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कर्नाटकः बोम्मई फैसले की तरह जगदंबिका पाल फैसला भी बन सकता है नजीर

Wed, 16 May 2018 11:17 PM IST
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली 
विनोद अग्निहोत्री, अमर उजाला, नई दिल्ली  Updated Wed, 16 May 2018 11:17 PM IST
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Karnataka Election Result : Like the Bommai judgement Jagdambika Pal Decision can become a example

विधानसभा चुनावों के त्रिशंकु नतीजों के बाद कर्नाटक में शुरु हुई रिसोर्ट राजनीति लंबी चलेगी। न सिर्फ विधायकों की खरीद-फरोख्त लोभ लालच देने का गंदा खेल जो शुरु हो चुका है उसे लेकर आरोप प्रत्यारोप होंगे, बल्कि कानूनी विवाद के साथ ही राज्य की राजनीति में राजनीतिक बवंडर भी बढ़ेगा। राज्यपाल वजू भाई बाला के लिए यह अग्निपरीक्षा का वक्त है और उन्हें अपनी दलगत निष्ठा, निजी रिश्तों और संवैधानिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसा फैसला लेना है जिससे उनके ऊपर उंगली न उठे।

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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जगदंबिका पाल मामले में दिया गया आदेश भी एक नजीर और समाधान बन सकता है अगर राज्यपाल कानूनी विशेषज्ञों से उसके अमल पर राय ले लेते हैं। इस फैसले में कल्याण सिंह और जगदंबिका पाल को बराबर मानते हुए उनके बीच बहुमत का फैसला सदन में गुप्त मतदान से कराया गया था। इन नतीजों ने एक बार फिर त्रिशंकु विधानसभा में सरकार बनाने को लेकर राज्यपाल की भूमिका राजनीतिक दलों के आचरण पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं।
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ऐसा नहीं है कि देश में यह मौका पहली बार आया है। इसके पहले 2017 और 2018 में हुए गोवा, मणिपुर और मेघालय के चुनाव नतीजों के बाद आ चुका है। और अतीत में बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात समेत कई राज्यों में इस तरह की स्थितियां कई बार आ चुकी हैं और अलग अलग समय अलग अलग राज्यों में राज्यपालों के फैसले भी अलग अलग ही  होते  रहे हैं। जिन पर उंगलियां भी उठीं और सुप्रीम कोर्ट में जिन्हें चुनौती भी दी गई। 
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अदालत ने राज्यपालों के कई फैसलों को पलटा भी और कर्नाटक के ही मशहूर एसआर बोम्मई मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सबसे महत्वपूर्ण फैसला यह दिया कि बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं विधानसभा के सदन के पटल पर होगा। साथ ही बोम्मई मामले में त्रिशुंक विधानसभा की स्थिति में अदालत ने तीन और पैमाने तय किए जिनके मुताबिक राज्यपाल को अपने विवेक का इस्तेमाल करना होगा। क्योंकि संविधान में एसी स्थिति में राज्यपाल को अपने विवेक के आधार पर निर्णय करने का प्रावधान है। 

संविधान के इस प्रावधान का राज्यपालों ने कई बार दुरुपयोग करके मनमाने फैसले दिए। इस वजह से सुप्रीम कोर्ट ने पहला पैमाना तय किया कि सबसे पहले चुनाव से पहले किसी गठबंधन के पास अगर बहुमत का आंकड़ा है तो उसे सरकार बनाने का न्यौता देकर एक निश्चित समय में सदन में बहुमत साबित करने को कहा जाएगा। अगर ऐसा नहीं है तो दूसरा पैमाना यह है कि अगर चुनाव के बाद कोई गठबंधन बनता है और बहुमत का दावा करता है तो उसे सरकार बनाने का मौका देकर सदन में बहुमत साबित करने को कहा जाएगा। तीसरा मापदंड है कि अगर यह दोनों स्थितियां न हों तो सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाया जाए और सदन में बहुमत साबित करने को कहा जाए।

इसी आधार पर भाजपा ने गोवा, मणिपुर और मेघालय में सबसे बड़ा दल न होने के बावजूद चुनाव बाद गठबंधन करके सरकार बनाई। कर्नाटक में अब कांग्रेस और जद (एस) यही तर्क दे रहे हैं। लेकिन भाजपा सबसे बड़ा दल होने के आधार पर सरकार बनाने का दावा कर रही है। राज्यपाल वजूभाई बाला को अब दोनों में से किसी एक को मौका देना है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट का एक और फैसला है जिसे अभी तक एक अलग किस्म का माना जा सकता है। 

वह है जगंदबिंका पाल मामले में दिया गया फ्रैसला। 1998 में जब उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार को गिराकर तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई, जिसे आधी रात में भाजपा ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी और अगले दिन दोपहर तीन बजे अदालत ने राजभवन में हुए पाल के शपथ ग्रहण की पूरी प्रक्रिया को ही रद्द कर दिया। इसके खिलाफ पाल सुप्रीम कोर्ट गए और सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को बराबर मानते हुए सदन के भीतर गुप्त मतदान से बहुमत का फैसला कराने का आदेश दिया, जिसमें कल्याण सिंह जीते। राज्यपाल यह विकल्प भी अपना सकते हैं कि दोनों ही दावेदारों में किसी को भी मुख्यमंत्री न बनाकर गुप्त मतदान से बहुमत का फैसला करने का आदेश दे सकते हैं।

लेकिन राज्यपाल वजू भाई बाला कोई फैसला लें, इससे पहले ही विधायकों की धर पकड़ का खेल शुरु हो चुका है। भाजपा का दावा है कि कांग्रेस और जद(एस) के कुछ विधायक उसके संपर्क में हैं, जबकि कांग्रेस और जद(एस) ने इसे गलत बताया है। हालांकि जद(एस) नेता एच ड़ी कुमारस्वामी ने आरोप लगाया है कि भाजपा की तरफ से उनके विधायकों को सौ करोड़ रुपये तक रिश्वत की पेशकश की जा रही है। इसे भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने गलत और आधारहीन बताया है।


वहीं, कांग्रेस और जद(एस) के विधायकों को बंगलूरू से 40 किलोमीटर दूर एक रिसोर्ट में ले जाने की बात कही जा रही है और भाजपा विधायकों को तुमकूर के रिसोर्ट में भेजने की भी चर्चा है। विधायकों की तोड़ने और बचाने का खेल एकबार फिर देश की सियासी सुर्खियों में रहेगा।

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