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Kargil War Hero Digendra: पांच गोली खाकर काटी पाकिस्तानी मेजर की गर्दन, 48 को मारकर वापस दिलाई तोलोलिंग चोटी
Fri, 26 Jul 2024 07:16 AM IST
शिवेंद्र तिवारी
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Fri, 26 Jul 2024 07:16 AM IST
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कारगिल विजय दिवस 2024
- फोटो :
AMAR UJALA
विस्तार
Mahaveer Chakra Awardee Kargil Hero Naik Digendra Kumar: कोबरा दिगेंद्र कुमार देश का वह नायक जिन्हें 30 साल की उम्र में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने देश दूसरे सबसे बड़े गैलेंट्री अवॉर्ड महावीर चक्र से नवाजा था। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने अपनी टीम के सहयोग से 48 पाकिस्तानी सैनिकों को मारकर न केवल देश को बड़ी कामयाबी दिलाई बल्कि पांच गोलियां लगने के बावजूद पाकिस्तानी मेजर की गर्दन काटते हुए तोलोलिंग की चोटी पुन: फतह की और 13 जून की प्रभात बेला में तिरंगा लहरा दिया। यहां विस्तार से पढ़िए कारगिल के हीरो कोबरा नायक दिगेंद्र कुमार की वीर गाथा...
राजस्थान में जन्म, सैन्य माहौल में पले-बढ़े, राजपूताना राइफल्स में भर्ती हुए
राजस्थान के सीकर जिले की नीमकाथाना तहसील के एक गांव में जाट परिवार में जन्मे, दिगेंद्र बचपन से सैन्य माहौल में पले-बढ़े। उनके नाना स्वतंत्रता सेनानी थे तो पिता भारतीय सेना के वीर योद्धा रहे। 1947-48 के युद्ध के दौरान दिगेंद्र के पिता शिवदान सिंह के जबड़े में 11 गोलियां लगी थीं, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी थी। अपने पिता से प्रेरित दिगेंद्र कुमार 2 राजपूताना राइफल्स में भर्ती हो गए थे।
राजपूताना राइफल्स में भर्ती के दो साल बाद 1985 दिगेंद्र कुमार को श्रीलंका के जंगलों में प्रभाकरण के तमिल टाइगर्स के खिलाफ अभियान के लिए गई इंडियन पीस कीपिंग फोर्स में भेजा गया। इस अभियान के दौरान ही एक ही दिन में दिगेंद्र ने आतंकियों को मार गिराया, दुश्मन का गोला-बारूद का ठिकाना नष्ट किया और उनके कब्जे से पैराट्रूपर्स को छुड़ाया था। यह सब अचानक हुआ था, जब वह अपने जनरल के साथ गाड़ी से जा रहे थे और रास्ते में पुल के नीचे से लिट्टे के कुछ आतंकियों ने जनरल की गाड़ी पर हेंड ग्रेनेड फेंका था, दिगेंद्र ने उसी ग्रेनेड को कैच किया और वापस आतंकियों की ओर उछाल दिया था।
राजस्थान के सीकर जिले की नीमकाथाना तहसील के एक गांव में जाट परिवार में जन्मे, दिगेंद्र बचपन से सैन्य माहौल में पले-बढ़े। उनके नाना स्वतंत्रता सेनानी थे तो पिता भारतीय सेना के वीर योद्धा रहे। 1947-48 के युद्ध के दौरान दिगेंद्र के पिता शिवदान सिंह के जबड़े में 11 गोलियां लगी थीं, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी थी। अपने पिता से प्रेरित दिगेंद्र कुमार 2 राजपूताना राइफल्स में भर्ती हो गए थे।
राजपूताना राइफल्स में भर्ती के दो साल बाद 1985 दिगेंद्र कुमार को श्रीलंका के जंगलों में प्रभाकरण के तमिल टाइगर्स के खिलाफ अभियान के लिए गई इंडियन पीस कीपिंग फोर्स में भेजा गया। इस अभियान के दौरान ही एक ही दिन में दिगेंद्र ने आतंकियों को मार गिराया, दुश्मन का गोला-बारूद का ठिकाना नष्ट किया और उनके कब्जे से पैराट्रूपर्स को छुड़ाया था। यह सब अचानक हुआ था, जब वह अपने जनरल के साथ गाड़ी से जा रहे थे और रास्ते में पुल के नीचे से लिट्टे के कुछ आतंकियों ने जनरल की गाड़ी पर हेंड ग्रेनेड फेंका था, दिगेंद्र ने उसी ग्रेनेड को कैच किया और वापस आतंकियों की ओर उछाल दिया था।
कुपवाड़ा में एरिया कमांडर का खात्मा किया
इसके कुछ साल बाद उन्हें कश्मीर के कुपवाड़ा में भेजा गया। जहां उन्होंने आंतकियों का काम तमाम करना जारी रखा। उन्होंने एरिया कमांडर आतंकी मजीद खान का खात्मा किया। अपनी वीरता तथा शौर्य के लिए सेना मेडल से सम्मानित किए गए। इसके तकरीबन सालभर बाद ही 1993 में दिगेंद्र कुमार ने हजरतबल दरगाह को आंतकियों के चंगुल से आाजद कराने में अहम भूमिका निभाई थी। जिसके लिए भी उन्हें सराहना मिली। लेकिन दिगेंद्र के लिए यह सब छोटी उपलब्धियां थीं। वह बेबाक और निर्भीक योद्धा अपनी मातृभूमि के लिए कुछ बड़ा करना चाहता था। इसका उसे मौका भी मिला।
इसके कुछ साल बाद उन्हें कश्मीर के कुपवाड़ा में भेजा गया। जहां उन्होंने आंतकियों का काम तमाम करना जारी रखा। उन्होंने एरिया कमांडर आतंकी मजीद खान का खात्मा किया। अपनी वीरता तथा शौर्य के लिए सेना मेडल से सम्मानित किए गए। इसके तकरीबन सालभर बाद ही 1993 में दिगेंद्र कुमार ने हजरतबल दरगाह को आंतकियों के चंगुल से आाजद कराने में अहम भूमिका निभाई थी। जिसके लिए भी उन्हें सराहना मिली। लेकिन दिगेंद्र के लिए यह सब छोटी उपलब्धियां थीं। वह बेबाक और निर्भीक योद्धा अपनी मातृभूमि के लिए कुछ बड़ा करना चाहता था। इसका उसे मौका भी मिला।
राह में जो भी आया, उसका फुर्ती से खात्मा किया
1999 के आते-आते नायक दिगेंद्र कुमार उर्फ कोबरा सेना के बेहतरीन कमांडों में गिने जाने लगे थे। इसी वर्ष 13 जून के दिन जो हुआ उसने दिगेंद्र कुमार को जीते जी अमर कर दिया। उन्होंने 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित तोलोलिंग की चोटी और पोस्ट जीता बल्कि उस पर तिरंगा फहराकर हिंदुस्तान को पहली बड़ी एवं महत्वपूर्ण कामयाबी दिलाई। इस अभियान के दौरान उन्हें पांच गोलियां लगीं, लेकिन वे न रुके, न थके, न अटके, न भटके और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले गए। उनकी राह में जो भी आया, उसका फुर्ती के साथ खात्मा करते गए।
1999 के आते-आते नायक दिगेंद्र कुमार उर्फ कोबरा सेना के बेहतरीन कमांडों में गिने जाने लगे थे। इसी वर्ष 13 जून के दिन जो हुआ उसने दिगेंद्र कुमार को जीते जी अमर कर दिया। उन्होंने 15,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित तोलोलिंग की चोटी और पोस्ट जीता बल्कि उस पर तिरंगा फहराकर हिंदुस्तान को पहली बड़ी एवं महत्वपूर्ण कामयाबी दिलाई। इस अभियान के दौरान उन्हें पांच गोलियां लगीं, लेकिन वे न रुके, न थके, न अटके, न भटके और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते चले गए। उनकी राह में जो भी आया, उसका फुर्ती के साथ खात्मा करते गए।
तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल मलिक ने पूछा था प्लान
कारगिल युद्ध छिड़ने के बाद दिगेंद्र की यूनिट 2 राजपूताना राइफल्स को 24 घंटें में कुपवाड़ा से पहुंचने और अगले 24 घंटे में जंगी मोर्चा संभालने के लिए तैयार रहने का निर्देश मिला था। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक ने तैयारी बैठक ली। इसमें दिगेंद्र कुमार ने उन्हें तोलोलिंग चोटी पर चढ़ाई की अपनी योजना समझाई।
जनरल मलिक के निर्देशानुसार नायक दिगेंद्र को घातक टीम का कमांडर बनाया गया और उनके कमांडिंग ऑफिसर मेजर विवेक गुप्ता को बनाए गए। बफीर्ली पहाड़ी पर ठंड की कंपकपाहट के साथ रात के सन्नाटे में 12 जून की रात को चढ़ाई पूरी की। पाकिस्तानी सेना ने वहां 11 बंकर बना रखे थे। पहला और आखिरी बंकर दिगेंद्र कुमार ने उड़ाया।
कारगिल युद्ध छिड़ने के बाद दिगेंद्र की यूनिट 2 राजपूताना राइफल्स को 24 घंटें में कुपवाड़ा से पहुंचने और अगले 24 घंटे में जंगी मोर्चा संभालने के लिए तैयार रहने का निर्देश मिला था। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक ने तैयारी बैठक ली। इसमें दिगेंद्र कुमार ने उन्हें तोलोलिंग चोटी पर चढ़ाई की अपनी योजना समझाई।
जनरल मलिक के निर्देशानुसार नायक दिगेंद्र को घातक टीम का कमांडर बनाया गया और उनके कमांडिंग ऑफिसर मेजर विवेक गुप्ता को बनाए गए। बफीर्ली पहाड़ी पर ठंड की कंपकपाहट के साथ रात के सन्नाटे में 12 जून की रात को चढ़ाई पूरी की। पाकिस्तानी सेना ने वहां 11 बंकर बना रखे थे। पहला और आखिरी बंकर दिगेंद्र कुमार ने उड़ाया।
आसान नहीं था चोटी पर कब्जा जमाना
जब दिगेंद्र पहला बंकर उड़ाने के लिए रात के अंधेरे में दुश्मन के बंकर में घुस गए थे तभी इसकी भनक लगते ही दुश्मन ने ताबड़तोड़ फायरिंग की। उस दौरान उन्हें चार गोलियां लगीं। इनके अलावा दो गोली उनकी एके 47 पर लगीं थीं, जो हाथ से छूट गई थी। उस वक्त अपनी सूझबूझ से घायल दिग्रेंद्र ने अपना और अपने साथियों की हिफाजत का ध्यान रखते हुए तुरंत एक ग्रेनेड उस बंकर में फेंक दिया। इसके बाद अचानक से पीछे से हमला हुआ और कई साथी गंभीर घायल हो गए। फिर उनकी कंपनी ने उन 30 हमलावरों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
जब दिगेंद्र पहला बंकर उड़ाने के लिए रात के अंधेरे में दुश्मन के बंकर में घुस गए थे तभी इसकी भनक लगते ही दुश्मन ने ताबड़तोड़ फायरिंग की। उस दौरान उन्हें चार गोलियां लगीं। इनके अलावा दो गोली उनकी एके 47 पर लगीं थीं, जो हाथ से छूट गई थी। उस वक्त अपनी सूझबूझ से घायल दिग्रेंद्र ने अपना और अपने साथियों की हिफाजत का ध्यान रखते हुए तुरंत एक ग्रेनेड उस बंकर में फेंक दिया। इसके बाद अचानक से पीछे से हमला हुआ और कई साथी गंभीर घायल हो गए। फिर उनकी कंपनी ने उन 30 हमलावरों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
पाकिस्तानी सेना मेजर अनवर खान की उड़ाई गर्दन
उधर दिगेंद्र कुछ साथियों के साथ आगे बढ़ते रहे और बीच-बीच में स्टेरॉयड युक्त पेनकिलर के इंजेक्शन का इस्तेमाल करते रहे। ऐसा करके दिगेंद्र और उनकी टीम ने पूरे 11 बंकर तबाह कर दिए थे। इस बीच, सुबह चार बजे उनके आखिरी साथी सरदार सुमेर सिंह राठौड़ को भी गोली लग चुकी थी। फिर उसकी एलएमजी लेकर दिगेंद्र पहाड़ी की ओर आगे बढ़े, तब उन्हें रास्ते में पाकिस्तानी सेना मेजर अनवर खान दिखाई दिया।
दोनों का आमना-सामना हुआ तो दिगेंद्र एलएमजी से एक ही गोली चला पाए थे, तभी अनवर खान ने उन पर अपनी पिस्तौल से गोली दागी जो दिगेंद्र के कमर के नीचे पांव में लगी। तभी उसकी गोलियां खत्म हो चुकी थी। इसके बाद अनवर ने दिगेंद्र के ऊपर झपट्टा मारा लेकिन दिगेंद्र ने उसका गला पकड़ कर रखा और अपना खंजर निकालकर झटके से उसकी गर्दन उड़ा दी।
उधर दिगेंद्र कुछ साथियों के साथ आगे बढ़ते रहे और बीच-बीच में स्टेरॉयड युक्त पेनकिलर के इंजेक्शन का इस्तेमाल करते रहे। ऐसा करके दिगेंद्र और उनकी टीम ने पूरे 11 बंकर तबाह कर दिए थे। इस बीच, सुबह चार बजे उनके आखिरी साथी सरदार सुमेर सिंह राठौड़ को भी गोली लग चुकी थी। फिर उसकी एलएमजी लेकर दिगेंद्र पहाड़ी की ओर आगे बढ़े, तब उन्हें रास्ते में पाकिस्तानी सेना मेजर अनवर खान दिखाई दिया।
दोनों का आमना-सामना हुआ तो दिगेंद्र एलएमजी से एक ही गोली चला पाए थे, तभी अनवर खान ने उन पर अपनी पिस्तौल से गोली दागी जो दिगेंद्र के कमर के नीचे पांव में लगी। तभी उसकी गोलियां खत्म हो चुकी थी। इसके बाद अनवर ने दिगेंद्र के ऊपर झपट्टा मारा लेकिन दिगेंद्र ने उसका गला पकड़ कर रखा और अपना खंजर निकालकर झटके से उसकी गर्दन उड़ा दी।
जब वाजपेयी बोले- वाह! मेरे कलियुगी भीम बेटे, तुमने 48 को मारा
सवेरा होने वाला था, 13 जून, 1999 को सुबह के साढ़े चार बजे थे। तोलोलिंग की चोटी पर तिरंगा लहराने लगा था। नायक दिगेंद्र अपनी इस जीत से ज्यादा उत्साहित नहीं थे, वे अपने साथियों को खो देने के कारण अंदर से टूट चुके थे। वे गंभीर घायल थे, रो रहे थे। उसके बाद उन्हें कुछ याद नहीं। जब उनकी आंख खुली तो वे श्रीनगर के सैन्य अस्पताल में थे। दिगेंद्र बताते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि उन्होंने कितनों को मारा।
इसका पता तब चला, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी पीठ थपथपाकर कहा कि वाह मेरे कलियुगी भीम बेटे, तुमने 48 को मारा। दो और मार देते तो हाफ सेंचुरी लग जाती। तुम अभी भी नॉट आउट हो। हालांकि, इसके बाद दिगेंद्र कुमार का उपचार दो-तीन साल तक चलता रहा और बाद में वे अनफिट करार दिए जाने के बाद सेना से रिटायर हो गए। उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया।
सवेरा होने वाला था, 13 जून, 1999 को सुबह के साढ़े चार बजे थे। तोलोलिंग की चोटी पर तिरंगा लहराने लगा था। नायक दिगेंद्र अपनी इस जीत से ज्यादा उत्साहित नहीं थे, वे अपने साथियों को खो देने के कारण अंदर से टूट चुके थे। वे गंभीर घायल थे, रो रहे थे। उसके बाद उन्हें कुछ याद नहीं। जब उनकी आंख खुली तो वे श्रीनगर के सैन्य अस्पताल में थे। दिगेंद्र बताते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि उन्होंने कितनों को मारा।
इसका पता तब चला, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी पीठ थपथपाकर कहा कि वाह मेरे कलियुगी भीम बेटे, तुमने 48 को मारा। दो और मार देते तो हाफ सेंचुरी लग जाती। तुम अभी भी नॉट आउट हो। हालांकि, इसके बाद दिगेंद्र कुमार का उपचार दो-तीन साल तक चलता रहा और बाद में वे अनफिट करार दिए जाने के बाद सेना से रिटायर हो गए। उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया।