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कानों देखी: अटल जी का देहावसान, प्रधानमंत्री की पैदल चाल, राहुल का राफेल सौदा

Sun, 19 Aug 2018 01:00 PM IST
शशिधर पाठक
शशिधर पाठक Updated Sun, 19 Aug 2018 01:00 PM IST
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Kaano Dekhi: mourning of Atal Bihari Vajpayee and Rafale Deal of Rahul Gandhi
- फोटो : अमर उजाला

अटल जी पंचतत्व में विलीन हो गए। रुग्ण अटल जी को एक दिन जाना ही था, लेकिन उनके प्रति लोगों की श्रद्धा ने भाजपा के हाथ-पांव फूला दिए। अटल के पार्थिव शरीर को 17 अगस्त को उनके 6ए, कृष्णमेनन मार्ग स्थित आवास पर लाया गया। पार्थिव शरीर आने से पहले दिन भर से वहां तैयारियां चल रही थी। मीडिया के लिए दो प्लेटफार्म, पोडियम, वीआईपी, वीवीआईपी के आने, श्रद्धांजलि देने, आम जनों के लिए तैयारी सबकुछ रविशंकर प्रसाद, धर्मेंन्द्र प्रधान, जितेंद्र सिंह, सुधांशु मित्तल, अनिल बलूनी की देख-रेख में हुआ। रात करीब दो बजे तक श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहा।

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अगले दिन सुबह 9 बजे पार्थिव शरीर को भाजपा मुख्यालय लाया गया। पहले प्रधानमंत्री समेत सभी प्रमुख लोगों ने श्रद्धांजलि दी। इसके बाद पार्टी कार्यकर्ताओं की बारी आई। इंतजाम में लगे लोगों को उम्मीद थी सबकुछ दो-तीन घंटे में हो जाएगा, लेकिन अटल की आखिरी झलक पाने के लिए लोगों का तांता लग गया। पार्टी मुख्यालय में इंतजाम था कि एक तरफ से लोग आएंगे, श्रद्धांजलि देंगे, दूसरी तरफ से बाहर निकल जाएंगे। इस तरह से 15-20 सेकेंड में एक आदमी पार्थिव शरीर के पास से बाहर आ जाएगा। लेकिन लोगों की भीड़ और समय का अभाव देखकर वहां से फूल हटाने और अंतिम यात्रा तक शुरू करने की नौबत आ गई।
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....और प्रधानमंत्री चल पड़े पैदल

अटल जी की अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री पैदल ही चल पड़े। उनके साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, अटल जी के दामाद रंजन भट्टाचार्य, राज्यों के मुख्यमंत्री सब चल पड़े। कुछ दूर चलकर राजनाथ जी अपनी गाड़ी में बैठ गए, लेकिन पीएम ने सिलसिला अंत तक जारी रखा। पैदल चल रहे प्रधानमंत्री को देखकर रास्ते में लोगों का हुजूम भी साथ चलने लगा। कारवां लंबा होता गया। इसको लेकर चर्चा खूब है। 
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दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा मुख्यालय से स्मृति स्थल तक गाड़ी में जाना था। एसपीजी ने इसकी पूरी तैयारी कर रखी थी। प्रधानमंत्री की गाड़ी भी तैयार थी, लेकिन वह लोगों की भीड़ के कारण आगे नहीं आ पाई। प्रधानमंत्री गाड़ी में बैठने के लिए बाहर आकर खड़े हो गए। इंतजार किया और फिर अचानक निर्णय ले लिया कि अब वह पैदल चलेंगे। फिर क्या था, सब साथ चलने लगे। इधर एसपीजी का बुरा हाल था। वह सुरक्षा संबंधी खतरे को लेकर तंग थी। इस बीच एसपीजी ने बस आदि का प्रबंध भी किया, लेकिन अंतिम यात्रा में शामिल लोगों की भीड़ ने उसे भी असफल कर दिया। लिहाजा प्रधानमंत्री ने स्मृति स्थल तक की यात्रा पैदल ही पूरी की।

श्रद्धा, उत्सव या मौत में भी सियासत

यह समय ऐसी चर्चा का नहीं है, लेकिन भाजपा और संघ के भीतर यह तमाम लोगों के दिमाग में यह परेशानी, आश्चर्य और सुख का एहसास करा रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की मनोदशा का लोगों को अंदाजा है, लेकिन डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी पर केवल अंदरखाने में चर्चा हो रही है। भाजपा की तीन धरोहर में अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर भी थे। इस समय दोनों से ज्यादा अटल जी का उम्रदराज साथी भी कोई नहीं है। जोशी जी स्मृति स्थल पर मौजूद थे। श्रद्धांजलि भी दी। अटल जी से उनका लगाव था, लेकिन। फिलहाल इस कड़ी की लय टूट गई है। दूसरी चर्चा प्रधानमंत्री के अटल जी को पिता तुल्य बताने, भावुक लेख लिखने को लेकर भी है। 

प्रधानमंत्री के पं. दीन दयाल उपाध्याय से खुद को जोडऩे पर भी खुसफुसाहट है। लोग प्रधानमंत्री जी की जन्म की तारीख और पंडित जी के आखिरी दिन की तारीख का अंतर निकाल रहे हैं। तीसरी चर्चा अटल जी के देहावसान के बाद उनके अस्थिकलश, स्मारक, यादों को सहेजे जाने को लेकर है। अटल जी के अनुयायी चाहते हैं कि 6ए, कृष्ण मेनन को उनका मेमोरियल घोषित कर दिया जाए। लोगों को उम्मीद है कि इसका निर्णय उनकी तेरहवीं से पहले हो जाएगा। दूसरी तरफ भाजपा बड़े पैमाने पर अटल जी की अस्थि कलश यात्रा निकालने की तैयारी कर रही है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहले ही भारी भरकम घोषणा कर रखी है। अब योजना बन रही है कि अटल जी की अस्थियों को देश की सभी प्रमुख नदियों में विसर्जित किया जाए। भाजपा और संघ के तमाम नेता हैरानी और आश्चर्य के साथ इसे अच्छा कदम मान रहे हैं।

माया का गेम प्लान

अगले साल लोकसभा चुनाव प्रस्तावित है। इस साल चार राज्यों का विधानसभा चुनाव। मायावती समय की नजाकत को बखूबी समझ रही हैं। उन्हें पता है कि नई सरकार में जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उतनी ही मजबूत भागेदारी। लिहाजा वह कांग्रेस पार्टी से गठबंधन चाहती हैं, लेकिन इसी के साथ पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक में सीटें भी चाहती हैं। मायावती को इन राज्यों में 32-36 से सीटें चाहिए। कांग्रेस का नजरिया दूसरा है। कांग्रेस के रणनीतिकार चाहते हैं कि पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ का नतीजा आ जाए, इसके बाद लोकसभा की बात हो। रहा सवाल लोकसभा का तो कांग्रेस यूपी की दस सीटें चाहती हैं।

मायावती को इसमें आपत्ति नहीं है, लेकिन दूसरे राज्यों में 32-36 सीटें लेकर इसकी पूरी कीमत वसूल करना चाहती हैं। उन्होंने अपनी यह सूचना सतीश चंद्र मिश्रा के माध्यम से भिजवा दी है। अहमद पटेल और गुलाम नबी आजाद के जरिए यह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के कान में पड़ चुकी है। दरअसल मायावती की कोशिश किसी भी तरह से 50-55 लोकसभा सीटों को पाने पर टिकी है। ताकि वह कांग्रेस के बाद यूपीए में सीट लाने वाली दूसरी नंबर की पार्टी बन सके। माया जानती हैं कि ऐसा होने पर ही दाल गलेगी, वरना राजनीति में तो कोई किसी का स्थायी साथी नहीं होता। 

Kaano Dekhi: mourning of Atal Bihari Vajpayee and Rafale Deal of Rahul Gandhi
लिंचिंग, मारकाट नहीं चलेगी

भाजपा के बड़े नेता लोगों से अपनी व्यथा बताते नहीं थक रहें हैं। अटल युगीन नेता की परेशानी भाजपा में चल रही उठा पटक से है। संघ के एक बड़े पदाधिकारी की मौजूदगी में उन्होंने इस चर्चा को आगे बढ़ाया। संघ के पदाधिकारी ने भी उनकी हां में हां मिलाई। वह कह रहे थे कि अटल जी ने हम सबको संदेश दिया है? यह भारत है। यहां लिंचिंग, मारकाट, नफरत और द्वेष का वातावरण नहीं चलेगा। 

अटल जी के स्नेह प्राप्त नेता का कहना था कि आज देखिए जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कैसे लोग अटल जी के प्रति भाव दिखा रहे हैं। अटल जी ने सबकी सुनी, सबको मिलाकर और सबसे मिलकर राजनीति का मर्यादित धर्म निभाते हुए चले। आज हर दल, हर समाज, हर जाति, हर धर्म उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहा है। इस चार्चा को आगे बढ़ाते हुए संघ के पदाधिकारी ने कॉरपोरेट कल्चर में पल बढ़ रही भाजपा पर नाराजगी जताई। सूत्र ने बताया कि संघ में इसको लेकर काफी चिंता है।

बस राफेल डील

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को राफेल लड़ाकू विमान सौदे का भूत पकड़ चुका है। उन्होंने इसके लिए पार्टी के नेताओं को नये तथ्यों, तर्कों के साथ सामने आने का निर्देश दिया है। पार्टी की सोशल मीडिया टीम को भी इसके बाबत निर्देश दिए जा चुके हैं। राहुल चाहते हैं कि साल के अंत में होने वाले राज्यों के विधानसभा चुनाव में राफेल डील में घोटाले का मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाए। 

राफेल के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष ने भाजपा के नेताओं और केंद्र सरकार के भीतर का भ्रष्टाचार का मुद्दा जोर-शोर से उठाने का निर्णय लिया है। पार्टी के एक सूत्र की माने तो कांग्रेस ने 15 अगस्त के बाद से मोदी सरकार पर जोरदार हमले का प्लान बनाया था, लेकिन अटल जी के देहावसान के कारण अब इसे सितंबर महीने से धार देने की योजना है। 

अखिलेश की छटपटाहट

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की छटपटाहट बढ़ रही है। अखिलेश की छटपटाहट बढ़ने के दो बड़े कारण हैं। पहला तो यह कि मायावती खामोश हैं। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हैं। दूसरा जनता दल समाजवादी परिवार से समाजवादी पार्टी कटती जा रही है। वाम दल अवसान की तरफ हैं। तृणमूल, एनसीपी, एनसी, बीएसपी, राजद समेत सब कांग्रेस पार्टी की तरफ चक्कर काट रही हैं। यहां तक तो ठीक है। गड़बड़ यह है कि समाजवादी पार्टी, उसके नेता, पार्टी के महत्व को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। 
समाजवादी पार्टी के पुराने नेताओं का भी मानना है कि यूपी का ताकतवर राजनीतिक दल कभी भी इस तरह से हाशिए पर नहीं रहा है। शिवपाल खेमा भी इसे लगातार हवा दे रहा है। बूढ़े और करीब-करीब अस्वस्थ से मुलायम को भी इसका एहसास हो रहा है। पार्टी का मीडिया और प्रचार तंत्र भी सुस्त पड़ा है। समाजवादी पार्टी के नई दिल्ली स्थित कार्यालय में भी एक गहरी खामोशी चल रही है। कहीं न कहीं यह सब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व पर भी सवाल ही माना जा रहा है।

राहुल से बात कीजिए

सोनिया गांधी का नया अवतार कई राजनीतिक दलों को कम रास आ रहा है। पार्टी के सीनियर नेता भी हैरान हैं। उन नेताओं को भी परेशानी हो रही है, जो कभी सोनिया गांधी से जब चाहते थे मिलते थे। राजनीतिक घटनाक्रम, बदलाव, निर्णय पर चर्चा करते थे। संसद भवन में लोकसभा में भी आसानी से सोनिया गांधी से अपनी बात कह लेते थे। अब जब भी वह कोई पहल करते हैं, सोनिया गांधी अपने कदम पीछे खींच लेती हैं। वह राहुल गांधी से बात करने के लिए कह देती हैं। 

दरअसल सोनिया गांधी अब केवल विपक्षी दलों की एकता पर काम करना चाहती हैं। वह इसके अलावा पार्टी की अंदरुनी राजनीति से लेकर कांग्रेस पार्टी के स्तर पर लिए जाने वाले किसी निर्णय में खुद को शामिल करके राहुल का ओहदा नहीं गिराना चाहती। वह राजनीतिक दलों के नेताओं से भी यही उम्मीद कर रही हैं कि वह कांग्रेस के साथ तालमेल से हर मुद्दे पर पहले राहुल गांधी से मिलें, चर्चा करें। बात आगे बढ़ाएं। वह पहले भी कह चुकी हैं कांग्रेस में उनके बॉस राहुल हैं।
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