क्या है निजता के अधिकार का पूरा मामला, आम आदमी पर क्या पड़ेगा इसका असर?
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निजता के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई जारी है। माना जा रहा है सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस पर जल्द ही कोई निर्णय दे सकती है, हालांकि अभी इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि उच्चतम अदालत इस मुद्दे पर क्या फैसला सुनाएगी।
लेकिन इतना जरूर तय है कि यह फैसला एक इतिहास की नींव तो रखेगा ही दशकों से चली आ रही एक अंतहीन बहस को भी समाप्त कर सकता है जो निजता के अधिकार को लेकर जारी रहती है। खास बात ये है कि देश में तमाम बड़े मुद्दों पर निजता के अधिकार की बात उठ चुकी है, और समय-समय पर इसकी पैरवी की वकालत भी की जाती रही है।
यहां तक की राष्ट्रपति भी अपने कार्यकाल के शुरूआती दिनों में निजता के अधिकार की वकालत कर चुके हैं। ऐसे में जानना जरूरी है कि क्या है निजता का अधिकार और कब से चली आ रही है इसके हक की लड़ाई।
जानिए किस बात पर सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा झगड़ा
वर्तमान में निजता के अधिकार को लेकर जो बहस शुरू हुई है वो आधार की अनिर्वायता के केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन के बाद शुरू हुई। जिसमें केंद्र सरकार ने सोशल वेलफेयर स्कीम का लाभ लेने के लिए आधार को अनिवार्य कर दिया था। इसके विरोध में एक के बाद एक सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुई।
जिसमें कहा गया कि आधार की अनिवार्यता निजता के अधिकार का उल्लंघन है, जिसमें किसी व्यक्ति की सारी सूचनाएं सावर्जनिक हो सकती हैं। इसलिए आधार कार्ड को निजता के खिलाफ माना गया। शुरूआत में जस्टिस जे चेलामेश्वर के नेतृत्व वाली तीन जजों की पीठ इस पर सुनवाई कर रही थी, लेकिन इस मुद्दे पर कई और अन्य याचिकाएं दायर होने के बाद जस्टिस चेलामेश्वर ने कहा कि नौ जजों वाली पीठ ही इस मुद्दे पर कोई निर्णय दे सकती है।
जिस पर अब चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर के नेतृत्व वाली नौ जजों की पीठ जिसें जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस एस बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस एस अब्दुल नजीर,
जस्टिस एसके कौल, जस्टिस एसएस नजीर, जस्टिस फाली नरीमन, जस्टिस एएम स्प्रे शामिल हैं।
दो बार पहले सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुकी है निजता के अधिकार को
असल में पीठ का यह मुद्दा नौ जजों की बेंच को रेफर करने की एक बड़ी वजह भी थी, साल 1952 में एमपी शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट की 8 जजों की बेंच यह निर्णय दे चुकी थी कि निजता का अधिकार कोई कानूनी अधिकार नहीं है, यह एक नैतिक मामला है। न ही यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में आता है।
हालांकि इसे हमेशा से ही इस तरह प्रचारित किया गया जैसे यह कोई कानूनी अधिकार हो। इसके बाद 1960 में एक बार फिर यह मुद्दा उठा उस समय खड़क सिंह मामले में 5 जजों की पीठ ने स्पष्ट किया था कि निजता का अधिकार कोई कानूनी अधिकार नहीं है। ऐसे में साफ था कि जिस मुद्दे पर पांच और आठ जजों की पीठ एक जैसा निर्णय दे चुकी हो उस पर स्थिति पूरी तरह नौ जजों की पीठ ही साफ कर सकती है।
खास बात ये है कि निजता के अधिकार का मुद्दा हल होने के बाद ही आधार की वैधानिकता की स्थिति स्पष्ट होगी। साफ है कि अगर पीठ निजता को बनाए रखने के पक्ष में निर्णय देती है तो आधार के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।
गौर करने वाली बात ये भी है कि पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अटार्नी जनरल केके वेगुगोपाल ने दलील दी थी कि निजता का अधिकार कानूनी अधिकार नहीं है यह उसी तरह से है जैसे प्रेस की आजादी की बात की जाती है। लेकिन लिखित रूप से प्रेस को भी कोई ऐसा अधिकार प्राप्त नहीं है।