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कुरुक्षेत्र: आप को बाल हठ और भाजपा को राज हठ छोड़ना होगा

विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली Updated Thu, 05 Jul 2018 11:50 PM IST
kurushetra: aap have to leave child stubbornness and BJP's stubbornness
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दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल की सत्ता को लेकर चल रहे घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट का फैसला दिल्ली की जनता के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद है कि अब कम से कम भाजपा और आम आदमी पार्टी दिल्ली की जनता के हितों की आग पर सियासत की रोटियां सेंकने से बाज आएंगी। उपराज्यपाल दिल्ली की निर्वाचित सरकार के फैसलों को सम्मान देते हुए मुख्यमंत्री को काम करने देंगे और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब धरना प्रदर्शन की सियासत छोड़कर सरकार के बचे हुए कार्यकाल में दिल्ली की जनता के कल्याण और विकास पर ध्यान देंगे।
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हालाकि संसद द्वारा पारित जिस कानून के तहत दिल्ली में विधानसभा का गठन हुआ और संविधान की धारा 239एए जिसके तहत उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री के बीच शक्तियों और अधिकारों के विभाजन को परिभाषित किया गया है, सर्वोच्च न्यायालय ने सिर्फ उसकी नए सिरे से व्याख्या की है, कोई ऐसी नई बात नहीं कही है जो अभी तक किसी को पता नहीं थी। अदालत ने सिर्फ उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री को उनके अधिकार क्षेत्र फिर से बताए हैं। वैसे भी कानून बनाना अदालत का काम नहीं है। कानून बनाना विधायिका का अधिकार और जिम्मेदारी है, जबकि न्यायपालिका का काम उस कानून को सही तरीके से लागू करवाना और उसकी व्याख्या करना है।

ऐसा नहीं है कि दिल्ली में पहली बार ऐसी सरकार बनी है जो केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी की विरोधी है। इसके पहले 1993 में जब केंद्र में नरसिंह राव के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार थी, तब दिल्ली में मदनलाल खुराना के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी और 1998 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब दिल्ली में कांग्रेस की जीत के बाद शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं।
 
इन दोनों कालखंडों में दिल्ली सरकार और केंद्र के प्रतिनिधि उप राज्यपाल के बीच संवंधों अधिकारों और शक्तियों को लेकर संवैधानिक स्थिति जैसी आज है वैसी ही तब भी थी। दिल्ली तब भी पूर्ण राज्य नहीं था और अब भी नहीं है। दिल्ली विधानसभा और उपराज्यपाल की स्थिति तब भी वैसी ही थी जैसी अब है। लेकिन राजनीतिक बयानबाजी के अलावा कभी भी केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल और दिल्ली के मुख्यमंत्री के बीच कभी भी वैसा टकराव नहीं रहा जैसा आज है। 
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केंद्र-दिल्ली सरकार में पहले नहीं था कोई गतिरोध

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