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कुरुक्षेत्र: सुषमा, जयंत, गिरिराज से ही नहीं बजरंगी से भी होगी ध्रुवीकरण की खेती

Wed, 11 Jul 2018 08:31 PM IST
विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली Updated Wed, 11 Jul 2018 08:31 PM IST
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Kurukshetra: Not only Sushma, Jayant, Giriraj but Bajrangi will also be used to polarize elections
गिरिराज सिंह, सुषमा स्वराज, जयंत सिन्हा - फोटो : Amar Ujala
जिस तरह लखनऊ के पासपोर्ट प्रकरण के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया। केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने झारखंड में भीड़ हत्या के दोषियों को माला पहनाकर मिठाई खिलाकर सम्मानित किया और उनके ही मंत्रिमंडलीय सहयोगी गिरिराज सिंह बिहार में दंगे के आरोप में जेल में बंद लोगों के लिए आंसू बहाते हुए अपने ही गठबंधन की सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है और उत्तर प्रदेश की बागपत जेल में एक दिन पहले लाए गए कुख्यात अपराधी सरगना मुन्ना बजरंगी को सुबह सुबह जेल के भीतर गोलियों से छलनी करके मार डाला जाता है। इन मामलों का आपस में कोई संबंध नहीं है लेकिन इनका इस्तेमाल अब ध्रुवीकरण की खेती के जरिए हिंदुत्व की धार तेज करने के लिए होगा। 
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सुषमा स्वराज जो न सिर्फ देश की विदेश मंत्री हैं, भाजपा के उन शीर्ष नेताओं में एक हैं जिन्होंने राजनीति की लंबी पारी खेली है। भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी समेत सभी वरिष्ठ नेताओं के साथ काम कर चुकी हैं। एक समय उन्हें भाजपा में वाजपेयी, आडवाणी और जोशी के बाद सर्वाधिक लोकप्रिय चेहरा माना जाता था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेताओं का भरोसा भी सुषमा को हमेशा प्राप्त रहा है। 
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सुषमा का कसूर (ट्रोल करने वालों की नजर में) इतना था कि उन्होंने लखनऊ में अंतरधार्मिक विवाह करने वाले दंपत्ति के साथ लखनऊ के पासपोर्ट कार्यालय में संबंधित कर्मचारी द्वारा खड़े किए गए विवाद की शिकायत पर त्वरित कारर्वाई करते हुए न सिर्फ पासपोर्ट जारी करवाया बल्कि संबंधित कर्मचारी के खिलाफ भी कार्रवाई करवाई। उसके बाद सोशल मीडिया पर सुषमा स्वराज की जिस तरह लानत मलामत की गई, वह न सिर्फ शर्मनाक था, बल्कि बेहद घटिया स्तर का भी था। 
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सुषमा स्वराज एक बेहद संवेदनशील राजनेता हैं और बतौर विदेश मंत्री उन्होंने इसे साबित भी किया है। लेकिन जिस तरह उनके एक प्रशासनिक कदम को हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति में बदलने की कोशिश की गई वह बेहद गंभीर है और उससे भी ज्यादा गंभीर रही इस मुद्दे पर लंबे समय तक भाजपा की चुप्पी। जब विपक्ष और तमाम सामाजिक संस्थाओं और जाने माने लोगों ने सुषमा के पक्ष में आवाज बुलंद की तब करीब छह दिनों की चुप्पी के बाद गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पहली बार विदेश मंत्री के साथ सोशल मीडिया पर हुए इस बर्ताव की निंदा की। इसके बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी सामने आए और फिर भाजपा महासचिव राम माधव ने एक अंग्रेजी दैनिक में लेख लिखा। 

सुषमा के ट्रोलर्स से भाजपा की मौन सहानुभूति

लेकिन भाजपा के आधिकारिक प्रवक्ताओं ने इस पर कोई बयान नहीं दिया। ऐसा लगा कि मानों सुषमा स्वराज भाजपा की नहीं एनडीए के किसी घटक दल की नेता हों। वास्तव में देश की राजनीतिक संस्कृति में यह एक नया बदलाव है कि अपनी नेता और अपनी ही सरकार के मंत्री को पार्टी और सरकार तब अकेला छोड़ दे जब एक खास मानसिकता वाला तबका सोशल मीडिया पर घटिया स्तर के हमले कर रहा हो।

बात सिर्फ सुषमा के साथ भाजपा के न खड़े होने भर की ही नहीं है, दो केंद्रीय मंत्री जिस तरह से झारखंड और बिहार में उन लोगों के साथ खड़े दिखे जिनके खिलाफ भीड़ हत्या और दंगों के आरोप और मुकदमें हैं। रांची में केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने भीड़ हिंसा के शिकार अलीमुद्दीन की हत्या के आरोप में निचली अदालत से सजा पाकर जमानत पर छूटने वालों का सम्मान किया, और बिहार में गिरिराज सिंह ने दंगे के आरोपितों को निर्दोष बताते हुए अपनी ही गठबंधन सरकार को इसके लिए जिम्मेदार बताया। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से भाजपा ने मंत्रियों के इस आचरण पर कोई एतराज नहीं जताया।

टीवी बहस में पार्टी प्रवक्ताओं ने इसे मंत्रियों का निजी फैसला बताकर पल्ला झाड़ लिया। यानी सुषमा स्वराज की ट्रोलिंग और केंद्रीय मंत्रियों का पद की मर्यादा तोड़ने के मामलों में भाजपा का रुख एक जैसा यानी खामोशी वाला था। इसका अगर और विश्लेषण करें तो सुषमा मामले में पार्टी ट्रोलिंग करने वाले से मौन सहानुभूति जताती है तो मंत्रियों के मामले में वह खामोश रहकर सिन्हा और सिंह को अभयदान दे रही है।

यानी कहीं न कहीं भाजपा अपने मूल एजेंडे हिंदुत्व को धार देने में जुट गई है। इसीलिए जहां पासपोर्ट प्रकरण में हिंदुत्ववादियों के निशाने पर आईं सुषमा स्वराज को पार्टी ने अकेला छोड़ दिया वहीं बिहार में गिरिराज सिंह को लेकर गठबंधन के साथी जद(यू) और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरोध की भी कोई परवाह नहीं की जा रही है। क्योंकि दोनों ही मामलों में भाजपा को हिंदुत्व के ध्रुवीकरण की उम्मीद है। 

आपराधिक घटनाओं का सियासत पर असर

आपराधिक घटनाएं भी कई बार सियासत पर असर डालती हैं। बागपत जेल में पूर्वांचल के कुख्यात प्रेम प्रकाश सिंह उर्फ मुन्ना बजरंगी की गोली मार कर हत्या की घटना भले ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के कानून व्यवस्था के दावे के लिए एक गंभीर चुनौती हो, लेकिन जाने अनजाने इस कांड से भी उत्तर प्रदेश विशेषकर पूर्वांचल में हिंदुत्व के ध्रुवीकरण में तेजी आ सकती है। प्रकट रूप से भले ही यह हत्याकांड अपराधी गिरोहों की लड़ाई का नतीजा है, लेकिन इसके तार पूर्वांचल के गैंगवार से जुड़े हैं जिसका एक पहलू सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी है। 

मुन्ना बजरंगी पूर्वांचल के माफिया विधायक मुख्तार अंसारी का दाहिना हाथ माना जाता था और भाजपा के बाहुबली विधायक और भूमिहार नेता कृष्णानंद राय की हत्या का मुख्य अभियुक्त था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कभी हरिशंकर तिवारी बनाम वीरेंद्र प्रताप शाही के गिरोह युद्ध को ब्राह्णण राजपूत राजनीति के ध्रुवीकरण का भी एक चेहरा माना जाता रहा है। लेकिन सत्तर और अस्सी के दशक की यह जातीय गिरोहबंदी 90 के दशक में धीरे धीरे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में बदलने लगी। 

तिवारी और शाही जैसे पुराने बाहुबली नेपथ्य में चले गए और उनकी जगह मुख्तार अंसारी, ब्रजेश सिंह, जैसे बाहुबलियों ने ले ली। कृष्णानंद राय न सिर्फ भूमिहारों के दबंग नेता थे, बल्कि भाजपा और संघ की हिदुत्ववादी राजनीति का भी एक चेहरा थे। उनकी हत्या के पीछे मुख्तार अंसारी का नाम आने से पूर्वांचल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और तेज हो गया। जाति से राजपूत होने के बावूजद मुन्ना ने अंसारी का दामन छामा था और उसे मुख्तार गिरोह के शार्प शूटर के रूप में जाना जाता था। इसलिए उसकी हत्या को एक तरह से मुख्तार अंसारी के दाहिने हाथ को तोड़ने के रूप में प्रचारित किया जाने लगा है। 

पूर्वांचल के कई दबंग राजपूत और भूमिहार नेता इस समय भाजपा से जुड़े हैं। खुद कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय भाजपा विधायक हैं। बृजेश सिंह के भाई और भतीजे भी भाजपा विधायक हैं। पूर्वांचल की हिंदुत्व और राजपूत राजनीति में गोरखपुर मठ एक बड़ा ध्रुव है जिसके महंत योगी आदित्यनाथ इस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। सोशल मीडिया के अनौपचारिक चैनलों के जरिए मुन्ना बजरंगी के हत्याकांड को मुख्तार अंसारी गिरोह के खात्मे के साथ पूर्वांचल के अपराध जगत में मुस्लिम दबदबे के अंत की तरफ एक बड़े कदम के रूप में प्रचारित किया जाने लगा है। अगर यह प्रचार सिरे चढ़ा तो इससे होने वाले ध्रुवीकरण की खेती से वोटों की फसल काटी जा सकेगी। 
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