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SC: जस्टिस यशवंत वर्मा ने लगाई 'सुप्रीम' अर्जी; नकदी मामले में महाभियोग की सिफारिश को लेकर किया कोर्ट का रुख

Fri, 18 Jul 2025 08:25 AM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Fri, 18 Jul 2025 08:25 AM IST
सार

घटनाक्रम संसद के मानसून सत्र से कुछ दिन पहले हुआ। संभावना जताई जा रही है कि संसद के मानसून सत्र के दौरान केंद्र सरकार की ओर से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जा सकता है।

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Justice Yashwant Varma approaches Supreme Court over impeachment move in cash haul case
जस्टिस यशवंत वर्मा केस। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने आंतरिक जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने तीन न्यायाधीशों की आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट और पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश को चुनौती दी है। न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा है कि आंतरिक जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट देने से पहले उन्हें जवाब देने का उचित अवसर नहीं दिया।

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दिल्ली में उनके सरकारी आवास से भारी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद की गई थी। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक आंतरिक समिति का गठन किया था, जिसने मामले की जांच की थी। जांच में उनके खिलाफ मजबूत सबूत पाए गए थे और उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही की सिफारिश की गई थी।
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क्या है मामला?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने आंतरिक जांच पैनल की उस रिपोर्ट को अमान्य ठहराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है, जिसमें उन्हें नकदी बरामदगी मामले में दोषी पाया गया था। जस्टिस वर्मा ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की ओर से 8 मई को संसद से उनके खिलाफ महाभियोग चलाने का आग्रह करने वाली सिफारिश को रद्द करने की मांग की है। सरकार 21 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में वर्मा को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की योजना बना रही है।
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'निष्कर्ष पहले से ही कल्पना की गई कहानी पर आधारित थे'
अपनी याचिका में न्यायमूर्ति वर्मा ने दलील दी कि जांच गंभीरता से नहीं गई। ऐसे में उन्हें अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करने और उन्हें गलत साबित करने की आवश्यकता हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि पैनल के निष्कर्ष पहले से ही कल्पना की गई कहानी पर आधारित थे। न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि जांच की समय-सीमा केवल प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की कीमत पर और कार्यवाही को जल्द से जल्द से समाप्त करने की इच्छा से प्रेरित थी।

याचिका में क्या तर्क दिया गया?
याचिका में तर्क दिया गया है कि जांच पैनल ने उन्हें पूरी और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर दिए बिना ही फैसला सुना दिया। याचिका को अभी सुनवाई के लिए किसी पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जाना है। घटना की जांच कर रहे पैनल की रिपोर्ट में कहा गया था कि न्यायमूर्ति वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों का उस स्टोर रूम पर नियंत्रण था, जहां से भारी मात्रा में अधजली नकदी मिली थी। इससे उनके कदाचार का सबूत मिलता है, जो इतना गंभीर है कि उन्हें हटाया जाना चाहिए।

तीन न्यायाधीशों के पैनल ने जांच की थी
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू की अध्यक्षता वाले तीन न्यायाधीशों के पैनल ने 10 दिनों तक जांच की। इस दौरान 55 गवाहों से पूछताछ की गई और 14 मार्च की रात लगभग 11.35 बजे न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर लगी आकस्मिक आग वाले घटनास्थल का दौरा किया। जस्टिस वर्मा उस समय दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे और अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कार्यरत हैं।


महाभियोग चलाने की सिफारिश की थी
इस रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग चलाने की सिफारिश की थी।
 

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