Yasin Malik Punishment: स्क्वाड्रन लीडर को 26 गोलियां मारने और 'घाटी का गांधी' बनने की कोशिशों पर अभी कोर्ट का फैसला है बाकी
कानून के जानकारों का कहना है कि इन मामलों में उसे फांसी तक की सजा हो सकती है। अपने इन्हीं गुनाहों के साथ यासीन मलिक ने 'घाटी का गांधी' बनने का प्रयास भी किया था। जब वह सफल नहीं हुआ तो मलिक ने अब मकबूल भट्ट और अफजल गुरु की तरह खुद को 'घाटी का शहीद' कहलवाने का खेल शुरू कर दिया...
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यासीन मलिक, जिसे देश के पहले आर्म्स मिलिटेंट की टोली का सदस्य कहा जाता है, उसके गुनाहों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। अभी तो दिल्ली की एनआईए कोर्ट ने 'गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम' के तहत आतंकवाद के मामले में उसे दोषी करार दिया है। कोर्ट का कहना है कि यासीन मलिक ने स्वतंत्रता संग्राम के नाम पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए दुनिया भर से धन जुटाने का एक तंत्र बनाया था। आतंकवाद के दौर में अपने साथी की मदद से यासीन मलिक ने स्क्वाड्रन लीडर सुरेंद्र खन्ना को 26 गोलियां मारी थीं। उनके साथ एयरफोर्स के चार अन्य जवान भी मारे गए थे। इस मामले में यासीन के खिलाफ 'टाडा' का केस चल रहा है। गवाही की प्रक्रिया जारी है। साथ ही रुबिया सईद अपहरण मामले में भी टाडा अदालत ने जेकेएलएफ सुप्रीमो यासीन मलिक सहित नौ अन्य लोगों पर आरोप तय किए हैं।
कानून के जानकारों का कहना है कि इन मामलों में उसे फांसी तक की सजा हो सकती है। अपने इन्हीं गुनाहों के साथ यासीन मलिक ने 'घाटी का गांधी' बनने का प्रयास भी किया था। जब वह सफल नहीं हुआ तो मलिक ने अब मकबूल भट्ट और अफजल गुरु की तरह खुद को 'घाटी का शहीद' कहलवाने का खेल शुरू कर दिया।
जेकेएलएफ के संस्थापक को भी हो चुकी हैं फांसी
जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट 'जेकेएलएफ' के संस्थापक मकबूल भट्ट को सीआईडी इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या के आरोप में फरवरी 1984 को फांसी दी गई थी। गत वर्ष घाटी में मकबूल भट्ट और संसद हमले के दोषी मोहम्मद अफजल गुरु, जिसे 2013 में फांसी दी गई, इनकी मौत की तिथि पर जेकेएलएफ ने घाटी में पूर्ण बंद का आह्वान किया था। जम्मू कश्मीर के राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) ने कहा, यासीन मलिक एक कश्मीरी अलगाववादी नेता के साथ-साथ पूर्व आतंकवादी भी है। वह जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का अध्यक्ष था। यह वही संगठन है, जो कश्मीर घाटी में सशस्त्र उग्रवाद का नेतृत्व करता रहा है। हालांकि शुरुआत में यासीन मलिक एमयूएफ (मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट) के साथ जुड़ा रहा था। युसूफ शाह, जिसे अब सलाउद्दीन के नाम से जाना जाता है, वही इस संगठन का मुख्य नेता था। अस्सी के दशक में फारूख अब्दुल्ला ने इन्हें जेल में बंद कर दिया। बाद में इन लोगों ने तत्कालीन वीपी सिंह सरकार में गृह मंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद का अपहरण कर लिया। रूबिया सईद की रिहाई के बदले सरकार को पांच आतंकी छोड़ने पड़े थे। अब्दुल हमीद शेख, गुलाम नबी भट्ट, नूर मोहम्मद उर्फ नलका, मो अल्ताफ, मुश्ताक अहमद जरगर, युसूफ शाह और यासीन मलिक, पाकिस्तान चले गए थे। बाद में युसूफ शाह को छोड़कर बाकी भारत लौट आए।
यासीन मलिक दोबारा पाकिस्तान पहुंच गया था
यासीन मलिक कई बार पाकिस्तान गया था। पहली बार टोली के साथ और दूसरी बार वह अकेला गया था। पाकिस्तान, सदैव उसे मोहरा बनाकर घाटी में आतंकवाद फैलाता रहा है। बाद में सुरक्षा बलों ने उसकी टोली के कई साथियों को मार गिराया। यासीन ने भारत आकर एयरफोर्स अधिकारी सुरेंद्र खन्ना व चार अन्य जवानों की हत्या कर दी। वह अपने साथी के साथ बाइक पर सवार हो आया था। उसने जब एयरफोर्स जवानों पर फायर किया, तो सुरेंद्र खन्ना ने एक आतंकी को पकड़ लिया था। हालांकि उनके पेट में गोली लगी थी, लेकिन खिलाड़ी होने के कारण वे काफी देर तक आतंकी को दबोचे रहे। साथी को छुड़ाने के लिए आतंकियों ने सुरेंद्र खन्ना पर राइफल की पूरी मैगजीन खाली कर दी। यह मामला आज भी टाडा कोर्ट में चल रहा है। इसमें यासीन मलिक को फांसी की सजा संभावित है।
यासीन मलिक को बना दिया था हीरो
राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं कि यासीन मलिक को हीरो बनाने में कांग्रेस और पीडीपी का हाथ रहा है। यासीन ने इन्हीं दलों की सरकार के दौरान 'घाटी का गांधी' बनने का प्रयास किया था। उसने घोषणा की थी कि वह बंदूक छोड़ रहा है। इसके लिए बाकायदा मलिक ने एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया था। इसमें कहा गया था कि वह कश्मीर की आजादी के लिए ये सब कर रहा है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में उसे पीएम डॉ. मनमोहन सिंह से मिलवाया गया। बाद में उसने पाकिस्तान में आतंकी मसूद अजहर के साथ जब मंच साझा किया, तो वह सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर आ गया। यासीन मलिक के पाकिस्तान में मौजूद बड़े आतंकी संगठनों के साथ संबंध रहे हैं। अब उसे एनआईए अदालत ने दोषी ठहराया है। इससे कश्मीर में तरह तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिल रही हैं। राष्ट्रवादी लोग, उसे दोषी ठहराए जाने से खुश हैं। जो लोग आतंकियों का समर्थन या मदद करते हैं, वे दुखी हैं। भाजपा व एक आध पार्टी को छोड़कर बाकी दुखी हैं। वे जानती हैं कि यासीन मलिक पैसे के बदले उन्हें वोट दिलवाता था।
आतंकी गतिविधियों से बचने को बनाया था राजनीतिक मोर्चा
1993 में अलगाववादी एवं आतंकी गतिविधियों से दूरी बनाने के लिए मलिक ने राजनीतिक मोर्चे का सहारा लिया था। उसने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का गठन कर लिया था। इसके जरिए वह बड़े राजनीतिक पटल पर पहुंचना चाहता था। यहां पर भी उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। एनआईए जांच में सामने आया था कि यासीन मलिक, लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी), हिज्ब-उल-मुजाहिदीन (एचएम), जैश-ए-मोहम्मद (जेएम) और दूसरे आतंकी संगठनों को कई तरीके से मदद पहुंचाता रहा है। मलिक ने एनआईए अदालत से कहा था कि वह उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों का सामना नहीं करना चाहता। इन आरोपों में यूएपीए की धारा 16 (आतंकवादी अधिनियम), 17 (आतंकवादी अधिनियम के लिए धन जुटाना), 18 (आतंकवादी कृत्य करने की साजिश) और 20 (आतंकवादी गिरोह या संगठन का सदस्य होना) व धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) एवं आईपीसी की धारा 124-ए (देशद्रोह) शामिल हैं।
पाकिस्तान ने यासिन मलिक को 'राजनीतिक कैदी' बताया और रिहा करने की मांग की। पाकिस्तान के साथ मलिक के संबंध कितने मजबूत थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने भारत से मांग की थी कि यासिन मलिक के खिलाफ लगाए गए आरोपों को वापस ले लिया जाए। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र संघ और मानवाधिकार संगठनों से अपील की थी कि मलिक के साथ भारत में हो रहे व्यवहार पर आवाज उठाएं।