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LS Polls: सीएम योगी की तारीफ क्यों करने लगे मोदी और शाह? केजरीवाल का जवाब या राजपूतों को लुभाने की कोशिश

Thu, 30 May 2024 01:04 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Thu, 30 May 2024 01:04 PM IST
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सार
अरविंद केजरीवाल ने खुले तौर पर यह बात कही है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में तीसरी बार भी आते हैं, तो उसके कुछ ही दिन बाद योगी आदित्यनाथ को यूपी के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जाएगा।
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LS Polls: Why did PM Modi Amit Shah start praising CM Yogi? Kejriwal's answer or an attempt to woo Rajputs
BJP - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह यूपी की अपनी चुनावी रैलियों में योगी आदित्यनाथ की जमकर तारीफ कर रहे हैं। पिछले एक महीने में पार्टी को दोनों बड़े नेताओं ने लगभग एक दर्जन बार योगी सरकार के कामकाज की जबरदस्त प्रशंसा की है। पीएम मोदी ने उन्हें यूपी की कानून व्यवस्था को सुधारने वाले से लेकर 'बड़ों-बड़ों को ठंडा करने वाला' तक बता दिया है, तो अमित शाह ने कहा कि योगी आदित्यनाथ ने यूपी से मच्छर और माफिया दोनों को भगा दिया। भाजपा नेता यूपी के 'बुलडोजर मॉडल' की भी खूब प्रशंसा कर रहे हैं। जनता भी अपने प्रिय मुख्यमंत्री के प्रति इन शब्दों को सुनकर जमकर तालियां बजा रही है। प्रश्न है कि मोदी और अमित शाह अचानक योगी आदित्यनाथ की इतनी प्रशंसा क्यों करने लगे हैं?    



इस प्रश्न का उत्तर विपक्ष की योगी को लेकर शुरू की गई राजनीति और राजपूत मतदाताओं की कथित तौर पर भाजपा से नाराजगी के बीच खोजा जा सकता है। अरविंद केजरीवाल ने खुले तौर पर यह बात कही है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता में तीसरी बार भी आते हैं, तो उसके कुछ ही दिन बाद योगी आदित्यनाथ को यूपी के मुख्यमंत्री पद से हटा दिया जाएगा। उन्होंने कई बार यह बात कही कि जिस तरह भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और वसुंधरा-शिवराज सिंह चौहान को किनारे लगा दिया गया, उसी तरह योगी आदित्यनाथ को भी चुनाव जीतने के बाद किनारे लगा दिया जाएगा।    




विपक्ष की इस बयानबाजी के पीछे यूपी की सियासत छिपी हुई है। विपक्ष जानता है कि यदि भाजपा 80 लोकसभा सीटों वाले यूपी में कमजोर होती है, तो उसका केंद्र में तीसरी बार सत्ता में आना कठिन हो जाएगा। लेकिन यह तभी संभव हो सकता है, जब भाजपा के संगठन और यूपी की सरकार में आपसी तालमेल बिगड़े। माना जा रहा है कि जानबूझकर इस तरह के विवाद को हवा देकर यही तालमेल बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है। 



हवा को बल क्यों?
दरअसल, विपक्ष के इस प्लान को हवा इसलिए भी मिल रही है क्योंकि जब से योगी आदित्यनाथ ने यूपी की सत्ता संभाली है, राजनीतिक गलियारों में लगातार इस बात की चर्चा की जाती रही है कि योगी आदित्यनाथ को लेकर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व सहज नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण यही बताया जाता रहा है कि भाजपा के कुछ शीर्ष नेता अभी से 'मोदी के बाद कौन' वाली भूमिका के लिए अपने आपको तैयार करने में जुट गए हैं। कहा यह भी जा रहा है कि वे उन संभावित दावेदारों को भी ठिकाने लगाने में जुट गए हैं, जो मोदी के बाद भाजपा में सबसे ऊंचे पद के संभावित दावेदार हो सकते हैं। 

जब शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था, तब भी पर्दे के पीछे यही कहा जा रहा था कि केंद्र में एक नेता की राह आसान करने के लिए शिवराज सिंह चौहान को किनारे लगाया जा रहा है। वसुंधरा राजे सिंधिया को 'जबरन रिटायर' करने के पीछे उनकी उम्र (71 वर्ष) का हवाला दिया गया था, लेकिन शिवराज सिंह चौहान के साथ तो यह कारण भी नहीं था। अभी वे केवल 65 वर्ष के हैं और भाजपा की सक्रिय राजनीति में लंबी और प्रभावी भूमिका अदा कर सकते हैं। ऐसे में उन्हें अपने पद से हटाने का कोई ठोस कारण नहीं था। 

हालांकि, भाजपा नेता मानते हैं कि शिवराज सिंह चौहान के लंबे शासनकाल के कारण जनता में उन्हें लेकर एक फटीग फैक्टर काम करने लगा था। उससे निजात पाने और सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए ही शिवराज सिंह को सत्ता से हटाना पड़ा। वसुंधरा राजे सिंधिया को लेकर भी कुछ इसी तरह की बातें कही गई थीं कि उनके शासनकाल में उन्हें लेकर पैदा हुए नकारात्मक असर अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं। इसलिए आगे की राजनीति को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने नए चेहरों पर दांव खेला। 

भाजपा ने ध्वस्त किया विपक्ष का वार 
विपक्ष 'शिवराज-वसुंधरा मॉडल' की तर्ज पर योगी आदित्यनाथ को भी हटाए जाने की भविष्यवाणी करने लगा। पुरुषोत्तम रुपाला प्रकरण से राजपूत मतदाता पहले ही भाजपा से कथित तौर पर नाराज बताए जा रहे थे। ऐसे में यदि योगी आदित्यनाथ को लेकर राजपूत मतदाताओं के बीच कोई गलतफहमी पैदा होती, तो वे भाजपा से छिटक सकते थे। यूपी की अलग-अलग सीटों पर आठ फीसदी से 13 फीसदी तक की आबादी वाले राजपूत समाज के भाजपा से छिटकने से पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता था और उसका बना-बनाया खेल बिगड़ सकता था। 

भाजपा नेताओं ने समय रहते विपक्ष के इस प्लान को भांप लिया और इसे ध्वस्त करने में जुट गए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मोदी और अमित शाह ने लगातार योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा कर विपक्ष के इसी वार को भोथरा करने का काम किया है। इसके पहले जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योगी आदित्यनाथ के कंधे पर अपना हाथ रखकर फोटो खिंचवाई थी, तब भी यही संदेश देने की कोशिश की गई थी। स्वयं मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने भी स्वयं को एक योगी बताकर यह संदेश दे दिया कि उनके लिए इस तरह की राजनीति का कोई अर्थ नहीं है। 

योगी को नजरअंदाज करना संभव नहीं
राजनीतिक विश्लेषक कुमार राकेश ने अमर उजाला से कहा कि योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में सबसे मजबूत नेता के तौर पर उभरे हैं। सच्चाई यह है कि आज उनके बिना भाजपा यूपी में 2019 और 2022 जैसी सफलता हासिल नहीं कर सकती। यदि भाजपा तीसरी बार सत्ता में आना चाहती है, तो वह योगी आदित्यनाथ को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती। यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ के भाजपा में लगातार प्रासंगिक और महत्त्वपूर्ण बने रहने की संभावना है। 

योगी की स्वीकार्यता 
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. परमवीर सिंह ने अमर उजाला से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की तरह योगी आदित्यनाथ भाजपा के सबसे बड़े नेताओं के रूप में उभरे हैं। जिस तरह असम, बंगाल से लेकर पंजाब जैसे गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी उनकी जनसभाओं-रैलियों की मांग की जाती है, उससे पता चलता है कि उनकी लोकप्रियता कितनी है। भाजपा कभी भी अपने इतने बड़े नेता को कमजोर करने की गलती नहीं कर सकती। 

उन्होंने कहा कि भाजपा में हमेशा से दो शीर्ष नेताओं में आपसी तनातनी होने की बात कही जाती रही है। अटल-आडवाणी के युग में भी हमेशा इस तनातनी को हवा दी जाती रही, लेकिन दोनों ही शीर्ष नेताओं ने इसे कभी सतह पर नहीं आने दिया। इसी तरह कभी मोदी बनाम अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह की भी खूब चर्चा हुई थी। लेकिन भाजपा ने बड़ी सूझबूझ से इस मसले को भी हल कर लिया। उन्होंने कहा कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि योगी आदित्यनाथ को लेकर जताई जा रही आशंकाएं पूरी तरह निराधार हैं। और यदि कभी इस तरह की कोई बात आई भी तो भाजपा-आरएसएस का आंतरिक संगठन इतना मजबूत और सक्षम है कि वह इस मुद्दे को अटल-आडवाणी और मोदी बनाम अन्य प्रकरणों की तरह सुलझा लेगा और विपक्ष को इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा।

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