लोकसभा चुनाव 2019: विकास और प्रवास के मुद्दे पर मतदान करेगा पूर्वोत्तर
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पूर्वोत्तर के आठों राज्यों में पहले चरण के चुनाव कांग्रेस और भाजपा के लिए बेहद महत्वूपर्ण रहने वाले हैं। किसी भी एक पक्ष को बंपर सफलता मिली तो यह उसके लिए बोनस जैसा होगा। इस बार विकास ओर प्रवासियों के मुद्दे चुनाव परिणाम तय करेंगे। पहले चरण में देश की जिन 91 सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें 14 सीटें इन आठ राज्यों की हैं। क्षेत्र में कुल 25 सीटें हैं। आठ में से असम, त्रिपुरा और मणिपुर को छोड़ बाकी पांच राज्यों के चुनाव पहले ही चरण में पूरे हो जाएंगे। जानिए कहां क्या स्थिति, मुद्दे और हालात हैं...
अरुणाचल प्रदेश
दो सीट : अरुणाचल वेस्ट व ईस्ट
प्रमुख दल : कांग्रेस, नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी), भाजपा
मणिपुर
एक सीट : आउटर मणिपुर
प्रमुख दल : मणिपुर पीपल्स
पार्टी (एमएनपी), कांग्रेस
मेघालय
दो सीट : शिलांग और तुरा
प्रमुख दल : कांग्रेस, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी), हिल स्टेट पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी
सिक्किम
एक सीट : सिक्किम
प्रमुख दल : सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एसडीएफ) और कांग्रेस
असम
पांच सीट : तेजपुर, कालियाबोर,
जोरहाट, डिब्रुगढ़, लखीमपुर
प्रमुख दल : असम गण परिषद, भाजपा व कांग्रेस
मिजोरम
एक सीट : मिजोरम
प्रमुख दल : मिजो नेशनल फ्रंट व कांग्रेस
नागालैंड
एक सीट : नागालैंड
प्रमुख दल : नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी और कांग्रेस
त्रिपुरा
एक सीट : त्रिपुरा
प्रमुख दल : भाजपा, सीपीएम, इंडीजीनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा
प्रवासी : परिणामों पर असर डालेगा फैक्टर
40 लाख हैं अवैध प्रवासी
असम में अवैध अप्रवासियों का मुद्दा 50 से अधिक वर्षों से बरकरार है। पूरे पूर्वोत्तर व खासतौर से असम में बांग्ला भाषी हिंदू और मुस्लिम अवैध रूप से रहते हैं। क्षेत्रीय पहचान को बचाने के लिए बने राजनीतिक दल इन्हें बांग्लादेश से आया मानते हैं और इस वजह से उन्हें यहां से निकालना भी चाहते हैं। नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन में इनकी संख्या 40 लाख आंकी गई है।
भाजपा मजबूत होती गई
एनडीए 2014 में 11 सीटें जीती थीं। इनमें 8 भाजपा की थीं। कांग्रेस भाजपा पर बांटने की राजनीति का आरोप लगा रही है। वहीं, नागरिकता संशोधन विधेयक भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर रहा है। भाजपा ने 2016 में असम व फिर नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस बनाकर और क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर त्रिपुरा, मणिपुर सहित बाकी आठों राज्यों में सरकार बनाई।
कांग्रेस को खोई जमीन की तलाश
पारंपरिक रूप से असम कांग्रेस का गढ़ रहा है, लेकिन अवैध प्रवासियों के मामले में उसके रुख ने प्रदेश के एक वर्ग को उससे दूर कर दिया है। भाजपा के सत्ता में आने के बाद स्थितियां बदल चुकी हैं। 80 के दशक में अवैध प्रवासियों के खिलाफ असम आंदोलन का नेतृत्व करने वाली असम गण परिषद आज भाजपा के साथ बड़ा मोर्चा खड़ा कर चुकी है।
नागरिकता संशोधन विधेयक भाजपा के लिए बना फांस
भाजपा ने विधेयक में प्रावधान किया है कि 31 दिसंबर 2014 से पहले पड़ोसी देशों के जो अल्पसंख्यक भारत आ चुके थे, उन्हें नागरिकता दी जाएगी। क्षेत्रीय दल यह कट ऑफ तारीख पुराने समझौते के तहत 25 मार्च 1971 रखना चाहते हैं। भाजपा ने हिंदू वोट पाने के लिए यह मुद्दा खड़ा किया था, लेकिन अब उसे पूर्वोत्तर की 200 के करीब जनजातियों का विरोध सहना पड़ रहा है।
कांग्रेस की उम्मीद, भाजपा का नुकसान
नागरिकता मुद्दा कांग्रेस की आखिरी उम्मीद है। अगर जनजातीय हिंदू उसे वोट करते हैं, तो उसका प्रदर्शन शानदार हो सकता है। अल्पसंख्यक वोट उसके साथ हमेशा से रहा है, लेकिन इसमें जनजातीय हिस्सा जुड़ने का मतलब भाजपा का नुकसान है। कांग्रेस ने इसकी पूरी कोशिश की है। राहुल खुले तौर पर कह चुके हैं कि कांग्रेस सत्ता में आई तो बिल रद्द करेगी। वहीं, अमित शाह ने बिल का हर स्थिति में पास करने का वादा चुनाव में किया है।