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कपिल सिब्बल ने सरकार को घेरा: अध्यादेश के जरिए जजों की संख्या बढ़ाने पर उठाए सवाल, बताया अलोकतांत्रिक
Sat, 23 May 2026 07:25 PM IST
अमन तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Sat, 23 May 2026 07:25 PM IST
सार
पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने अध्यादेश के जरिए जजों की संख्या बढ़ाने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि सरकार को संसद में चर्चा करनी चाहिए थी। सिब्बल ने सरकार पर एजेंसियों के गलत इस्तेमाल का भी आरोप लगाया है। उन्होंने इसे लोकतंत्र के खिलाफ बताया।
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कपिल सिब्बल
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
पूर्व कानून मंत्री और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने शनिवार को केंद्र सरकार के एक फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने सरकार के उस तरीके को गलत बताया जिसके तहत एक अध्यादेश लाकर जजों की संख्या बढ़ाई गई है। सिब्बल ने नई दिल्ली में एक मीडिया वार्ता को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मुद्दे पर संसद में कोई बहस नहीं की। उनके अनुसार, यह कदम भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में पारदर्शिता की कमी को दिखाता है। उन्होंने इसे अलोकतांत्रिक व्यवहार करार दिया।
सिब्बल ने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि साल 1950 में सुप्रीम कोर्ट में केवल सात जज थे। समय के साथ यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई। अब मुख्य न्यायाधीश के अलावा जजों की संख्या 37 तक पहुंच गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक संस्थान के रूप में हम किस दिशा में जा रहे हैं। सिब्बल ने कहा कि जजों की संख्या बढ़ाने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं, वे चिंताजनक हैं।
वरिष्ठ वकील सिब्बल ने मुकदमों की बढ़ती संख्या के लिए सीधे तौर पर सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि सरकार खुद सबसे बड़ी वादी है। ज्यादातर मुकदमे सरकार की वजह से ही शुरू होते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने बहुत कड़े कानून बनाए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीबीआई (CBI) जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल हथियारों की तरह किया जा रहा है। इन वजहों से अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। इसके अलावा जनहित याचिकाओं (PIL) ने भी मुकदमों की संख्या में इजाफा किया है।
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ये भी पढ़ें: NIA का खुलासा: एक ही M-4 कार्बाइन से हुए थे पहलगाम और गगनगीर हमले, बैलिस्टिक जांच में सामने आया ये राज
सिब्बल ने कहा कि अध्यादेश लाने से इस विषय पर संसद में चर्चा का मौका खत्म हो गया है। हमें किस तरह का सुप्रीम कोर्ट चाहिए, इस पर संसद में बहस होनी चाहिए थी। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को इस फैसले से पहले विपक्ष को भरोसे में लेना चाहिए था। साथ ही रिटायर्ड जजों से भी सलाह लेनी चाहिए थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को बातचीत और सहमति के आधार पर काम करना चाहिए। किसी भी पार्टी को केवल अपने आदेश नहीं थोपने चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह अलोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रही, तो इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। यह संस्था की साख पर भी बुरा असर डालता है।
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सिब्बल ने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि साल 1950 में सुप्रीम कोर्ट में केवल सात जज थे। समय के साथ यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई। अब मुख्य न्यायाधीश के अलावा जजों की संख्या 37 तक पहुंच गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि एक संस्थान के रूप में हम किस दिशा में जा रहे हैं। सिब्बल ने कहा कि जजों की संख्या बढ़ाने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं, वे चिंताजनक हैं।
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वरिष्ठ वकील सिब्बल ने मुकदमों की बढ़ती संख्या के लिए सीधे तौर पर सरकार को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि सरकार खुद सबसे बड़ी वादी है। ज्यादातर मुकदमे सरकार की वजह से ही शुरू होते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने बहुत कड़े कानून बनाए हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीबीआई (CBI) जैसी एजेंसियों का इस्तेमाल हथियारों की तरह किया जा रहा है। इन वजहों से अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। इसके अलावा जनहित याचिकाओं (PIL) ने भी मुकदमों की संख्या में इजाफा किया है।
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सिब्बल ने कहा कि अध्यादेश लाने से इस विषय पर संसद में चर्चा का मौका खत्म हो गया है। हमें किस तरह का सुप्रीम कोर्ट चाहिए, इस पर संसद में बहस होनी चाहिए थी। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को इस फैसले से पहले विपक्ष को भरोसे में लेना चाहिए था। साथ ही रिटायर्ड जजों से भी सलाह लेनी चाहिए थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को बातचीत और सहमति के आधार पर काम करना चाहिए। किसी भी पार्टी को केवल अपने आदेश नहीं थोपने चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह अलोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रही, तो इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। यह संस्था की साख पर भी बुरा असर डालता है।