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2022 में भारत करेगा जी-20 की मेजबानी, आइए जानते हैं इस समूह के बारे में सबकुछ
Tue, 18 Dec 2018 10:44 PM IST
अजय सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: अजय सिंह
Updated Tue, 18 Dec 2018 10:44 PM IST
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2022 में जी 20 की मेजबानी करेगा भारत
वर्ष 2022 भारत के लिए बहुत खास है। इसी वर्ष देश एक ओर जहां आजादी के 75 साल पूरा करेगा वहीं दूसरी तरफ जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी भी करेगा। 20 प्रमुख राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाओं पर विचार करने वाले इस सम्मेलन में भारत को मेजबानी मिलना एक बड़ी कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है। इस वर्ष जी-20 सम्मेलन की मेजबानी पहले इटली को करनी थी, लेकिन अब इसका मेजबान भारत होगा।
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आइए जानते हैं क्या है जी-20 संगठन से जुड़ी बातें
जी-20 यानी ग्रुप ऑफ 20, ऐसे देशों का समूह जो औद्योगिक और विकासशील देश वैश्विक उत्पादन के लिए 90 फीसदी जिम्मेदार है। जिसमें अतंराष्ट्रीय कारोबार, वैश्विक विकास और जलवायु परिवर्तन को भी प्रभावित करता है। जी-20 का गठन जी-7 देशों ने किया है। यह एक ऐसा समूह है जिसमें 19 देश शामिल हैं और 20वां हिस्सेदार है यूरोपीय संघ। इस समूह के सभी भागीदार साल में एक बार शिखर सम्मेलन में मिलते हैं।
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आर्थिक मामलों पर होती है चर्चा
चूंकि इस पूरी बैठक का केंद्र अंतरराष्ट्रीय कारोबार और वैश्विक विकास है इसलिए इन बैठकों में सरकार प्रमुखों के साथ उन देशों के केंद्रीय बैंक के गवर्नर भी शामिल होते हैं। यूरोपीय संघ का प्रतिनिधित्व यहां यूरोपीय आयोग करता है। साथ ही यूरोपीय केंद्रीय बैंक भी बैठक में हिस्सा लेता है। मुख्य रूप से यहां आर्थिक मामलों पर चर्चा होती है।
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समूह के फैसले की होती है अहमियत
हालांकि, इस बैठक में शामिल देशों की मुलाकात अनौपचारिक होती है, लेकिन जी-20 के देश जो इस बैठक में फैसला लेते हैं, उसमें वजन होता है। दुनिया के 20 औद्योगिक और विकासशील देश वैश्विक उत्पादन के 90 फीसदी हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। इस तरह वे अंतरराष्ट्रीय कारोबार, वैश्विक विकास और जलवायु परिवर्तन को भी काफी प्रभावित करते हैं। जी-20 का गठन जी-7 देशों ने किया है।
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10 साल पहले अस्तित्व में आया नया स्वरूप
G-20
देश-दुनिया के कई देश कुछ समूह में काम करते हैं। कुछ ऐसा ही है जी-8 और जी-20। जी-8 को राजनीतिक और जी-20 को आर्थिक मंच के तौर पर अलग-अलग पहचान दी गई। 2014 में रूस को जी-8 से अलग किया गया और वह एक बार फिर जी-7 बन गया। आज जिस रूप में जी-20 को देख रहे हैं, उसकी शुरुआत 10 साल पहले नवंबर 2008 से हुई थी। अमेरिका में पहली बार 20 देशों के राष्ट्राध्यक्ष आर्थिक मामलों पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए। 2009 और 2010 में यह बैठक दो बार हुई। लेकिन इन संगठनों के अलावा दुनिया में जी संगठनों की सूची लंबी है।
आखिर क्यों खास है यह संगठन?
वैसे तो समय के साथ देशों में विवाद चलते रहते हैं। इस संघ की अहमियत तब बढ़ जाती है जब हम अमेरिका और चीन के बीच चल रहे आर्थिक विवाद को देखते हैं। डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से आर्थिक और सैन्य मंच पर कई तरह के बदलाव देखे गए हैं। अपनी “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत ट्रंप ने जी-20 के उसूलों को कई बार नजरअंदाज किया है। वे लगातार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने यह कहने में भी कभी संकोच नहीं जताया है कि उनके लिए सिर्फ उन्हीं के देश की अर्थव्यवस्था सबसे ज्यादा मायने रखती है।
इन 20 देशों में रहती है दुनिया की दो तिहाई आबादी
यूरोपीय संघ के अलावा ये 19 देश जी- 20 के सदस्य हैं: अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की, ब्रिटेन और अमेरिका। ये सभी सदस्य मिलकर दुनिया के सकल उत्पाद यानी जीडीपी का 85 फीसदी हिस्सा बनाते हैं। इसके अलावा इन देशों के वैश्विक व्यापार में हिस्सा भी 80 फीसदी है। यही नहीं, दुनिया की दो तिहाई आबादी यहीं रहती है। जी-20 की बैठक के दौरान कुछ "मेहमानों' को भी आमंत्रित किया जाता है। अफ्रीकी संघ, एशिया पैसिफिक इकोनॉमिक को-ऑपरेशन (एपेक), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), संयुक्त राष्ट्र (यूएन), विश्व बैंक, विश्व आर्थिक संगठन (डब्ल्यूटीओ) और स्पेन इस शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले स्थाई अतिथि हैं।
आखिर क्यों खास है यह संगठन?
वैसे तो समय के साथ देशों में विवाद चलते रहते हैं। इस संघ की अहमियत तब बढ़ जाती है जब हम अमेरिका और चीन के बीच चल रहे आर्थिक विवाद को देखते हैं। डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से आर्थिक और सैन्य मंच पर कई तरह के बदलाव देखे गए हैं। अपनी “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत ट्रंप ने जी-20 के उसूलों को कई बार नजरअंदाज किया है। वे लगातार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने यह कहने में भी कभी संकोच नहीं जताया है कि उनके लिए सिर्फ उन्हीं के देश की अर्थव्यवस्था सबसे ज्यादा मायने रखती है।
इन 20 देशों में रहती है दुनिया की दो तिहाई आबादी
यूरोपीय संघ के अलावा ये 19 देश जी- 20 के सदस्य हैं: अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की, ब्रिटेन और अमेरिका। ये सभी सदस्य मिलकर दुनिया के सकल उत्पाद यानी जीडीपी का 85 फीसदी हिस्सा बनाते हैं। इसके अलावा इन देशों के वैश्विक व्यापार में हिस्सा भी 80 फीसदी है। यही नहीं, दुनिया की दो तिहाई आबादी यहीं रहती है। जी-20 की बैठक के दौरान कुछ "मेहमानों' को भी आमंत्रित किया जाता है। अफ्रीकी संघ, एशिया पैसिफिक इकोनॉमिक को-ऑपरेशन (एपेक), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), संयुक्त राष्ट्र (यूएन), विश्व बैंक, विश्व आर्थिक संगठन (डब्ल्यूटीओ) और स्पेन इस शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले स्थाई अतिथि हैं।
जी-20 के अलावा इन संगठनों की भी है अलग भूमिका
जी-20 बैठक
- फोटो : ANI
जी-15
15 विकासशील देशों ने एक समूह का गठन किया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपना असर बढ़ाने के लिए 1989 में इसका गठन किया गया है। अब इस समूह में 17 सदस्य हैं और वे 2 अरब की आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे आपसी सहयोग के जरिए दक्षिण और दक्षिण के बीच विकास और आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देते हैं।
गरीबों देशों की भी है हिस्सेदारी जी-77
देशों के समूह में सिर्फ धनी देश ही नहीं गरीब और विकासशील देश भी शामिल हैं। यूनाइटेड नेशन की बैठक में धनी देश ही वैश्विक आर्थिक नीति पर फैसला न करें, इसलिए विश्व व्यापार सम्मेलन में 77 विकासशील देशों ने साथ मिलकर काम करने का फैसला किया। यह अभी तक का सबसे बड़ा देशों का समूह है जिसमें 134 देश सदस्य हैं, लेकिन यह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि इस समूह के दो बड़े सदस्य भारत और चीन भी हैं जो जी-20 के भी सदस्य हैं।
कैसे हुई इस संगठन की शुरुआत
जब दुनिया आर्थिक संकट से जूझ रही थी तब से जुड़ी है जी-20 संगठन की शुरुआत। लेकिन जी-20 को समझने के लिए जी-7 के बारे में जानकारी जरूरी है। 1975 में जब दुनिया आर्थिक संकट से गुजर रही थी तब दुनिया के छह बड़े देशों ने एकसाथ आने का फैसला लिया। इन देशों में फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका थे। जैसे-जैसे समूह का फायदा दिखा इसमें दूसरे देश भी जुड़ते गए। समूह के शुरू होने के दूसरे साल कनाडा भी इसमें शामिल हो गया और इस तरह से जी-7 की शुरुआत हुई। सोवियत संघ के खत्म होने के बाद धीरे-धीरे रूस को इस समूह में शामिल करने के प्रयास शुरू किए गए।
1998 में इससे रूस भी जुड़ गया और समूह जी-7 से जी-8 बन गया। इसके अगले ही साल जून 1999 में जब जर्मनी के कोलोन शहर में जी-8 देशों की बैठक हुई, तब एशिया बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा था तब इसपर चर्चा हुई। उस समय इस जी-8 ने दुनियाभर की 20 सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं को एकसाथ लाने का फैसला किया गया। दिसंबर 1999 में बर्लिन में पहली बार जी-20 नींव रखने के लिए बैठक हुई। इसमें सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों ने शिरकत की। बीस देशों में कौन-कौन से देश शामिल हों इसकी सूची बनाने का जिम्मा जर्मनी और अमेरिका ने मिलकर किया। पिछले 20 वर्षों में इस बैठक के रूप में कई बदलाव हुए हैं। आज जी-20 जिस स्वरूप में दिखता है उस शिखर तक पहुंचने के लिए इसे कई उतार-चढ़ाव से गुजरना पड़ा है।
15 विकासशील देशों ने एक समूह का गठन किया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपना असर बढ़ाने के लिए 1989 में इसका गठन किया गया है। अब इस समूह में 17 सदस्य हैं और वे 2 अरब की आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे आपसी सहयोग के जरिए दक्षिण और दक्षिण के बीच विकास और आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देते हैं।
गरीबों देशों की भी है हिस्सेदारी जी-77
देशों के समूह में सिर्फ धनी देश ही नहीं गरीब और विकासशील देश भी शामिल हैं। यूनाइटेड नेशन की बैठक में धनी देश ही वैश्विक आर्थिक नीति पर फैसला न करें, इसलिए विश्व व्यापार सम्मेलन में 77 विकासशील देशों ने साथ मिलकर काम करने का फैसला किया। यह अभी तक का सबसे बड़ा देशों का समूह है जिसमें 134 देश सदस्य हैं, लेकिन यह भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि इस समूह के दो बड़े सदस्य भारत और चीन भी हैं जो जी-20 के भी सदस्य हैं।
कैसे हुई इस संगठन की शुरुआत
जब दुनिया आर्थिक संकट से जूझ रही थी तब से जुड़ी है जी-20 संगठन की शुरुआत। लेकिन जी-20 को समझने के लिए जी-7 के बारे में जानकारी जरूरी है। 1975 में जब दुनिया आर्थिक संकट से गुजर रही थी तब दुनिया के छह बड़े देशों ने एकसाथ आने का फैसला लिया। इन देशों में फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका थे। जैसे-जैसे समूह का फायदा दिखा इसमें दूसरे देश भी जुड़ते गए। समूह के शुरू होने के दूसरे साल कनाडा भी इसमें शामिल हो गया और इस तरह से जी-7 की शुरुआत हुई। सोवियत संघ के खत्म होने के बाद धीरे-धीरे रूस को इस समूह में शामिल करने के प्रयास शुरू किए गए।
1998 में इससे रूस भी जुड़ गया और समूह जी-7 से जी-8 बन गया। इसके अगले ही साल जून 1999 में जब जर्मनी के कोलोन शहर में जी-8 देशों की बैठक हुई, तब एशिया बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा था तब इसपर चर्चा हुई। उस समय इस जी-8 ने दुनियाभर की 20 सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं को एकसाथ लाने का फैसला किया गया। दिसंबर 1999 में बर्लिन में पहली बार जी-20 नींव रखने के लिए बैठक हुई। इसमें सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों ने शिरकत की। बीस देशों में कौन-कौन से देश शामिल हों इसकी सूची बनाने का जिम्मा जर्मनी और अमेरिका ने मिलकर किया। पिछले 20 वर्षों में इस बैठक के रूप में कई बदलाव हुए हैं। आज जी-20 जिस स्वरूप में दिखता है उस शिखर तक पहुंचने के लिए इसे कई उतार-चढ़ाव से गुजरना पड़ा है।