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यूनिफॉर्म सिविल कोड की फिलहाल जरुरत नहीं, लिव इन में पैदा हुआ बच्चा जायज: विधि आयोग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 01 Sep 2018 09:21 AM IST
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विधि आयोग
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विधि आयोग ने यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर कहा है कि फिलहाल देश को इसकी जरुरत नहीं है। समान नागरिक संहिता को लेकर आयोग का कहना है कि देश में विविधता का मतलब असमानता नहीं विविधता को लगाना चाहिए। आयोग ने विधि आयोग के परामर्श पत्र को जारी करते हुए कहा कि लिव इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे को पिता की संपत्ति में अधिकार देने के लिए कानून बनाए जाने की आवश्यकता है।
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आयोग ने यह भी कहा कि लड़के और लड़की की शादी की उम्र समान की जानी चाहिए। वर्तमान कानून के अनुसार लड़की की विवाह के लिए उम्र 18 साल जबकि लड़के की 21 साल है। तलाक के बाद महिला को संपत्ति में आधा हिस्सा देने को लेकर भी सुझाव दिया गया। पर्सनल लॉ और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर विधि आयोग ने परामर्श पत्र जारी करते हुए कई सुझाव पेश किए और कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड इस चरण में ना तो जरुरी है और ना ही उपयुक्त है। आयोग ने सभी धर्मों के पर्सनल लॉ में बदलाव के लिए सुझाव दिए हैं।
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हमारे देश के तीन प्रमुख धर्म हिंदू, मुस्लिम और क्रिश्चियन से संबंधित पर्सनल लॉ में बदलाव के लिए पक्षकारों से पक्ष जानने के लिए विवरण मांगा गया था। इसमें मुख्य सवाल बहु विवाह, हिंदू महिला के संपत्ति के अधिकार, नाजायज बच्चों के अधिकार, शादी की उम्र, तलाक के लिए वेटिंग पीरियड का मामला आदि को लेकर थे। सवालों में अहम था कि क्या बहु विवाह प्रथा को खत्म किया जाए या फिर उसे नियंत्रित किया जाए।
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मुस्लिम धर्म में चार शादियों का प्रावधान है। क्या गुजरात में प्रचलित मैत्री करार खत्म होना चाहिए? जिसमें शादीशुदा हिंदू महिला मित्र से करार करते हैं और उन्हें अपने साथ रखते हैं। विधि आयोग का कहना है कि शादी की उम्र को लेकर अलग-अलग धर्मों में अलग व्यवस्था है। पर्नसल लॉ चाइल्ड मैरिज निरोधक कानून का उल्लंघन करता है जिसपर गौर करने की जरूरत है।
बहुविवाह के मामले में विधि आयोग ने कहा कि यदि एक शख्स कई महिलाओं से शादी करता है तो यह भारतीय दण्ड संहिता 494 के तहत अपराध है। इस्लाम में बहु विवाह प्रथा कायम है लेकिन कई बार इसका गलत इस्तेमाल होता है। विधि आयोग ने सुझाव देते हुए कहा है कि निकाहनामा में यह साफ लिखा जाना चाहिए कि बहु विवाह अपराध है और धारा 494 के तहत इसपर मुकदमा बनता है। आयोग ने यह भी कहा कि लिवइन में पैदा हुआ बच्चा जायज संतान का दर्जा रखता है और उसे पिता के साथ ही पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार मिलना चाहिए। वहीं कम समय के लिए लिवइन के दौरान पैदा हुआ बच्चा नाजायज की श्रेणी में रहेगा।