कुरुक्षेत्र: गुजरात का फेरबदल प्रधानमंत्री मोदी का मास्टर स्ट्रोक, जो बदलेगा सत्ता संतुलन

विनोद अग्निहोत्री विनोद अग्निहोत्री
Updated Sun, 12 Sep 2021 07:34 PM IST

सार

गुजरात में भाजपा विधायक दल की बैठक के बाद भूपेंद्र पटेल को विधायक दल का नया नेता चुन लिया गया। प्रदेश में या उसके बाहर बहुत कम लोग इस नाम से परिचित होंगे, क्योंकि पटेल कभी राज्य भाजपा की राजनीति में पहली क्या दूसरी और तीसरी पांत के नेता भी नहीं रहे।
गुजरात की राजनीति: नरेंद्र मोदी, भूपेंद्र पटेल, विजय रूपाणी।
गुजरात की राजनीति: नरेंद्र मोदी, भूपेंद्र पटेल, विजय रूपाणी। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

गुजरात में भाजपा विधायक दल की औपचारिक बैठक के बाद भूपेंद्र पटेल को विधायक दल का नया नेता चुन लिया गया है। इसके पहले गुजरात में या उसके बाहर बहुत कम लोग ही इस नाम से परिचित होंगे, क्योंकि भूपेंद्र पटेल कभी राज्य भाजपा की राजनीति में पहली क्या दूसरी और तीसरी पांत के नेता भी नहीं रहे हैं। 
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लेकिन भाजपा नेतृत्व की तरफ से उनको चुनावी वर्ष में गुजरात की कमान सौंपकर एक बात साफ कर दी गई है कि राज्य की राजनीति पर पूर्व मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल की पकड़ पहले की तरह मजबूत है। जो लोग बेन के राजभवन जाने को गुजरात की राजनीति से उनकी विदाई मान रहे थे। उन्हें भूपेंद्र पटेल के मुख्यमंत्री बनने से जरूर निराशा हुई होगी।


क्योंकि पटेल पूरी तरह से आनंदी बेन पटेल द्वारा उसी तरह पुष्पित पल्लवित और संरक्षित हैं जैसे कि मुख्यमंत्री बनने से पहले विजय रूपाणी केंद्रीय गृह मंत्री और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के वफादार माने जाते रहे हैं। गुजरात की राजनीति को जानने वाले समझ सकते हैं कि आनंदी बेन पटेल के वफादार को मुख्यमंत्री बनाए जाने का राज्य की राजनीति पर क्या असर होगा और इससे गुजरात का सत्ता संतुलन किस तरह बदल सकता है।

गुजरात की राजनीति के जानकार पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक आरके मिश्रा कहते हैं कि जब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद पर मराठी मूल के सीआर पाटिल को लाया गया था, तो तभी से राज्य की राजनीति के सत्ता संतुलन को बदलने की शुरुआत हो गई थी। अब भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाकर इसे पूरा कर दिया गया है।

मुख्यमंत्री पद से विजय रूपाणी का इस्तीफा बहुप्रतीक्षित था, इसलिए उसे लेकर राज्य की राजनीति के जानकारों में कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन रूपाणी के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री की गुद्दी पर कौन बैठेगा यह सवाल बेहद अहम था। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक के हिंदुत्व की पहली प्रयोगशाला वाले इस राज्य का महत्व संघ नेतृत्व के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी सबसे ज्यादा है।

इसलिए पूरी उम्मीद थी कि इस राज्य की कमान कोई ऐसा नेता संभालेगा जो न सिर्फ मोदी को मंजूर हो, बल्कि वैचारिक रूप से संघनिष्ठ भी हो। इसलिए पूरी तरह मुमकिन था कि जिन नामों की चर्चा मीडिया में हो रही है, उनसे इतर कोई ऐसा नाम आ जाए जो सबको चौंका दे। आखिरकार पहली बार विधायक बने भूपेंद्र रजनीकांत पटेल के नाम की जब घोषणा हुई तो सब उसी तरह चौंके जैसे कभी हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर, उत्तराखंड में पहले तीरथ सिंह रावत और फिर पुष्कर सिंह धामी के नाम पर चौंके थे।

दरअसल, जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली को ढंग से जानते हैं, उन्हें पता है कि मोदी पार्टी संगठन और सरकार में सत्ता संतुलन को बनाए रखने में बेहद सिद्धहस्त हैं और उन्हें पता है कि कब किसकी डोर कसनी है और कब किसकी डोर को ढीला छोड़ना है। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी भाजपा संगठन में फर्श से लेकर अर्श तक का सफर तय कर चुके थे।

उन्हें पार्टी संगठन के ताम कील-कांटे और पेंच मालूम हैं। इसलिए उनके फैसले लोगों को भले ही चौंकाते हों, लेकिन उनके आगे-पीछे बेहद गंभीर निहितार्थ छिपे होते हैं, जिन्हें पढ़ने की जरूरत रहती है। फिर गुजरात तो उनका अपना गृह राज्य है और वहां वह तेरह साल से भी ज्यादा मुख्यमंत्री रहे हैं।

पीछे मुड़कर नहीं देखा

केशूभाई पटेल को हटाकर जब 2001 में नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया गया तब तक वह कोई भी चुनाव नहीं लड़े थे और उन्हें संगठन का अनुभव तो था, लेकिन सरकार चलाने का भी कोई अनुभव नहीं था। उन्हें वहां भाजपा के तत्कालीन दिग्गज नेताओं के भितरघातों और विरोधों का भी सामना करना पड़ा। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी न पीछे मुड़कर नहीं देखा और न सिर्फ उन्होंने गुजरात में भाजपा को अजेय बनाया, बल्कि 2014 के बाद देश में भाजपा को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया है वह सबके सामने है।

लेकिन 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जिस तरह की कड़ी चुनौती भाजपा को दी थी और किस तरह मोदी ने खुद सारी ताकत झोंक कर पार्टी को हारते-हारते बचाकर बमुश्किल सरकार बनने लायक सीटें दिलवाई थीं, उसे नरेंद्र मोदी भूले नहीं हैं। विजय रूपाणी की आगुआई में हुए इन चुनावों में भाजपा का ग्राफ बुरी तरह नीचे आने के बावजूद उन्हें फिर मुख्यमंत्री महज इसलिए बनाया गया क्योंकि रूपाणी को तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का बेहद भरोसा हासिल था। 

लेकिन पिछले करीब चार साल में रूपाणी की सरकार कोविड प्रबंधन से लेकर अनेक मोर्चों पर उन अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी जो मानदंड नरेंद्र मोदी ने बतौर मुख्यमंत्री स्थापित किए थे। इसलिए रूपाणी को बदले जाने की बात बीते साल से ही शुरू हो गई थी, लेकिन शाह का वरदहस्त उनका कवच बना रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी निजी रिश्तों को बहुत अहमियत देते हैं, लेकिन उनसे भी ऊपर उनके लिए पार्टी और राजनीतिक उद्देश्य हैं। उन पर वह कोई समझौता नहीं करते। 

गुजरात से आने वाली खबरों ने परेशान किया

भाजपा के ही सूत्र बताते हैं कि गुजरात से आने वाली खबरें उन्हें परेशान कर रही थीं। मोदी भले ही देश के प्रधानमंत्री हों लेकिन गुजरातियों के लिए वो आज भी नरेंद्र भाई ही हैं और सरकारी तंत्र और पार्टी सगंठन के अलावा भी गुजरात की जानकारी जुटाने के उनके अपने अनेक स्रोत और चैनल हैं। इनके जरिए और संगठन तंत्र के जरिए मिलने वाली जानकारी के बाद उन्होंने गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन का मन तो बना लिया था। 

उन्होंने इसके लिए गृह मंत्री अमित शाह को भी राजी कर लिया। लेकिन लाया किसे जाए यह एक बड़ा सवाल था। राज्य सरकार और संगठन में जिस कदर ऊपर से नीचे तक गुटबाजी है, उसे देखते हुए गुजरात के किसी जाने पहचाने चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने से पार्टी संगठन की गुटबाजी घटने की बजाय बढ़ने की आशंका ज्यादा थी।

इधर राज्य की राजनीति से सक्रिय रूप से दूर हो चुकीं आनंदी बेन पटेल का खेमा भी लगातार नेतृत्व परिवर्तन का दबाव अपने तरीके से बना रहा था। गुजरात भाजपा सूत्रों के मुताबिक पिछले महीने से लेकर अब तक खुद आनंदी बेन दो बार अहमदाबाद आकर अपने समर्थकों के साथ बातचीत कर चुकी हैं। आनंदी बेन जो गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार में ताकतवर मंत्री रही हैं और उन्हें प्रधानमंत्री का भरोसा भी हासिल है। 

बदलाव की इस कवायद में उन्होंने बेहद खामोशी से अपने वफादार भूपेंद्र पटेल का नाम बढ़ाया, जो 2017 के चुनाव में पहली बार उस घाट लोदिया विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विजयी हुए थे। यह आनंदी बेन पटेल की अपनी सीट हुआ करती थी। भूपेंद्र पटेल की उपलब्धि यही थी कि उन्हें चुनाव में एक लाख सत्रह हजार वोटों की जबरदस्त बढ़त मिली थी, जो राज्य में सबसे ज्यादा थी। 

नेतृत्व की नई पांत भी तैयार

बेन को अच्छी तरह से पता था कि मोदी नए चेहरों को आगे बढ़ाने में ज्यादा विश्वास रखते हैं और इस तरह से वह पार्टी संगठन को न सिर्फ पुराने नेताओं के आग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्त करते हैं बल्कि नेतृत्व की नई पांत भी तैयार करते हैं। इसकी झलक उनकी गुजरात से लेकर केंद्र सरकार तक में मंत्रियों की नियुक्ति से लेकर राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति तक में दिखाई देती है। 

2014 के बाद भाजपा ने जितने भी राज्यों में चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनाई वहां पुराने स्थापित नेताओं को दरकिनार करके नए चेहरों को ही कमान दी गई। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर, महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस, झारखंड में रघुबरदास, हिमाचल प्रदेश में जयराम ठाकुर, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड में पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत, फिर तीरथ सिंह रावत और अब पुष्कर सिंह धामी, असम में पहले सर्वानंद सोनोवाल और अब हिमंतो विश्वसर्मा, कर्नाटक में बसवराज बोम्मई इसके उदाहरण हैं।

इसलिए आनंदीबेन पटेल के वफादार भूपेंद्र पटेल का नाम मोदी को जंच गया, क्योंकि यह नाम न सिर्फ नया था, बल्कि राजनीति की पहली पारी होने के कारण इसके पीछे किसी तरह का विवाद या आरोप भी नहीं है। इसके साथ ही पटेल के पाटीदार होने की वजह से राज्य के सबसे ताकतवर पाटीदार समाज की भावनाओं को भी संतुष्ट किया जा सकता है, जो आनंदीबेन पटेल को हटाए जाने के समय से ही खफा है। 

वहीं कांग्रेस से ज्यादा अब आम आदमी पार्टी उसे लुभाने में जुटी है। हालांकि पाटीदार समाज के प्रभावशाली नेताओं की भाजपा में कमी नहीं है। उनमें प्रमुख नाम केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला, मनसुख मांडविया, आरसी फालदू, उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल, राज्य के पूर्व गृह राज्य मंत्री गोवर्धन झडफिया की दावेदारी की भी चर्चा हुई। लेकिन इन सबकी अपेक्षा भूपेंद्र पटेल का नाम इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व को पसंद आया कि इससे राज्य की राजनीति का सत्ता संतुलन भी बदलेगा।

साथ ही केंद्र सरकार खासकर प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों और कार्यक्रमों को ज्यादा प्रभावशाली तरीके से लागू करवाया जा सकेगा। कुल मिलाकर गुजरात में सत्ता बदल और भूपेंद्र पटेल को कमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सियासी मास्टर स्ट्रोक है, जो पार्टी के बाहर और भीतर कई दिग्गजों को असहज करेगा और गुजरात की राजनीति से अधिकारिक रूप से बाहर हो चुकी आनंदी बेन पटेल राज्य से बाहर रहते हुए भी सत्ता का नया और अघोषित केंद्र बन सकती हैं। 
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