज्यादा भड़का। दरअसल, यह मध्य प्रदेश में चुनाव का साल था। इसी दौरान बसंत पंचमी पर एक हिंदू संगठन- हिंदू जागरण मंच ने विवादित स्थल में प्रवेश की चेतावनी दी। इस दौरान जब पुलिस की तरफ से संगठन के कार्यकर्ताओं पर जबरदस्त लाठीचार्ज किया गया, तो भीड़ भड़क उठी और प्रदर्शन शुरू हो गए। इस दौरान कई पुलिसकर्मी घायल हुए और आगजनी की कुछ घटनाएं भी दर्ज हुईं। 

फरवरी 2003: यह मामला लोकसभा में भी गूंजा, जब उस वक्त विदिशा से सांसद शिवराज सिंह चौहन ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने भोजशाला में हिंदुओं की एंट्री बैन कर, हिंदू आकांक्षाओं को दबाने की कोशिश की है। 

मार्च 2003: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में केंद्रीय पर्यटन मंत्री जगमोहन ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की कांग्रेस सरकार को सलाह दी कि वे हिंदुओं को सूर्योदय से सूर्यास्त तक प्रार्थना करने की इजाजत दें और मुस्लिमों को शुक्रवार को 1 बजे से 3 बजे तक नमाज पढ़ने दें। हालांकि, यह फॉर्मूला कांग्रेस के तय फॉर्मूले से अलग था, जिसके तहत हिंदुओं को सिर्फ मंगलवार को भोजशाला परिसर में दो घंटे के लिए प्रार्थना की अनुमति थी। 

इस तरह 2003 के चुनावी साल में भोजशाला का मुद्दा भाजपा के लिए चुनाव अभियान का मुद्दा बन गया। मध्य प्रदेश के लिए भाजपा की प्रचार अभियान की प्रमुख उमा भारती ने इसे केंद्र में रखते हुए दिग्विजय सिंह सरकार पर जबरदस्त निशाने साधे। इस प्रचार अभियान का असर मध्य प्रदेश की राजनीति में इस कदर पड़ा कि दिग्विजय सिंह सरकार के हाथ से सत्ता फिसल गई। इस तरह दिसंबर 2003 में मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार का गठन हुआ और अपनी कोशिशों के लिए उमा भारती को मिला मुख्यमंत्री पद। 

धार स्थित भोजशाला का मुद्दा राजनीति के लिए कितना अहम है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2022 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार ने दावा किया था कि वह ब्रिटिश संग्रहालय से देवी सरस्वती की मूर्ति वापस लाकर रहेगी। यह मुद्दा 2024 के आम चुनाव में भी गूंजा, खासकर धार लोकसभा क्षेत्र में।

भोजशाला का मुद्दा फिर कैसे चर्चा के केंद्र में आया?

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 11 मार्च 2024 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने एएसआई को पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया। इस याचिका में एएसआई के 7 अप्रैल, 2003 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी।
  • एएसआई की सर्वेक्षण रिपोर्ट: एएसआई ने 15 जुलाई, 2024 को अदालत में अपनी 2,000 से अधिक पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि मौजूदा ढांचा पहले से मौजूद मंदिरों के हिस्सों का उपयोग करके बनाया गया था। एएसआई के मुताबिक, इस संरचना में लाल पत्थर के नक्काशीदार खंभों वाला एक बड़ा सभा कक्ष और बीच में एक यज्ञ कुंड था। साथ ही यहां मिले शिलालेखों में संस्कृत वर्णमाला, व्याकरण के नियम और 'कर्पूरमंजरी' नामक नाटक के अंश मिले हैं। 

  • सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष: रिपोर्ट में बताया गया कि खुदाई और जांच के दौरान मिले अवशेष परमार काल के हैं। एएसआई ने पाया कि खंभों और दीवारों पर मौजूद मानवीय और पशु आकृतियों को जानबूझकर मिटाया या खराब किया गया था। इसके अलावा, वहां से संस्कृत और प्राकृत में शिलालेख मिले हैं, जिनमें से एक परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख करता है।
  • शिक्षा केंद्र के साक्ष्य: रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि वहां मिले साहित्यिक ग्रंथों के शिलालेख और वास्तुशिल्प अवशेष संकेत देते हैं कि इस स्थल पर साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़ी एक बड़ी संरचना मौजूद थी।
  • सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: एएसआई के सर्वेक्षण के आदेश को 'मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी' ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने 1 अप्रैल 2024 को निर्देश दिया कि सर्वे के नतीजों पर कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए और कोई भी खुदाई नहीं की जानी चाहिए, जिससे जगह का स्वरूप बदल जाए। हालांकि, विवाद तब और गहरा गया जब हिंदू संगठनों ने इस रिपोर्ट के आधार पर मस्जिद को बंद करने और वहां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा स्थापित करने की मांग तेज कर दी। 

अब सुप्रीम कोर्ट का क्या आदेश?

सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में विवादित भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को भी शुक्रवार के दिन दोपहर 1 बजे से लेकर 3 बजे तक नमाज पढ़ने की इजाजत दी है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं कि वे आपसी सम्मान और सहयोग बरकरार रखें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी। 

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि बसंत पंचमी के दिन दोपहर 1 से 3 बजे के बीच नमाज के लिए आने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या जिला प्रशासन को बता दी जाए। प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भोजशाला आने वालों के लिए पास जारी कर सकता है और आने-जाने के लिए अलग रास्ता तय कर सकता है, ताकि नमाज पढ़ी जा सके। उसी तरह से हिंदू पक्ष को परिसर के भीतर ही अलग जगह मुहैया कराई जाए, ताकि वे बसंत पंचमी पर अपने पारंपरिक अनुष्ठान कर सकें।  

यहां पढ़ें सुप्रीम कोर्ट का पूरा आदेश


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