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Hindi News ›   India News ›   Lok Sabha Elections 2019: Is Veteran BJP leader LK Advani distressed over Gandhinagar scenario?

क्या आडवाणी दुखी हैं, भाजपा स्थापना दिवस से ठीक दो दिन पहले क्यों लिखा ब्लॉग?

Fri, 05 Apr 2019 06:01 AM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शशिधर पाठक Updated Fri, 05 Apr 2019 06:01 AM IST
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Lok Sabha Elections 2019: Is Veteran BJP leader LK Advani distressed over Gandhinagar scenario?
लालकृष्ण आडवाणी - फोटो : PTI

क्या भाजपा के भीष्म पितामह लाल कृष्ण आडवाणी दुखी हैं? क्या आडवाणी गांधी नगर की सीट से उम्मीदवार न बनाए जाने को लेकर नाराज हैं या वजह कुछ और है? आखिर छह अप्रैल को भाजपा स्थापना दिवस से पहले चार अप्रैल को लालकृष्ण आडवाणी के बयान जारी करने की वजह क्या है? या फिर आडवाणी अपना कोई महत्व बताने के लिए सही समय का इंतजार कर रहे थे? यह सब कुछ ऐसे सवाल हैं जो 2019 के इस आम चुनाव की घोषणा के साथ मौजूं हैं।

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आडवाणी के करीबियों का कहना है कि जिस तरीके से भाजपा चल रही है, उससे वह दुखी हैं। यह पार्टी विद द डिफरेंस की उनकी परिकल्पना के आधार पर नहीं है। आडवाणी जी का मानना है कि भाजपा के मूल्य, सिद्धांत, व्यवहार और संगठन की क्षमता बिल्कुल अलग थी। यही वजह है कि स्थापना के 20 साल के भीतर ही पार्टी ने केंद्र में सरकार बनाने में सफलता पाई और 2014 में केन्द्र में सरकार बनाने के लिए पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। भाजपा के गठन के बाद यह पहला लोकसभा चुनाव है, जो अटल जी के देहांत के बाद हो रहा है।

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आखिर क्यों दु:खी हैं आडवाणी?


इस सवाल पर भाजपा के वरिष्ठतम मार्गदर्शक मंडल के सदस्य आडवाणी से कोई बात नहीं हो सकी, लेकिन सूत्र बताते हैं कि वह व्यथित हैं। भाजपा की केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार है। पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में उतर चुकी है, प्रत्याशी की घोषणा लगातार हो रही है और प्रचार अभियान की रणनीति को अंतिम रूप दिया जा चुका है। लेकिन न तो लाल कृष्ण आडवाणी से और न ही उनके बाद मार्गदर्शक मंडल के दूसरे सदस्य और पार्टी के संस्थापकों में एक डॉ. मुरली मनोहर जोशी से कोई चर्चा हुई।

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आडवाणी भाजपा के संस्थापकों में से एक हैं। संगठन कभी उनकी मुट्ठी में रहा था। 1950 के दशक से वह जनसंघ और भाजपा को अपना योगदान दे रहे हैं। आडवाणी के करीबी सूत्रों का कहना है कि आडवाणी जीवन भर सिद्धांतों पर चले, परिवारवाद के खिलाफ रहे, सुचिता की राजनीति की और लोकतांत्रिक मूल्यों को पार्टी के भीतर अहमियत दी, लेकिन इस समय भाजपा उन मूल्यों से खिसकती दिखाई दे रही है। इसकी उन्हें तकलीफ है।

यह तो बताने का तरीका था नहीं


आडवाणी के करीबी बताते हैं कि जिस तरह से गांधीनगर की सीट को लेकर पिछले एक साल से अंदरखाने में सबकुछ चल रहा था, वह आडवाणी को साल रहा था। आडवाणी करीब 92 साल के हो चुके हैं। शरीर से स्वस्थ हैं, लेकिन उम्र का असर है। इसलिए वह खुद बहुत भागम-भाग और चुनाव लड़ऩे के पक्ष में नहीं थे। उनके कार्यालय से संबंध रखने वाले सूत्र की मानें तो लालकृष्ण आडवाणी परिवार की राजनीति के सख्त खिलाफ हैं। वह अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी पुत्र जयंत को कदापि नहीं बना सकते, लेकिन बेटी प्रतिभा आडवाणी के बारे में यदि उन पर दबाव बनाया जाता तो सोच सकते थे।

फिर भी सूत्र का कहना है कि प्रतिभा को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने के लिए तैयार होते, इसमें संदेह है। इन सब स्थितियों के बावजूद आडवाणी उम्मीद करके चल रहे थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उनसे मिलकर गांधीनगर सीट के प्रत्याशी के बारे में चर्चा करेंगे। इस चर्चा के बाद ही पार्टी कोई निर्णय करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह आडवाणी के लिए तकलीफ की बात है कि पार्टी के संगठन मंत्री रामलाल ने लाल कृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी को जाकर इसकी सूचना दी।

....और फिर नहीं दिया आशीर्वाद


संगठन मंत्री राम लाल द्वारा गांधीनगर सीट से प्रत्याशी न बनाए जाने की सूचना मिलने के बाद आडवाणी जी को अच्छा नहीं लगा। उल्टे संगठन मंत्री चाहते थे कि आडवाणी लिखकर दे दें कि वह अधिक उम्र के कारण स्वेच्छा से गांधीनगर से लोकसभा चुनाव लड़के अनिच्छुक हैं। रामलाल ने यही आग्रह मुरली मनोहर जोशी से भी किया था। बताते हैं दोनों नेताओं ने रामलाल की यह बात नहीं मानी। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के दफ्तर आडवाणी का अनुकूल समय पूछा गया ताकि प्रधानमंत्री और शाह जाकर आडवाणी से मिल लें। गांधीनगर से नामांकन के पहले भाजपा अध्यक्ष पार्टी के वरिष्ठतम नेता का आशीर्वाद लें ले।

यह सांकेतिक ही सही, लेकिन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर अहमियत देने वाली भाजपा के लिए परंपरा के अनुरूप भी है। सूत्र बताते हैं कि आडवाणी इसके लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने नकारा भी नहीं और मिलने के समय की सूचना भी नहीं दी। समझा जा रहा है कि आडवाणी इस तरह की मुलाकात के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पा रहे थे। बताते हैं इसके बाद आडवाणी के कार्यालय को उम्मीद थी कि संभवत: समय मांगने के लिए अगला फोन आएगा, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो सका है।

आडवाणी और जोशी के लिए मुश्किल की घड़ी


संघ परिवार से आडवाणी के रिश्ते अब अच्छे नहीं हैं। डॉ. जोशी के हैं। डॉ. जोशी ने कुछ नेताओं से अपनी नाराजगी जताई और कानपुर के अपने मतदाताओं को पत्र भी लिखा कि पार्टी उन्हें चुनाव नहीं लड़ाना चाहती। आडवाणी को यह साहस नहीं हो रहा है। आडवाणी ने जीवन में भाजपा को संगठन, संगठन में नेता और भाजपा को सत्ता का रास्ता दिया है। सुषमा स्वराज, उमा भारती, उप राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, पूर्व केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार जैसे तमाम दिग्गज नेता आडवाणी द्वारा तराशे गए हैं, लेकिन परिस्थितियां बदल चुकी हैं।

आडवाणी की दुविधा है कि जिस पार्टी को उन्होंने अपने पसीने से सींचा है, कैसे उसकी नई परंपराओं पर खरी-खरी सुना दें। आडवाणी के करीबी मानते हैं कि वह भीतर से कुपित हैं, उनके सीने में इसको लेकर दर्द है, बोझिल हैं, लेकिन आडवाणी अपने सिद्धांतों, जीवन में तय किए मूल्यों से बंधे हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता की मानें तो जब अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा की नाराजगी और छटपटाहट आडवाणी ने देखी तो उन्हें पीड़ा हुई, लेकिन फिर भी वह अपनी मर्यादाओं में रहे। कुछ यही विधा है जो उन्हें लाल कृष्ण आडवाणी बनाती है। 
 

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