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Khabron Ke Khiladi: विपक्षी एकता कितनी जरूरी, क्या गठबंधन के दल एक-दूसरे को जगह देंगे? जानें विश्लेषकों की राय

Sat, 15 Jul 2023 09:03 PM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Sat, 15 Jul 2023 09:03 PM IST
सार

Khabron Ke Khiladi: लोकसभा चुनाव को लेकर देश में सिसायत गर्म होने लगी है। एक तरफ विपक्ष की दूसरी बड़ी बैठक होने वाली है। दूसरी ओर, भाजपा ने भी एनडीए दलों की बैठक बुलाई है। चुनाव को लेकर मुद्दे भी तय होने लगे हैं। अमर उजाला के विशेष शो 'खबरों के खिलाड़ी' में इस बार इन्हीं मुद्दों पर राजनीतिक विश्लेषकों ने अपनी राय रखी। 
 

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Khabron Ke Khiladi: How important is opposition unity, will coalition parties give space to each other?
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति तेज हो गई है। एकजुटता की कोशिशों के बीच विपक्षी दलों की दूसरी बड़ी बैठक 17 और 18 जुलाई को बेंगलुरु में होनी है। इसमें कांग्रेस, जेडीयू, आरजेडी, टीएमसी, एनसीपी (शरद पवार गुट), सपा, शिवसेना (उद्धव गुट) समेत कई विपक्षी दलों के नेता शामिल होंगे। दूसरी ओर विपक्षी एकजुटता को जवाब देने के लिए भाजपा ने भी एनडीए का दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया है। 18 जुलाई को ही शाम पांच बजे दिल्ली में प्रधानमंत्री की उपस्थिति में एनडीए की बैठक होनी है। इसमें भाजपा ने अपने गठबंधन के कई दलों को बुलाया है। कई नए दल भी शामिल हो सकते हैं। 
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ऐसे में सवाल उठता है कि विपक्षी एकजुटता बनाम एनडीए की लड़ाई कैसी होगी? विपक्षी एकता कितनी मजबूत होगी? विपक्षी एकता को जवाब देने के लिए भाजपा जो गठबंधन कर रही है, वो कितनी जरूरी है? इसका क्या असर पड़ेगा? पीएम मोदी के सामने विपक्ष के पास कौन सा चेहरा है? गठबंधन की सरकारों के फायदे और नुकसान क्या हैं? भाजपा में पीएम मोदी के बाद कौन चेहरा बनेगा? 
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ऐसे ही तमाम सवालों पर अपनी राय रखने के लिए इस बार अमर उजाला के विशेष शो खबरों के खिलाड़ी में वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक विनोद अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार शुभव्रता भट्टाचार्य, रास बिहारी, जयशंकर गुप्त, अवधेश कुमार मौजूद रहे। यह चर्चा अमर उजाला के यूट्यूब चैनल पर शनिवार रात नौ बजे और रविवार सुबह नौ बजे देखी जा सकती है। जानिए विश्लेषकों की राय... 
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जयशंकर गुप्ता
'विपक्षी एकता के लिए लामबंदी तेज हो गई है। अभी ये कहना संभव नहीं होगा कि इस गठबंधन में कितने दल शामिल होंगे क्योंकि राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है। कब कौन किस गुट से निकलकर दूसरे गुट में चला जाएगा, यह तय नहीं होता। विपक्षी एकजुटता की इस कवायद से भाजपा डिप्रेशन में है। इसका अंदाजा पीएम मोदी के भाषण से लगाया जा सकता है। भोपाल में मंच से उन्होंने कहा कि सारे भ्रष्टाचारी एक हो गए हैं, लेकिन ठीक तीन दिन बाद भ्रष्ट सूची में शामिल अजित पवार को अपने साथ ले गए। डिप्टी सीएम बना दिया। वित्त मंत्रालय भी दे दिया। इससे साफ है कि विपक्षी एकजुटता की कवायद से भाजपा खौफ में है।'

'महाराष्ट्र में विधायकों के पाला बदलने की बात करें तो वहां जो हो रहा है, वह सबके सामने है। जनता की ताकत उद्धव ठाकरे के साथ है। एकनाथ शिंदे के पास कुछ नहीं है। यह सबकुछ सिर्फ पैसों की राजनीति है। पद, पैसे और बंगले के लिए लोग ऐसा कर रहे हैं। ये लोग चुनाव नहीं जीत पाएंगे। कर्नाटक इसका उदाहरण है।' 

'लोकसभा चुनाव में चेहरों को लेकर बात करें तो जनता अपना वोट सिर्फ चेहरों पर नहीं देती। भाजपा के ही दो बड़े उदाहरण हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी। 2004 के चुनाव में इन दोनों से बड़ा चेहरा कांग्रेस के पास भी नहीं था। इसके बावजूद कांग्रेस ने जीत हासिल की और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनाए गए। विपक्ष इस बार भाजपा के खिलाफ बड़ा माहौल बनाने में कामयाब है। रही बात, विपक्ष की बैठक में सोनिया गांधी के शामिल होने की तो वे यूपीए की चेयरपर्सन हैं। ऐसे में अगर कोई विपक्ष का बड़ा गठबंधन बनता है तो जाहिर है कि उसका नेतृत्व सोनिया गांधी ही करें।'

'भाजपा हमेशा परिवारवाद का आरोप विपक्षी दलों पर लगाती है। भाजपा को अपनी पार्टी में ही देखना चाहिए। कल्याण सिंह का बेटा, पोता दोनों पदों पर हैं। सिंधिया परिवार में ज्योतिरादित्य सिंधिया, वसुंधरा राजे सिंधिया हैं। राजनाथ सिंह-पंकज सिंह हैं? इनके यहां भी तो परिवारवाद है। '
 

अवधेश कुमार
'एनडीए को लेकर दलों की संख्या तय नहीं है। अकाली दल शामिल होगा या नहीं ये भी तय नहीं है। लेकिन गठबंधन के इन कयासों के बीच सबसे मूल बात ये है कि क्या भारत के मतदाता फिर से किसी गठबंधन की सरकार को चाहते हैं? गठबंधन की सरकारों का इतिहास पुराना है। गठबंधन की सरकार सही से नहीं चल पाती है। गठबंधन में सरकारें दबाव में काम करते हैं। ऐसे में जनता को ये तय करना होगा कि उन्हें क्या चाहिए? एक मजबूत सरकार या फिर कमजोर गठबंधन की सरकार? हैरानी की बात तो ये है कि विपक्ष जो एकजुट हो रहा है, उनमें 13 दल ऐसे हैं, जिनके पास एक भी सांसद नहीं है।' 

'रही बात भाजपा के गठबंधन की तो वह वैचारिक तौर पर अपना मुद्दा स्थिर रखती है। जो लोग ये कहते हैं कि भाजपा बिना वैचारिक तालमेल के साथ गठबंधन किए हुए है तो उन्हें ये भी समझना होगा कि गठबंधन के बावजूद भाजपा हमेशा से अपने चुनावी मैनिफेस्टो में राम मंदिर, राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को शामिल करती रही है। मतलब भाजपा कभी भी इससे समझौता नहीं करती।'
 
'2014 के बाद से राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का जो उभार हुआ है, वो आज तक नहीं हो पाया था। आज के समय मोदी एक चेहरा बन चुके हैं। वैश्चिक स्तर पर उन्होंने देश का नाम रोशन किया है। ग्लोबल स्तर पर देश मजबूत हुआ है। जनता इस बात को समझती है। हालांकि, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में मिली हार से पार्टी के कार्यकर्ता जरूर निराश हुए हैं।'

'जो लोग ये बोलते हैं कि भाजपा के राष्ट्रवाद के खिलाफ विपक्ष ने सामाजिक न्याय का मुद्दा खड़ा कर दिया है, उन्हें समझना होगा कि नरेंद्र मोदी अभी सत्ता के केंद्र में रहेंगे। नरेंद्र मोदी ने सोशल जस्टिस के व्यवहार को बदल दिया। सामाजिक न्याय पर बहुत काम भाजपा की सरकार में हुआ। जो पिछड़े, दलित, आदिवासी पहले बेघर थे, उन्हें मोदी सरकार ने पक्का मकान दिया। जो लोग जातीय जनगणना के बल पर हिंदुत्व के मुद्दे के पीछे होने की बात कर रहे हैं, उन्हें ये भी समझना होगा कि जब 2011 में जातीय जनगणना हुई थी, तब कांग्रेस की सरकार ही थी। कांग्रेस की सरकार ने ही इसे जारी होने से रोक लिया था।' 
 

शुभव्रता भट्टाचार्य 
'ये पहली बार नहीं है, जब विपक्ष की तरफ से गठबंधन के प्रयास हो रहे हैं। वहीं, जो लोग ये बोल रहे हैं कि विपक्ष के गठबंधन में शामिल कई दल बिना सांसद वाले हैं तो उन्हें ये भी समझना चाहिए कि भाजपा के भी कई समर्थक दल हैं, जिनके पास ज्यादा संख्या नहीं है। जब गठबंधन बनता है तब नरसिम्हा राव जैसी सरकार भी बन सकती है। पांच साल उन्होंने भी सरकार चलाई है। अभी बेंगलुरु में जो बैठक हो रही है। इसमें सोनिया गांधी भी शामिल होंगी। ये बहुत ही महत्वपूर्ण है। 2004 में भी सोनिया गांधी यूपीए का नेतृत्व कर चुकी हैं। लालू यादव, शरद पवार भी आज हैं। ये सब एक बड़ा फैक्टर होगा। हालांकि, पीएम मोदी की इमेज के आगे विपक्षी एकता की ये पहल मुझे सार्थक होती नजर नहीं आ रही है। मोदी को आज चैलेंज करने वाला विपक्ष में कौन है? हालांकि, यही स्थिति भाजपा में भी है। यहां भी मोदी जी के बाद किसका चेहरा है? चुनाव के दौरान कई फैक्टर काम करते हैं। रोजगार, महंगाई जैसे कई मुद्दे इस वक्त अंडरकरंट हैं। ये मुद्दे कई बार अंतिम समय पर खेल कर देते हैं।' 
 

विनोद अग्निहोत्री
'विपक्षी एकता को लेकर कई तरह की भ्रांतियां फैलाई जाती हैं। विपक्षी एकता ठीक से मंच पर नहीं आती, ये कहना ठीक नहीं होगा। बच्चा पैदा होने में भी नौ महीने लेता है। इतिहास भी खंगालें तो कोई ऐसा उदाहरण नहीं दिखता है, जब कोई तुरंत गठबंधन बन गया हो या गठबंधन में वैचारिक मतभेद नहीं होते हों। 1989 की बात है। मथुरा से वीपी सिंह भाजपा का झंडा देखकर विपक्षी एकता के मंच से चले गए थे। उस दौरान सब एक-दूसरे के खिलाफ तेवर दिखा रहे थे। उसके बावजूद सरकार बनी। हां, ये जरूर है कि गठबंधन की सरकार वही चलती है, जब उसका नेतृत्व बड़ी पार्टी करे।' 

'विपक्ष की बैठक में सोनिया गांधी के पहुंचने और विपक्षी दलों के नेतृत्व की बात करें तो राहुल गांधी वैसे ही चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। रही बात सोनिया गांधी के बैठक में शामिल होने की तो वे यूपीए की चेयरपर्सन हैं। कांग्रेस की बड़ी नेता हैं। ये बैठक भी कांग्रेस ही करवा रही है। ऐसे में उनका जाना जरूरी है।'

'हिंदू राष्ट्र की बात करें तो संघ हमेशा से हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर रही है। हिंदुत्व की ताकत भाजपा के साथ है ही। ये कहना गलत नहीं होगा। 2014 के बाद जैसे हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को बढ़ाया गया, उसे भाजपा ने अपनी यूएसपी बना लिया। लेकिन सिर्फ हिंदुत्व ही चलेगा... ऐसा नहीं है। अगर हिंदुत्व की बात है तो विपक्ष सामाजिक समरता का मुद्दा लेकर आ रहा है। इसमें जातीय जनगणना जैसे तमाम मुद्दे हैं।'

'विपक्षी दलों पर भाजपा हमेशा परिवारवाद का बड़ा आरोप लगाती है। ऐसे लोगों को समझना होगा कि परिवारवाद से किसी के बेटे, बेटी या रिश्तेदार को मौका जरूर मिलता है, लेकिन उसे जीत जनता के वोट से ही मिलती है। जनता ही उन्हें चुनकर आगे बढ़ाती है। वहीं, भाजपा को अपने अंदर भी देखना चाहिए। वहां भी खूब परिवारवाद है।' 
 

रासबिहारी
'पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव को लेकर दावा किया जा रहा है कि भाजपा को झटका लगा है। ये कहीं से भी भाजपा को झटका नहीं लगा है। पिछली बार के मुकाबले भाजपा की सीटें दोगुनी हुई हैं। ऐसे में भाजपा को बंगाल में कमजोर कहना गलत होगा। दूसरी बात ये है कि आज भी पीएम मोदी के सामने विपक्ष के पास कोई मजबूत चेहरा है ही नहीं। यही कारण है कि कई बार विपक्षी दल एकसाथ आने की कोशिश कर चुके हैं। लेकिन कुछ खास फायदा नहीं मिला। इस बार भी क्या होगा, ये देखने वाली बात है। ऐसा इसलिए क्योंकि सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या विपक्षी दल एक दूसरे को अपने यहां स्पेस देंगे? ममता बनर्जी के साथ न तो वहां कांग्रेस आने वाली है और न ही सीपीएम आने वाली है। कांग्रेस के नेता दोहरी नीति अपना रहे हैं। एक तरफ कांग्रेस के नेता ममता के खिलाफ हैं, दूसरी तरफ यहां के बड़े नेता ममता का समर्थन करते हैं। इसी तरह क्या पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी किसी दूसरे पार्टी को आगे आने देगी?'

'भाजपा परिवारवाद वाली पार्टी नहीं है। यहां जो फैसला लिया जाता है वो संगठन स्तर पर लिया जाता है। भाजपा में नेतृत्व को लेकर कोई वाद-विवाद नहीं है। यहां बहुत से चेहरे हैं, जो मोदी के बाद नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं। भाजपा में नेतृत्व संकट की कोई बात नहीं है। रही बात लोकसभा चुनाव के दौरान महंगाई, बेरोजगारी की तो ऐसे तमाम मुद्दे पहले भी रहे हैं। ये सब राजनीतिक कारणों से उठाए जाते हैं। किसान आंदोलन भी राजनीतिकरण है। इसका वोटिंग पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ता है।
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