लोकसभा चुनाव 2019: मुस्लिम मन... किसका देगा साथ, कौन रहेगा खाली हाथ
- यूपी में आबादी 19.26%, 10 संसदीय सीटों पर 5-5 लाख से ज्यादा मतदाता
- 2014 में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं बन सका सांसद
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विस्तार
बसपा सुप्रीमो मायावती देवबंद की रैली में जब मुस्लिम मतदाताओं से गठबंधन के पक्ष में एकतरफा वोट देने का आह्वान करती हैं, तो यूपी में इन मतों के मायने समझे जा सकते हैं। इस लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के नतीजे न सिर्फ दिल्ली की सत्ता का भविष्य तय करेंगे, साथ ही गठबंधन और कांग्रेस की आगे की राह भी तय कर देंगे। यह भी पता चलेगा कि लोकसभा चुनाव 2014 और विधानसभा चुनाव 2017 के नतीजों को लेकर उसके मन की कसमसाहट कोई गुल खिला पाएगी या नहीं। संकेत मिलेगा कि मुस्लिम मन यूपी की राजनीति को आगे किस तरह प्रभावित करने वाला है। पता चलेगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ-सबका विकास’ के नारे से भाजपा ने मुस्लिमों के बीच कितनी पैठ बनाई है। खासतौर से तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं ने भाजपा को कितना स्वीकार किया है?
यह बात इसलिए अहम है, क्योंकि आजादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस ही सब पर भारी थी। प्रदेश में लंबे अरसे तक मात्र जनसंघ, वामपंथी दल और सोशलिस्ट समूह ही उसका मुकाबला करते थे। बाद में कांग्रेस के विभाजन, क्षेत्रीय दलों के उभार और कांग्रेस नेताओं के दूसरे दलों में जाने से पिछड़ों और मुसलमानों का कुछ प्रतिशत कांग्रेस से अलग हुआ। पर, अगड़ों, अनुसूचित जाति और मुसलमानों के अलावा कुछ पिछड़ों को साथ जोड़े रखकर वह सफल होती रही। इसीलिए, 1977 को छोड़कर 90 के दशक तक कांग्रेस बहुत कमजोर नहीं हुई।
बोफोर्स घोटाले के बाद वीपी सिंह सरकार बनी। देश ने मंदिर आंदोलन के कारण हिंदुत्व का ध्रुवीकरण होते देखा और मुसलमानों के भीतर भी कांग्रेस का विकल्प तलाशने की बेचैनी दिखी। तब, उन्होंने मंडल कमीशन लागू करके पिछड़ों के अलावा मुसलमानों में 80 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले पसमांदा समाज अर्थात मुस्लिम पिछड़ी जातियों को भी कांग्रेस के कब्जे से अलग करने की कोशिश की। इसी बीच, अनुसूचित जातियों के हित में काम करने का दावा करते हुए 1984 में बसपा का उदय हो चुका था, मंदिर के नाम पर अगड़े भी कांग्रेस से छिटककर भाजपा के पाले में चले गए। मंदिर मुद्दे के कारण मुसलमान भी भाजपा को हराने की प्राथमिकता के साथ वोट देने लगे। इस तरह कांग्रेस कमजोर होती गई।
मुसलमानों के बिना जीती भाजपा
2014 के लोकसभा और 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव ने लगभग 20% मुस्लिम आबादी वाले मुस्लिम मतदाताओं की ताकत का मिथक तोड़ दिया है। अब तक माना जा रहा था कि मुस्लिम मतदाताओं का रुख नतीजों को तय करने में अहम भूमिका निभाता है। भाजपा ने लोकसभा व विधानसभा चुनाव में किसी मुसलमान को मैदान में नहीं उतारा, बावजूद इसके उसे जबरदस्त जीत मिली। चुनाव के दौरान भाजपा नेता हिंदुत्व को ही धार देते रहे। साथ ही विरोधियो के मुस्लिम प्रेम पर प्रहार करते रहे।
भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत से यह भ्रम भी टूट गया कि मुसलमानों के साथ के बिना यूपी के मैदान में जीत का झंडा बुलंद नहीं किया जा सकता है। अब 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से पहले भाजपा उसी राह पर है। उसने प्रदेश में किसी मुसलमान को उम्मीदवार नहीं बनाया है। सीएम योगी आदित्यनाथ व पीएम नरेंद्र मोदी भी गठबंधन को मुस्लिम परस्ती के लिए घेर रहे हैं।
मुस्लिमों में भ्रम की स्थिति तो नहीं भाजपा की बढ़त का कारण
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मुस्लिम वोटों का बिखराव भाजपा की जीत का कारण रहा। पिछले दो चुनावों में सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच मुस्लिम मतदाता भ्रमित हो गया। इस कारण भाजपा को जबरदस्त जीत मिल गई। बड़ा सवाल यह है कि रणनीतिक तौर पर मतदान करने वाला मुसलमान 2014 में भले ही भ्रमित हो गया था, लेकिन 2017 के चुनाव में आखिर वह भाजपा की राह क्यों नहीं रोक पाया? उसने 2014 से कोई सबक नहीं लिया या बदली राजनीतिक परिस्थितियों में मुस्लिम भी बदल गया है।
ऐसा लगता है कि मुस्लिमों ने सिर्फ भाजपा को हराने के लिए वोट नहीं किया। इसके उलट, उनके ध्रुवीकरण की संभावना को देखते हुए हिंदुओं ने भी गैर भाजपाई दलों को यह संदेश देना शुरू कर दिया है कि उनकी अनदेखी कर राजनीति करना आसान नहीं होगा। इससे भी मुस्लिम लामबंदी कमजोर पड़ी है।
वजूद बचेगा तब तो करेंगे प्रतिनिधित्व की बात
मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बात तो तब होगी जब उनका वजूद बचेगा। भाजपा ने उग्र हिंदुत्व और ध्रुवीकरण की राजनीति से मुसलमानों की सियासी अहमियत कम करने की कोशिश की है। वर्ष 2014 के आम चुनाव के बाद ऐसा माहौल बना कि खुद को सेक्यूलर कहने वाले दलों ने भी मुसलमानों के मुद्दे पर बोलना बंद कर दिया। अल्पसंख्यकों की यह स्थिति भारत ही नहीं, समूची सभी दक्षिण एशियाई देशों में है।
- प्रो. मो. सज्जाद, आधुनिक इतिहास विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
पश्चिमी यूपी में मुसलमानों का रुझान आमतौर पर सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के पक्ष में है। इसका सामाजिक समीकरण दूसरे दलों पर भारी है। गठबंधन की मजबूती से सांप्रदायिक ताकतों को रोका जा सकता है। जिन सीटों पर कांग्रेस मजबूती से लड़ेगी, मुसलमान वहां उनका समर्थन कर सकते हैं। गठबंधन से किसानों, अनुसूचित जातियों व मुस्लिमों की एकजुटता दिखी है। चुनाव का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण रुका है।
- खालिद मसूद, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
बेचैनी स्वाभाविक...
ऐसा क्या हुआ कि भाजपा को हराने के लिए मतदान करने वाला मुसलमान दो-दो चुनाव में प्रदेश में भाजपा की राह रोकने के लिए एकजुट नहीं हो पाया। इसे लेकर मुस्लिमों के मन में बेेचैनी होना स्वाभाविक है। लोकसभा चुनाव के नतीजों से पता चलेगा कि मुसलमानों के भीतर भाजपा को लेकर पहले जैसा ही विरोध है या कुछ बदलाव हुआ है।
बिखरने से रोकने के लिए गठबंधन
सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के पीछे बड़ी वजह मुस्लिम मतदाताओं का बिखराव रोकना भी माना जा रहा है। इन्हें लगता है कि पिछले चुनावों में उन्होंने जिस तरह मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट देने की होड़ की और एक दूसरे से ज्यादा टिकट देने का ढिंढोरा पीटा, उससे मुसलमान बंट गया। इससे भाजपा को फायदा हो गया। इसीलिए इन दलों ने गठबंधन कर लिया।
यह तो नतीजों से पता चलेगा कि गठबंधन का गणित मुस्लिम मतों के अंकगणित को किस हद तक सपा, बसपा और रालोद के पक्ष में करता है। मुस्लिमों का मत कांग्रेस को भी मिलता है या नहीं। पर, आंकड़ों पर नजर डालें तो एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है। वर्ष 80 के पहले प्रदेश से ज्यादातर मुस्लिम सांसद कांग्रेस के ही होते थे। आपातकाल के बाद हुए जिस चुनाव से इंदिरा गांधी ने सत्ता में फिर वापसी की, उसमें प्रदेश से 18 मुस्लिम सांसद चुने गए। इनमें अधिकतर कांग्रेस के थे।
इसके बाद इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर में 1984 में प्रदेश से 12 मुस्लिम सांसद चुने गए। इनमें भी ज्यादातर कांग्रेस के थे। बोफोर्स घोटाले के चलते उपजी कांग्रेस विरोधी लहर में 1989 में हुए चुनाव में प्रदेश से 8 मुस्लिम सांसद ही जा सके। इसमें जनता दल के भी सांसद थे। मतलब 1989 के बाद मुस्लिमों की कांग्रेस के साथ लामबंदी टूटती चली गई। स्थानीय स्तर पर जो उसे ज्यादा नजदीक दिखा वह उसके साथ गया।
भाजपा बढ़ी तो बिखर गए
पिछले तीन दशकों पर नजर डालें तो पता चलता है कि जब-जब भाजपा का माहौल बना, तब-तब प्रदेश में मुस्लिम सांसदों की संख्या घट गई। मंदिर मुद्दे पर उपजी राम लहर में 1991 के चुनाव में यह आंकड़ा सिर्फ 3 रह गया। वर्ष 1999 तक, जब तक भाजपा का माहौल रहा, मुस्लिम सांसदों का आंकड़ा दहाई तक नहीं पहुंचा। 2004 में प्रदेश से भाजपा सिकुड़ी और उसके सिर्फ 10 सासंद जीते, तब मुस्लिम सांसदों की संख्या दहाई के अंक 10 तक पहुंची। इनमें 6 सपा के थे और 4 बसपा के।
फिर 2009 में प्रदेश से 7 मुस्लिम सांसद जीते। जिनमें बसपा के 4 और कांग्रेस के 3 सांसद थे। वर्ष 2014 की कहानी सभी को पता है। प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद नहीं जीत सका। साफ है कि भाजपा के विस्तार में मुस्लिम मतदाताओं से ज्यादा हिंदू मतों की लामबंदी ने भूमिका निभाई है। क्षेत्रीय दलों के उभार ने मुस्लिमों के वोट बांटे। इसी के साथ कांग्रेस कमजोर हुई।
आंकड़ों के गणित को देखते हुए कहा जा सकता है कि सपा, बसपा और रालोद की एकजुटता मुस्लिम बहुल सीटों पर भाजपा की राह में बड़ी चुनौती खड़ी कर सकती है। कारण यह है कि सपा और बसपा की एकजुटता के चलते पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों का बड़ा हिस्सा, खासतौर से बड़ी जातियां यादव, जाट व जाटव का रुझान गठबंधन को 2014 के मुकाबले मजबूती दे सकता है। इसके चलते मुस्लिमों को भी भाजपा के सामने गठबंधन के रूप में एक स्पष्ट विकल्प मिल गया है। ऐसे में देखने वाली बात सिर्फ यही है कि भाजपा अब सपा, बसपा और रालोद के परंपरागत मतदाताओं का कितना हिस्सा अपने पक्ष में हासिल करती है और कांग्रेस मुस्लिम मतों के बीच कितनी पहुंच बना पाती है।
आंकड़ों में... पिछले चुनाव में सभी सीटों पर भाजपा
प्रदेश की 17 सीटों पर 5 लाख से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें मुरादाबाद, रामपुर, संभल, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, नगीना, मेरठ, श्रावस्ती, कैराना, गाजियाबाद, बरेली, अमरोहा, बहराइच, डुमरियागंज, पीलीभीत और बागपत शामिल हैं। इनमें 2014 में सभी जगह भाजपा के प्रत्याशी जीते। लेकिन, हुकुम सिंह के निधन के बाद कैराना में हुए उपचुनाव में संयुक्त विपक्ष की ओर से उतरीं रालोद की तबस्सुम हसन जीती थीं। इस प्रकार संसद में यूपी से एक मुस्लिम सांसद का प्रतिनिधित्व हो सका।
41 जिले यूपी के ऐसे हैं, जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 3 लाख या उससे अधिक है
3 लाख से अधिक मुस्लिम मतदाता वाले लोकसभा क्षेत्र
मुरादाबाद 8.75 लाख
रामपुर 9 लाख
संभल 7.75 लाख
सहारनपुर 8 लाख
मुजफ्फरनगर 6.00 लाख
बिजनौर 6.75 लाख
नगीना 8 लाख
मेरठ 6.50 लाख
श्रावस्ती 6.50 लाख
कैराना 6.50 लाख
गाजियाबाद 7 लाख
बरेली 7 लाख
अमरोहा 6.00 लाख
बहराइच 6.50 लाख
डुमरियागंज 6 लाख
पीलीभीत 5 लाख
बागपत 5 लाख
बुलंदशहर 4.50 लाख
अलीगढ़ 4.50 लाख
कैसरगंज 4.50 लाख
गोंडा 4.50 लाख
बाराबंकी 4.25 लाख
बदायूं 4 लाख
आंवला 4 लाख
लखनऊ 4 लाख
सीतापुर 4 लाख
शाहजहांपुर 4 लाख
संतकबीरनगर 4 लाख
महराजगंज 4 लाख
खीरी 3.75 लाख
धौरहरा 3.75 लाख
घोसी 3.75 लाख
मोहनलालगंज 3.50 लाख
इलाहाबाद 3.50 लाख
फैजाबाद 3.50 लाख
कुशीनगर 3.50 लाख
आजमगढ़ 3.50 लाख
गौतमबुद्धनगर 3.15 लाख
मिश्रिख 3 लाख
कानपुर 3 लाख
अंबेडकरनगर 3 लाख
नोट: ये अनुमानित आंकड़े हैं। वास्तविक संख्या से थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है।
मुस्लिम आबादी
19.26% पश्चिमी यूपी में 24.44%
12 जिलों में एक तिहाई मुस्लिम
13 जिलों में 20 से 33% मुस्लिम
12 जिलों में 15 से 20% मुस्लिम
21 जिलों में 10.15% मुस्लिम
17 जिलों में 10% से कम मुस्लिम