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Justice S Muralidhar: क्रिमिनल लॉ विशेषज्ञ.. नीली मारुति वैन में चैंबर; दिल्ली दंगे के समय आधी रात लगाई अदालत
Sun, 27 Jul 2025 04:38 PM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sun, 27 Jul 2025 04:38 PM IST
सार
जस्टिस डॉ. एस. मुरलीधर बॉम्बे हाईकोर्ट से बरी हुए 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन हमलों के आरोपियों की पैरवी करने के लिए चर्चा में हैं। इन्होंने उड़ीसा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्ति के बाद, सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेकर वकालत फिर शुरू की है। जानिए इनका व्यक्तित्व कैसा है
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जस्टिस डॉ एस मुरलीधर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
डॉ जस्टिस एस मुरलीधर क्रिमिनल लॉ के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने तीन विश्वविद्यालयों से कानून की पढ़ाई की है, तो तीन उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश भी रहे हैं। माई लॉर्ड जैसे संबोधन पर रोक लगाने वाले जस्टिस एस मुरलीधर तीखी टिप्पणियों व विवादित मसलों पर फैसले देने की वजह से सुर्खियों में रहे हैं।
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छात्र जीवन में मूट कोर्ट रहा हो अथवा पेशेवर जिंदगी में वकील, न्यायाधीश और फिर वकील, सभी भूमिकाओं में जस्टिस डॉ. एस मुरलीधर सुर्खियों में ही रहे हैं। न्यायमूर्ति मुरलीधर देश के उन चुनिंदा न्यायाधीशों में से एक हैं, जिन्होंने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त होने के बाद फिर सक्रिय रूप से वकालत शुरू की है। चार दशक से अधिक समय से कानूनी पेशे से जुड़े जस्टिस मुरलीधर ने चेन्नई से लेकर शीर्ष अदालत तक कई अहम मामलो में पैरोकारी की है, तो करीब सत्रह वर्ष तक न्यायाधीश का दायित्व भी निभाया। माई लॉर्ड जैसे औपनिवेशिक काल के संबोधनों को अपनी अदालत में प्रतिबंधित करने, कई मामलों में निःशुल्क पैरवी करने के लिए जहां जस्टिस मुरलीधर की प्रशंसा होती है, तो कुछ विवादित मामलों में की गई तीखी टिप्पणियों तथा फैसलों के लिए उनकी आलोचना भी होती है।
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शुरुआत
जस्टिस एस मुरलीधर अगले महीने आठ अगस्त को चौसठ वर्ष के होने जा रहे हैं। उन्होंने 1981 में मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध विवेकानंद कॉलेज से प्रथम श्रेणी में बीएसएसी (केमिस्ट्री) किया है। यहीं से उन्होंने कानून में स्नातक भी किया। उन्होंने 1990 में नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलएम व 2003 में डीयू से ‘लीगल एड एंड क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम इन इंडिया’ विषय पर पीएचडी की उपाधि हासिल की है। उन्हें कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कई पुरस्कार और पदक भी मिले हैं। 1984 में वाशिंगटन, डीसी में हुई 25वीं फिलिफ सी जेसप इंटरनेशन लॉ मूट कोर्ट प्रतियोगिता में भी उन्होंने हिस्सा लिया था।
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नीली मारुति वैन को बनाया चैंबर
जस्टिस मुरलीधर ने पत्रकार, मानवाधिकार एक्टिविस्ट और प्रौद्योगिकी कानून व गोपनीयता अधिकार विशेषज्ञ उषा रामनाथन से शादी की है। संयोग से दोनों पति-पत्नी मद्रास, नागपुर और दिल्ली विश्वविद्यालयों में पढ़े हैं। उन्होंने वकालत के दौरान नीले रंग की ओमनी मारुति वैन को ही अपना चैंबर बना रखा था, जो सुप्रीम कोर्ट की पार्किंग में खड़ी रहती थी।
किताब भी लिखी
जस्टिस मुरलीधर ने लॉ, पॉवर्टी एंड लीगल एड : एक्सेस टू क्रिमिनल जस्टिस नाम से पुस्तक लिखी है। फिटनेस फ्रीक (स्वास्थ्य के प्रति सजग) के रूप में पहचाने जाने वाले जस्टिस मुरलीधर की दिनचर्या में लोधी गार्डन व उसके आसपास सुबह की सैर तथा जॉगिंग करना और हर रविवार को साइकिल चलाना शामिल है।
फिर बने वकील
जस्टिस एस मुरलीधर ने स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद वर्ष 1984 में मद्रास (अब चेन्नई) में वकालत की शुरुआत की थी, लेकिन वह 1987 में दिल्ली आ गए और यहां हाईकोर्ट में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल जी रमास्वामी, जो बाद में भारत में महान्यायवादी बने, के मार्गदर्शन में प्रैक्टिस की। बाद में वह 29 मई, 2006 को दिल्ली हाईकोर्ट में जज नियुक्त हुए और फरवरी 2020 तक पदस्थ रहे। इसके बाद उनका तबादला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट हो गया, जहां वह एक साल से भी कम समय तक रहे। जस्टिस मुरलीधर ने चार जनवरी, 2021 को उड़ीसा हाईकोर्ट के 32वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली और सात अगस्त, 2023 को सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने फिर से वकालत करने का निर्णय लिया, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अनुमति प्रदान की।
आधी रात को लगाई अदालत
फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध में पूर्वी दिल्ली में हिंसा भड़क उठी, जिसमें कई लोग घायल हो गए। इस मामले में जस्टिस एस मुरलीधर ने रात के करीब 12:30 बजे अपने निवास पर ही अदालत लगाकर सुनवाई की और दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई। उन्होंने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि हम दिल्ली में दूसरी 1984 की घटना नहीं होने दे सकते। दिल्ली पुलिस और व्यक्ति विशेष को लेकर की गई उनकी टिप्पणियों की काफी आलोचना भी हुई। इसके कुछ दिन बाद ही जस्टिस मुरलीधर को दिल्ली से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में तबादला करने का आदेश जारी हो गया।
तो आज सुप्रीम कोर्ट में होते जज
जस्टिस एस मुरलीधर जब 2023 में उड़ीसा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हुए, तो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर, जाने-माने न्यायविद वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन और वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू ने संयुक्त रूप से एक लेख लिखकर उन्हें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत करने के लिए विचार नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम पर सवाल उठाया था। यदि वह सुप्रीम कोर्ट के जज बन जाते, तो उनका कार्यकाल अगस्त 2026 तक होता। जस्टिस मुरलीधर क्रिमिनल लॉ के विशेषज्ञ माने जाते हैं।