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दीनबंधु छोटूराम के ये बड़े काम, जिसकी वजह से पीएम मोदी ने दिया सम्मान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 09 Oct 2018 05:16 PM IST
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लोकसभा चुनाव 2019 का शंखनाद करने के लिए कांग्रेस के गढ़ हरियाणा में रोहतक जिले के सांपला में पीएम मोदी ने विशाल जनसभा की हैं। इससे पहले उन्होंने जाट किसानों के मसीहा दीनबंधु छोटूराम की प्रतिमा का अनावरण किया। सियासी हलकों में चर्चा है कि पीएम मोदी दीनबंधु छोटूराम का नाम लेकर जाट समुदाय को साधना चाहते हैं। आइए जानते हैं कि कौन हैं दीनबंधु छोटूराम जिनका पीएम मोदी बार-बार जिक्र कर रहे हैं।
छोटूराम का जन्म 24 नवंबर 1881 को रोहतक के एक छोटे से गांव गढ़ी सांपला में बहुत ही साधारण परिवार में हुआ था। छोटूराम का असली नाम राय रिछपाल था। भाइयों में सबसे छोटे होने की वजह से उन्हें परिवार के लोग छोटू कहकर पुकारते थे। बाद में स्कूल में भी उनका नाम छोटूराम लिखवा दिया गया। उनके दादा रामरत्न के पास 10 एकड़ बंजर जमीन थी। छोटूराम के पिता सुखीराम कर्जे और मुकदमों में बुरी तरह फंसे हुए थे।
छोटूराम ने 1891 में अपने गांव से 12 मील दूर स्थित मिडिल स्कूल झज्जर में प्राइमरी शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद उन्होंने क्रिश्चियन मिशन स्कूल दिल्ली में प्रवेश लिया। लेकिन उनके लिये फीस और शिक्षा का खर्चा वहन करना बहुत बड़ी चुनौती थी। छोटूराम और उनके पिता ने सांपला के एक साहूकार से कर्जा लेने की कोशिश की तो उन्हें काफी अपमानित किया गया। वह अपने अपमान को कभी भुला नहीं पाए और यही सोचकर आगे बढ़ते गए।
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इसके बाद छोटूराम के अंदर का क्रांतिकारी युवा जाग गया। छोटूराम हर अन्याय के विरोध में खड़े होने लगे। किसी मामले को लेकर क्रिश्चियन मिशन स्कूल के छात्रावास के प्रभारी के विरुद्ध उन्होंने पहली हड़ताल की। हड़ताल के बाद छोटूराम को स्कूल में 'जनरल रोबर्ट' के नाम से पुकारा जाने लगा। सन् 1903 में इंटरमीडिएट परीक्षा पास करने के बाद छोटूराम ने दिल्ली के अत्यन्त प्रतिष्ठित सैंट स्टीफन कालेज से 1905 में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की। छोटूराम ने अपने जीवन के आरंभिक समय में ही सर्वोत्तम आदर्शों और युवा चरित्रवान छात्र के रूप में वैदिक धर्म और आर्यसमाज में अपनी आस्था बना ली थी।
सन् 1905 में छोटूराम ने कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह के सह-निजी सचिव के रूप में कार्य किया और यहीं सन् 1907 तक अंग्रेजी के हिन्दुस्तान समाचारपत्र का संपादन किया। यहां से वह आगरा में वकालत की डिग्री करने आ गए। बाद में वह सन् 1911 में आगरा के जाट छात्रावास के अधीक्षक बने। 1911 में इन्होंने लॉ की डिग्री प्राप्त की। 1912 में उन्होंने चौधरी लालचंद के साथ वकालत आरंभ कर दी और उसी साल जाट सभा का गठन किया।
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छोटूराम का जन्म 24 नवंबर 1881 को रोहतक के एक छोटे से गांव गढ़ी सांपला में बहुत ही साधारण परिवार में हुआ था। छोटूराम का असली नाम राय रिछपाल था। भाइयों में सबसे छोटे होने की वजह से उन्हें परिवार के लोग छोटू कहकर पुकारते थे। बाद में स्कूल में भी उनका नाम छोटूराम लिखवा दिया गया। उनके दादा रामरत्न के पास 10 एकड़ बंजर जमीन थी। छोटूराम के पिता सुखीराम कर्जे और मुकदमों में बुरी तरह फंसे हुए थे।
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छोटूराम ने 1891 में अपने गांव से 12 मील दूर स्थित मिडिल स्कूल झज्जर में प्राइमरी शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद उन्होंने क्रिश्चियन मिशन स्कूल दिल्ली में प्रवेश लिया। लेकिन उनके लिये फीस और शिक्षा का खर्चा वहन करना बहुत बड़ी चुनौती थी। छोटूराम और उनके पिता ने सांपला के एक साहूकार से कर्जा लेने की कोशिश की तो उन्हें काफी अपमानित किया गया। वह अपने अपमान को कभी भुला नहीं पाए और यही सोचकर आगे बढ़ते गए।
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इसके बाद छोटूराम के अंदर का क्रांतिकारी युवा जाग गया। छोटूराम हर अन्याय के विरोध में खड़े होने लगे। किसी मामले को लेकर क्रिश्चियन मिशन स्कूल के छात्रावास के प्रभारी के विरुद्ध उन्होंने पहली हड़ताल की। हड़ताल के बाद छोटूराम को स्कूल में 'जनरल रोबर्ट' के नाम से पुकारा जाने लगा। सन् 1903 में इंटरमीडिएट परीक्षा पास करने के बाद छोटूराम ने दिल्ली के अत्यन्त प्रतिष्ठित सैंट स्टीफन कालेज से 1905 में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की। छोटूराम ने अपने जीवन के आरंभिक समय में ही सर्वोत्तम आदर्शों और युवा चरित्रवान छात्र के रूप में वैदिक धर्म और आर्यसमाज में अपनी आस्था बना ली थी।
सन् 1905 में छोटूराम ने कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह के सह-निजी सचिव के रूप में कार्य किया और यहीं सन् 1907 तक अंग्रेजी के हिन्दुस्तान समाचारपत्र का संपादन किया। यहां से वह आगरा में वकालत की डिग्री करने आ गए। बाद में वह सन् 1911 में आगरा के जाट छात्रावास के अधीक्षक बने। 1911 में इन्होंने लॉ की डिग्री प्राप्त की। 1912 में उन्होंने चौधरी लालचंद के साथ वकालत आरंभ कर दी और उसी साल जाट सभा का गठन किया।
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प्रथम विश्वयुद्ध के समय में चौधरी छोटूराम ने रोहतक से 22,144 जाट सैनिक भरती करवाये जो सारे अन्य सैनिकों का आधा भाग था। अब तो छोटूराम एक महान क्रांतिकारी समाज सुधारक के रूप में अपना स्थान बना चुके थे। इन्होंने अनेक शिक्षण संस्थानों की स्थापना की जिसमें "जाट आर्य-वैदिक संस्कृत हाई स्कूल रोहतक" प्रमुख है।
एक जनवरी 1913 को जाट आर्य-समाज ने रोहतक में एक विशाल सभा की जिसमें जाट स्कूल की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया जिसके फलस्वरूप 7 सितंबर 1913 में जाट स्कूल की स्थापना हुई। वकालत जैसे व्यवसाय में भी उन्होंंने नए ऐतिहासिक आयाम जोड़े। उन्होंने झूठे मुकदमे न लेना, छल-कपट से दूर रहना, गरीबों को निशुल्क कानूनी सलाह देना, मुव्वकिलों के साथ सद्व्यवहार करना, अपने वकालती जीवन का आदर्श बनाया।
इसके बाद उन्होंने 1915 ने 'जाट गजट' नाम का क्रांतिकारी अखबार शुरू किया जो हरयाणा का सबसे पुराना अखबार है, जो आज भी छपता है और जिसके माध्यम से छोटूराम ने ग्रामीण जनजीवन का उत्थान और साहूकारों द्वारा गरीब किसानों के शोषण पर एक सारगर्भित दर्शन दिया था जिस पर शोध की जा सकती है।
उन्होंने किसानों को सही जीवन जीने का मूलमंत्र दिया। जाटों का सोनीपत की जुडिशियल बैंच में कोई प्रतिनिधि न होना, बहियों का विरोध, जिनके जरिये गरीब किसानों की जमीनों को गिरवी रखा जाता था, राज के साथ जुड़ी हुई साहूकार कोमों का विरोध जो किसानों की दुर्दशा के जिम्मेदार थे, के संदर्भ में किसान के शोषण के विरुद्ध उन्होंने डटकर प्रचार किया।
एक जनवरी 1913 को जाट आर्य-समाज ने रोहतक में एक विशाल सभा की जिसमें जाट स्कूल की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया जिसके फलस्वरूप 7 सितंबर 1913 में जाट स्कूल की स्थापना हुई। वकालत जैसे व्यवसाय में भी उन्होंंने नए ऐतिहासिक आयाम जोड़े। उन्होंने झूठे मुकदमे न लेना, छल-कपट से दूर रहना, गरीबों को निशुल्क कानूनी सलाह देना, मुव्वकिलों के साथ सद्व्यवहार करना, अपने वकालती जीवन का आदर्श बनाया।
इसके बाद उन्होंने 1915 ने 'जाट गजट' नाम का क्रांतिकारी अखबार शुरू किया जो हरयाणा का सबसे पुराना अखबार है, जो आज भी छपता है और जिसके माध्यम से छोटूराम ने ग्रामीण जनजीवन का उत्थान और साहूकारों द्वारा गरीब किसानों के शोषण पर एक सारगर्भित दर्शन दिया था जिस पर शोध की जा सकती है।
उन्होंने किसानों को सही जीवन जीने का मूलमंत्र दिया। जाटों का सोनीपत की जुडिशियल बैंच में कोई प्रतिनिधि न होना, बहियों का विरोध, जिनके जरिये गरीब किसानों की जमीनों को गिरवी रखा जाता था, राज के साथ जुड़ी हुई साहूकार कोमों का विरोध जो किसानों की दुर्दशा के जिम्मेदार थे, के संदर्भ में किसान के शोषण के विरुद्ध उन्होंने डटकर प्रचार किया।
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छोटूराम ने राष्ट्र के स्वाधीनता संग्राम में भी डटकर भाग लिया। 1916 में पहली बार रोहतक में कांग्रेस कमेटी का गठन किया गया और वह रोहतक कांग्रेस कमेटी के प्रथम प्रधान बने। सारे जिले में छोटूराम का आह्वान अंग्रेजी हुकूमत को कंपकपा देता था। उनके लेखों और कार्य को अंग्रेजों ने बहुत 'भयानक' करार दिया।
फलस्वरूप रोहतक के डिप्टी कमिश्नर ने तत्कालीन अंग्रेजी सरकार से छोटूराम को देश-निकाले की सिफारिश कर दी। पंजाब सरकार ने अंग्रेज हुकमरानों को बताया कि छोटूराम अपने आप में एक क्रांति हैं, उनका देश निकाला गदर मचा देगा, खून की नदियां बह जायेंगी। किसानों का एक-एक बच्चा छोटूराम हो जायेगा। अंग्रेजों के हाथ कांप गए और कमिश्नर की सिफारिश को रद्द कर दिया गया।
अगस्त 1920 में छोटूराम ने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि वह गांधी जी के असहयोग आंदोलन से सहमत नहीं थे। उनका विचार था कि इस आंदोलन से किसानों का हित नहीं होगा। उनका मत था कि आजादी की लड़ाई संवैधानिक तरीके से लड़ी जाए। कुछ बातों पर वैचारिक मतभेद होते हुए भी महात्मा गांधी की महानता के प्रशंसक रहे और कांग्रेस को अच्छी जमात कहते थे।
फलस्वरूप रोहतक के डिप्टी कमिश्नर ने तत्कालीन अंग्रेजी सरकार से छोटूराम को देश-निकाले की सिफारिश कर दी। पंजाब सरकार ने अंग्रेज हुकमरानों को बताया कि छोटूराम अपने आप में एक क्रांति हैं, उनका देश निकाला गदर मचा देगा, खून की नदियां बह जायेंगी। किसानों का एक-एक बच्चा छोटूराम हो जायेगा। अंग्रेजों के हाथ कांप गए और कमिश्नर की सिफारिश को रद्द कर दिया गया।
अगस्त 1920 में छोटूराम ने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि वह गांधी जी के असहयोग आंदोलन से सहमत नहीं थे। उनका विचार था कि इस आंदोलन से किसानों का हित नहीं होगा। उनका मत था कि आजादी की लड़ाई संवैधानिक तरीके से लड़ी जाए। कुछ बातों पर वैचारिक मतभेद होते हुए भी महात्मा गांधी की महानता के प्रशंसक रहे और कांग्रेस को अच्छी जमात कहते थे।
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उन्होंने अपना कार्य क्षेत्र उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब तक फैला लिया और जाटों का सशक्त संगठन तैयार किया। आर्यसमाज और जाटों को एक मंच पर लाने के लिए उन्होंने स्वामी श्रद्धानन्द और भटिंडा गुरुकुल के मैनेजर चौधरी पीरूराम से संपर्क साध लिया और उसके कानूनी सलाहकार बन गए।
इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी बनाई। छोटूराम की जमींदारा पार्टी किसान, मजदूर, मुसलमान, सिख और शोषित लोगों की पार्टी थी। लेकिन यह पार्टी अंग्रेजों से टक्कर लेने को तैयार नहीं थी। हिंदू सभा व दूसरे शहरी हिन्दुओं की पार्टियों से उनका मतभेद था। भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत 1920 में आम चुनाव कराए गए। इसका कांग्रेस ने बहिष्कार किया और छोटूराम व लालसिंह जमींदरा पार्टी से विजयी हुए।
उधर 1930 में कांग्रेस ने एक और जाट नेता चौधरी देवीलाल को छोटूराम की पार्टी के विरोध में स्थापित किया। भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत सीमित लोकतंत्र के चुनाव 1937 में हुए। इसमें 175 सीटों में से यूनियनिस्ट पार्टी को 99, कांग्रेस को केवल 18, खालसा नेशनलिस्ट को 13 और हिन्दु महासभा को केवल 12 सीटें मिली थीं। हरियाणा देहाती सीट से केवल एक प्रत्याशी चौधरी दुनीचंद ही कांग्रेस से जीत पाये थे।
छोटूराम के कद का अंदाजा इस चुनाव से अंग्रेजों, कांग्रेसियों और सभी विरोधियों को हो गया था। छोटूराम की लेखनी जब लिखती थी तो आग उगलती थी। 'ठग बाजार की सैर' और 'बेचारा किसान' के लेखों में से 17 लेख जाट गजट में छपे। 1937 में सिकंदर हयात खान पंजाब के पहले प्रधानमंत्री बने और झज्जर के ये जुझारू नेता छोटूराम विकास व राजस्व मंत्री बने और गरीब किसान के मसीहा बन गए। छोटूराम ने अनेक समाज सुधारक कानूनों के जरिए किसानों को शोषण से निजात दिलवाई।
इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी बनाई। छोटूराम की जमींदारा पार्टी किसान, मजदूर, मुसलमान, सिख और शोषित लोगों की पार्टी थी। लेकिन यह पार्टी अंग्रेजों से टक्कर लेने को तैयार नहीं थी। हिंदू सभा व दूसरे शहरी हिन्दुओं की पार्टियों से उनका मतभेद था। भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत 1920 में आम चुनाव कराए गए। इसका कांग्रेस ने बहिष्कार किया और छोटूराम व लालसिंह जमींदरा पार्टी से विजयी हुए।
उधर 1930 में कांग्रेस ने एक और जाट नेता चौधरी देवीलाल को छोटूराम की पार्टी के विरोध में स्थापित किया। भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत सीमित लोकतंत्र के चुनाव 1937 में हुए। इसमें 175 सीटों में से यूनियनिस्ट पार्टी को 99, कांग्रेस को केवल 18, खालसा नेशनलिस्ट को 13 और हिन्दु महासभा को केवल 12 सीटें मिली थीं। हरियाणा देहाती सीट से केवल एक प्रत्याशी चौधरी दुनीचंद ही कांग्रेस से जीत पाये थे।
छोटूराम के कद का अंदाजा इस चुनाव से अंग्रेजों, कांग्रेसियों और सभी विरोधियों को हो गया था। छोटूराम की लेखनी जब लिखती थी तो आग उगलती थी। 'ठग बाजार की सैर' और 'बेचारा किसान' के लेखों में से 17 लेख जाट गजट में छपे। 1937 में सिकंदर हयात खान पंजाब के पहले प्रधानमंत्री बने और झज्जर के ये जुझारू नेता छोटूराम विकास व राजस्व मंत्री बने और गरीब किसान के मसीहा बन गए। छोटूराम ने अनेक समाज सुधारक कानूनों के जरिए किसानों को शोषण से निजात दिलवाई।