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उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण बनाम ठाकुर और जाति का पच्चड़ बन सकता है भाजपा के गले की फांस

Sat, 09 Mar 2019 12:49 AM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शशिधर पाठक Updated Sat, 09 Mar 2019 12:49 AM IST
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Lok Sabha Elections 2019: In Uttar Pradesh, equation of caste begun to disturb BJP
नरेंद्र मोदी- अमित शाह

संतकबीर नगर में सांसद शरद त्रिपाठी और विधायक राकेश सिंह बघेल के विवाद ने पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं तक को हिला दिया है। केन्द्र सरकार के एक मंत्री इस घटना को बेहद निंदनीय मान रहे हैं और उनका अनुमान है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस मामले को काफी गंभीरता से लिया है। उन्होंने खुद प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र नाथ पांडे से बात की है और इस प्रकरण में कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई संभव है। इसी के साथ-साथ भाजपा को उत्तर प्रदेश में जातिगत गणित ने परेशान करना शुरू कर दिया है।

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ब्राह्मण बनाम ठाकुर
उत्तर प्रदेश में भाजपा के नेताओं को बड़ा डर ब्राह्मण बनाम ठाकुर का लग रहा है। उ.प्र. में सवर्णों का प्रतिशत 18-20 प्रतिशत है। 2014 और 2017 के विधानसभा चुनाव में यह भाजपा का मूल बेस वोट था। कांग्रेस की प्रदेश में दुर्दशा और बसपा के घटते जाने का कारण भी इस वर्ग का छिटकना है। इसमें सबसे अधिक 8-9 प्रतिशत ब्राह्मण और 4-5 प्रतिशत ठाकुर हैं। वैश्य 3-4 प्रतिशत, त्यागी या भूमिहार दो प्रतिशत के करीब हैं। इनमें ब्राह्मण और ठाकुर सामाजिक तौर पर प्रतिस्पर्धी जातियां हैं। सांसद शरद त्रिपाठी और राकेश सिंह बघेल प्रकरण के बाद यह प्रतिस्पर्धा फिर मौजूं सी है। इसके समानांतर प्रदेश में ठाकुर बड़े नेता केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मणों की एक बड़ी आबादी ठाकुर राजनाथ के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी मान रही है। राज्य से वैसे भी 14 सांसद, 78 एमएलए 10 मंत्री ठाकुर हैं।
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जोशी, कलराज हाशिए पर
ब्राह्मण का बड़ा चेहरा मुरली मनोहर जोशी हैं। वह एक सांसद भर रह गए हैं। दूसरा बड़ा चेहरा कलराज मिश्र हैं और मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद वह भी सांसद हैं। उन्हें प्रत्याशी बनाए जाने पर भी 75 साल के उम्र की तलवार लटकी है। कलराज मिश्र को मंत्रिमंडल से बाहर करने के बाद ब्राह्मण चेहरे की भरपाई के लिए भाजपा अध्यक्ष के रूप में महेन्द्र नाथ पांडे को जिम्मेदारी सौंपी गई, लेकिन अभी वह इतनी बड़ी जगह नहीं बना पाए हैं।

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अन्य पिछड़ वर्ग
उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग करीब 41-43 फीसदी है। सबसे बड़ी 10 प्रतिशत की आबादी यादव,4-5 प्रतिशत कुर्मी, 4-5 प्रतिशत मौर्य, 3-4 प्रतिशत लोधी की है। राजभर समेत अन्य 21 प्रतिशत छोटी-छोटी जातियां हैं। साक्षी महाराज से कल्याण सिंह की मौजूदगी भाजपा को लोध मतों को दिलाती है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, स्वामी प्रसाद मौर्य समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। कुर्मी को अनुप्रिया पटेल का अपना दल बांधे रखता है। वहीं यादव समेत अन्य का करीब-करीब एक मुश्त वोट समाजवादी पार्टी के पाले में जाता रहा है। भाजपा ने 2014 के बाद 2017 में सामाजिक समीकरण को ठीक करके इसमें भी बड़ी सेंध लगा दी थी। इस बार इस समीकरण को साधना भी एक चुनौती है।

अनुसूचित जाति, जनजाति
उत्तर प्रदेश में यह संख्या 22-23 प्रतिशत है। बसपा की मायावती अपना दावा अब 25 प्रतिशत वोटों तक कर लेती है। इसमें 14-15 प्रतिशत जाटव, आठ प्रतिशत गैर जाटव हैं। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कुछ सेंध इधर भी लगाया था। इस बार यह राह भी थोड़ा मुश्किल भरी लग रही है। हालांकि भाजपा के पास इन सबको बांधे रखने के लिए मजबूत तर्क हैं। बाल्मिकी समाज के सफाई कर्मियों का प्रधानमंत्री द्वारा संगम तट पर पैर धोना इसी कड़ी में देखा जा रहा है।

अल्पसंख्यक
17-18 प्रतिशत अल्पसंख्यक मतदाता हैं। रामपुर से मुख्तार अब्बास नकवी भाजपा सांसद रह चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी छवि में थोड़ा सॉफ्ट कार्नर दिखाया है, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि अल्पसंख्यक समाज को छकाती है। मोदी सरकार का नारा सबका साथ, सबका विकास है। हालांकि भाजपा के कुछ बड़े नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि वह अल्पसंख्यकों के वोट को हटाकर अपने सफलता की सीढ़ी बनाते हैं।

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