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कानों देखी : राहुल के आगे फिर गुहार लगाएंगे कांग्रेसी तो लालू यादव के घर आए भोले भंडारी!

Tue, 23 Jul 2019 07:53 PM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: शशिधर पाठक Updated Tue, 23 Jul 2019 07:53 PM IST
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Kano Dekhi : Tej Pratap as Lord Shiva and congressmen will again ask Rahul to roll back his resign
राहुल गांधी और तेजप्रताप यादव - फोटो : फाइल फोटो

हाथ में त्रिशूल, त्रिशूल में बंधा डमरू, गले में रुद्राक्ष, माथे पर त्रिपुंड, वेश-भूशा से शिव अवतार। सावन चल रहा है तो शिवलिंग की उपासना में लीन। बताते हैं मां राबड़ी देवी भी उनका रंग-ढंग देखती रह जाती हैं। तेजस्वी का चेहरा तेज प्रताप का तेज देख फीका पड़ जाता है और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) का एक गुट तो हमेशा बाट जोहता रहता है। उसे पता है कि अवतरित होते ही शिव शंकर (तेज प्रताप) राजद की कुर्सी पर विराजमान हो जाएंगे। बताते हैं तेज प्रताप का यह अवतार भाजपा और जद(यू) दोनों को अच्छा लगता है। 

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खराब तबियत, सजा प्राप्त और रिम्स में इलाज करा रहे लालू प्रसाद के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। लालू प्रसाद ने राजनीतिक जीवन में कभी घुटने नहीं टेके, लेकिन उनके घर में धूनी रमाए बैठे भोले भंडारी किसी की नहीं सुनते। थोड़ा बहुत मां राबड़ी की चल जाती है। रट भी एक ही लगाए रहते हैं कि पिता के असली वारिस तो वहीं हैं। यह हालत तब है जब बिहार लोकसभा चुनाव में राजद की एक भी सीट नहीं आई। झारखंड और बिहार विधानसभा चुनाव सिर पर है और पार्टी में सिर फुटौव्वल भी लगातार बढ़ रही है।

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'राहुल गांधी जो चाहते हैं, करें... हम देंगे इस्तीफा'

सीडब्ल्यूसी (कांग्रेस कार्यसमिति) की बैठक को लेकर असमंजस में पड़े कांग्रेसी नेताओं में जान आती दिखाई दे रही है। वरिष्ठ नेता अब एक राय बनाते दिखाई दे रहे हैं। कई कद्दावर नेताओं का मानना है कि अध्यक्ष पद पर सस्पेंस कायम रहने से पार्टी का भारी नुकसान हो रहा है। वैसे भी हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, दिल्ली जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और पार्टी की तैयारी सिफर है। 

ऐसे में कई महासचिवों, सचिवों और अन्य नेताओं की राय बन रही है कि सीडब्ल्यूसी की बैठक जल्द बुलाई जाए। संसद का मौजूदा सत्र खत्म होते ही यह बैठक आहूत हो। इस बैठक में पार्टी के नेता अपना इस्तीफा सौंपकर राहुल से इस्तीफा वापस लेने का अनुरोध करने वाले हैं, ताकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने हिसाब से भविष्य की कांग्रेस का गठन कर सकें। सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद समेत कई नेताओं को यह राय अच्छी लग रही है। देखिए, आगे क्या होता है।

शाह को बर्दाश्त ही नहीं होता

भाजपा अध्यक्ष और देश के गृह मंत्री अमित शाह राज्यसभा सदस्य रहे हैं। उन्होंने सदन की कार्यवाही में भाग लिया और देखा भी है, लेकिन उनसे सदस्यों की टोका-टाकी बर्दाश्त नहीं होती। शाह एक्शन में रहते हैं। भाजपा के एक सांसद की मानें तो जब तक शाह लोकसभा या राज्यसभा में होते हैं, पार्टी का हर सदस्य सहमा और सतर्क रहता है। 

अमित शाह सत्ता पक्ष के सदस्यों की टोका-टाकी या अनावश्यक हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करते। वह उन्हें भी ईशारा करके चुप कराते रहते हैं। कश्मीर में राज्यपाल शासन की अवधि बढ़ाने संबंधी प्रस्ताव पर चर्चा, एनआईए संसोधन विधेयक पर चर्चा या फिर अन्य हो वह अपने अंदाज में रहते हैं। 

मंगलवार को भी विदेश मंत्री एस जयशंकर राज्यसभा में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कश्मीर समस्या के समाधान पर भारत सरकार का पक्ष रख रहे थे, लेकिन विपक्ष  के सांसदों का हंगामा जारी था। इस पर शाह अपनी सीट से खड़े हुए और अपने अंदाज में बोलने लगे। शाह के इस तरीके को विपक्ष ने सरकार की तानाशाही माना और सदन से वॉकआऊट कर गया। 

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अखिलेश यादव के चेहरे से क्यों उड़ी हैं हवाईयां?

यह तो समाजवादी पार्टी के नेताओं को भी समझ में नहीं आ रहा है। पार्टी के एक पूर्व सांसद का कहना है कि मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में पार्टी ने 90 के दशक से आज तक कभी घुटने नहीं टेके। नेता जी ने हमेशा पार्टी और सांसदों, विधायकों, नेताओं का आभामंडल बनाए रखा। अब देख लीजिए। युवा अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के पांच साल की पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री रहे हैं, लेकिन समस्या में पड़े हैं।

सूत्र का कहना है कि वह नेता जी मिलकर अपना दर्द बता चुके हैं, लेकिन नेता जी की स्थिति सबको पता है। उनकी तबियत भी नासाज रहती है। पार्टी की हालत यह है कि सोनभद्र में इतनी बड़ी घटना हो गई, हम चुप बैठे रहे। हमारे राज्यसभा सदस्य तक छोड़कर जा रहे हैं। बताते हैं जब से बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी का साथ छोड़ा है, सपा लगातार प्रदेश की राजनीति में पिछड़ रही है। 

पहले समाजवादी पार्टी फिर बसपा

योगी और मोदी सरकार की एक योजना खूब सुनी जा रही है। खबरची बता रहे हैं कि इस योजना में शीर्ष नेतृत्व ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में पहले समाजवादी पार्टी और फिर बसपा की प्रमुख नेता को निपटाने का फैसला कर लिया है। इस क्रम में माइनिंग घोटाले की आंच प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक पहुंचने की संभावना है। 

मायावती के परिवार पर भी जांच की आंच पहुंच चुकी है। बताते हैं बसपा सुप्रीमों के भाई या भतीजे पर भ्रष्टाचार की जांच से बसपा का जनाधार भले न खिसके, लेकिन समाजवादी पार्टी पर इसका असर पड़ सकता है। इधर केंद्र सरकार ने सुरक्षा की समीक्षा कर अखिलेश यादव की जेड प्लस सुरक्षा को भी वापस ले लिया है। इसको लेकर अखिलेश यादव भी काफी तनाव में बताए जा रहे हैं। 

ममता बनर्जी और पीके की केमिस्ट्री

पश्चिम बंगाल से खबर है कि ममता बनर्जी अब भाजपा को बड़ा मुद्दा नहीं दे रही हैं। ममता बनर्जी के भीतर यह बदलाव चुनाव प्रचार रणनीतिकार प्रशांत किशोर उर्फ पीके की सलाह के बाद आया है। खबर है कि ममता बनर्जी ने पीके की हर सलाह मानने से पहले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी को फोन किया था। जगन मोहन रेड्डी ने ममता को बताया कि पीके का फार्मूला साइंटिफिक रहता है। सलाह भी सही देते हैं, लेकिन चुनाव की तैयारी के लिहाज से। 

जगन ने ममता को मंत्र भी दिया। उन्होंने कहा कि पीके जब राजनीतिज्ञ होकर सलाह देते हैं, तो वहां सावधान रहने की जरूरत है। बाकी सब ठीक है। जगन ने कहा कि पीके की सलाह ने उन्हें आंध्र प्रदेश में सत्ता हासिल करने में काफी सहायता दी है, लेकिन उन्होंने जरूरत भर ही पीके को सुना। काफी कुछ वह अपनी सोच और अपनी टीम से मिले फीडबैक के आधार पर करते रहे हैं। बताते हैं जगन मोहन रेड्डी की सलाह को मानकर ममता बनर्जी अब पीके के फार्मूले पर सौ फीसदी अमल कर रही हैं। 

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