फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Lok Sabha Elections 2019: Not taking names of seven prime ministers election including VP singh

लोकसभा चुनाव 2019 : चुनावी दंगल में इन सात प्रधानमंत्रियों का कोई नाम तक नहीं ले रहा

Sat, 16 Mar 2019 09:44 PM IST
तिवारी अभिषेक जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली  Published by: तिवारी अभिषेक Updated Sat, 16 Mar 2019 09:44 PM IST
विज्ञापन
Lok Sabha Elections 2019: Not taking names of seven prime ministers election including VP singh
बीजेपी-कांग्रेस - फोटो : सोशल मीडिया

लोकसभा चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ा है। वोट लेना ही है तो फिर इसके लिए पुराने नेताओं को भी याद किया जा रहा है। यह अलग बात है कि किसी नेता के हिस्से में प्रशंसा तो किसी के हिस्से आलोचना आती है। नेहरू-पटेल तो चुनाव की घोषणा होने से पहले ही टॉप में चल रहे हैं। इस राह में कई दूसरे पूर्व प्रधानमंत्री भी हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर न सही, कम से कम उनके चुनावी क्षेत्र में ही कोई पूछ लेता है, मगर सात पूर्व प्रधानमंत्री तो ऐसे हैं, जिनका इस चुनाव में कोई नाम तक नहीं ले रहा है। न खुद उनकी पार्टी और न ही विपक्ष। इनके खुद के क्षेत्रों में भी नेता इनका नाम नहीं ले रहे। चुनाव में ये किसी के रोल मॉडल नहीं हैं। इनमें गुलजारी लाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, इंद्र कुमार गुजराल और पीवी नरसिम्हा राव शामिल हैं।

विज्ञापन


सबसे पहले बात करते हैं गुलजारी लाल नंदा की।1964 में नेहरु की मृत्यु के बाद ये 27 मई से 9 जून तक प्रधानमंत्री रहे। दूसरी बार लाल बहादुर शास्त्री के निधन के पश्चात 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी 1966 तक प्रधानमंत्री बने। 1997 में इन्हें भारत रत्न भी दिया गया। पीएम बनने से पहले अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लेबर सचिव रहे।उन्होंने श्रमिकों की समस्याओं को बहुत निकट से समझा और उनका हल खोजने का प्रयास भी किया। छोटा कार्यकाल और सिद्धांतों पर चलने वाले नंदा को आज उनकी अपनी ही पार्टी यानी कांग्रेस ने ही भुला दिया। 
विज्ञापन


इनके बाद लाल बहादुर शास्त्री पीएम बने थे। उनके बारे में तो देश का बच्चा-बच्चा जानता है, मगर राजनेताओं को उनकी सादगी और साफगोई रास नहीं आई। जनता पार्टी के मोरारजी देसाई आपातकाल के बाद देश के पहले गैर-कांग्रेसी पीएम रहे थे। पाकिस्तान-चीन के साथ बेहतर संबंध बनाने पर उनका खास ध्यान रहा।रॉ को लेकर उनके कुछ फैसलों को विवादित भी बताया जाता है। इनका भी आज कहीं कोई पोस्टर बैनर नजर नहीं आता। रैली के मंच से भी कोई मोरारजी का नाम नहीं लेता।
विज्ञापन
विज्ञापन


इन्हें भी चुनाव में कोई नहीं पूछ रहा

वीपी सिंह को सामाजिक ढांचे में बुनियादी बदलाव के लिए जाना जाता है। जन मोर्चा, जनता दल और फिर राष्ट्रीय मोर्चा, ऐसे कई राजनीतिक घटनाक्रमों से होते हुए वे पीएम पद तक पहुंचे थे।मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने जैसा बड़ा कदम वीपी सिंह ने ही उठाया था। वित्त और रक्षा मंत्रालय में भी उनका काम सराहनीय बताया गया है, मगर आज वीपी सिंह का नाम भी चुनाव से गायब है। 

चंद्रशेखर, जनता दल और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे थे। सिखों और मुस्लिमों की वकालत के चलते वे चर्चा में रहे। वजह, उनके सामने राष्ट्रीयता को बचाए रखना एक चुनौती थी। उन्हें अपने कार्यकाल में पूरा बजट तक पेश करने का मौका तक नहीं मिला था। सादगी और कठोर फैसले लेने की ताकत, ये उनकी खूबियां रही हैं। 

इंद्र कुमार गुजराल भी कांग्रेस के समर्थन से पीएम बने थे। उनके कार्यकाल में चारा घोटाला जैसे बड़े मामलों की जांच आगे बढ़ी तो वहीं यूपी में कल्याण सिंह सरकार को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाना, आदि चर्चा का विषय रहे। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध स्थापित करने के लिए एक नई नीति बनाई, जिसे गुजराल डॉक्टाइन भी कहा गया।

पीवी नरसिम्हा राव के शव को कांग्रेस पार्टी मुख्यालय में रखने की इजाजत तक नहीं दी गई

राजीव गांधी की हत्या के बाद पैदा हुई परिस्थितियों ने पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' के नाम से किताब लिखने वाले उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू अपनी किताब '1991 हाउ पीवी नरसिम्हा राव मेड हिस्ट्री' में लिखते हैं, 'नरसिम्हा राव, देश के पहले एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर थे। 

राव, कांग्रेस की बांह पकड़कर सियासत की सीढ़ियां चढ़ते हुए  प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे थे, बाद में कुर्सी की वजह से ही उनके और कांग्रेस के रिश्तों में इस कदर खटास आई कि दिल्ली में निधन के बाद उनके शव का अंतिम संस्कार करीब 1500 किलोमीटर दूर करना पड़ा।राव के शव को ले जा रही तोप गाड़ी 24 अकबर रोड यानी सोनिया गांधी के आवास से सटे कांग्रेस मुख्यालय के पास रोक दी गई, लेकिन पार्टी मुख्यालय का गेट बंद रहा। वहां कांग्रेस के तमाम नेता मौजूद थे, लेकिन सब चुप्पी साधे रहे। जयराम रमेश कहते हैं कि, 'कांग्रेस के 99.99 फीसदी लोगों का मानना है कि बाबरी मस्जिद के गिरने के पीछे कहीं न कहीं राव की मिलीभगत थी।

तो पूर्व प्रधानमंत्री इसलिए रोल मॉडल नहीं बन पाए

जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार का कहना है कि आज राजनीति, जाति-व्यक्ति-परिवार के बीच फंसी है। गुलजारी लाल नंदा, शास्त्री, देसाई, वीपी सिंह, चंद्रशेखर आदि लोगों ने एक विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम किया था। ये जाति और परिवार को बहुत पीछे छोड़कर चलने वालों में थे। वीपी सिंह ने बुनियादी बदलाव का जो साहसिक कदम उठाया, वह अपने आप में अभूतपूर्व था। 

चंद्रशेखर ने राष्ट्रीयता को बचाए रखने के लिए सिखों और मुस्लिमों के हित की सोची तो वे विरोधियों के निशाने पर आ गए। इन प्रधानमंत्रियों ने कभी अपनी जाति या धर्म की लॉबी नहीं बनाई। अपने समुदायों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ खास नहीं किया, जैसा कि आज हर नेता करने के लिए लालायित रहता है। 

आनंद कुमार के मुताबिक, ये नेता देश हित की सोचते थे और व्यक्तिवाद से कोसों दूर रहे।इस वजह से इनकी अपनी जाति वाले और यहाँ तक की  खुद की पार्टी, इन्हें किसी तरह से रोल मॉडल नहीं मानती।मौजूदा राजनीति, जाति, व्यक्ति और परिवार के चारों तरफ घूम रही है।परिवार की जगह पहले दल होता था, अब वह भी खत्म हो चुका है।नतीजा, इन प्रधानमंत्रियों का नाम चुनाव से बाहर है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed