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बाल हिंसा पर बोले जस्टिस मदन लोकुर, ‘साइलेंट विक्टम’ हैं बच्चे'
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 13 Sep 2018 10:16 PM IST
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मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी लोकुर का कहना है कि बच्चों के खिलाफ हिंसा मामलों में नया ट्रेंड सामने आ रहा है। उन्होंने कहा कि इंटरनेट ट्रॉलिंग बाल हिंसा का एक नया ट्रेंड है, जो वाकई चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि मुजफ्फरपुर के बाद देवरिया और दूसरे शहरों के शेल्टर होम में बाल हिंसा के मामले बढ़ना चौंकाने वाला है।
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इंटरनेट स्टॉकिंग नया ट्रेंड
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और चाइल्ड फंड के सहयोग से तैयार ‘हैंडबुक फॉर एंडिग वॉयलेंस अगेंस्ट चिल्ड्रन’ के लोकापर्ण पर बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा कि पिछले कुछ मामलों में बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामले बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों में शारीरिक हिंसा के साथ मानसिक हिंसा में भी बढ़ोतरी हुई है। बच्चों के खिलाफ साइकोक्राइम, इंटरनेट स्टॉकिंग, पोर्नोग्राफी वीडियोज भेजने के कई मामले सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि शारीरिक हिंसा के मुकाबले मानसिक हिंसा काफी खतरनाक है।
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समझें बच्चों की समस्याएं
जस्टिस लोकुर ने साइकोलॉजिकल वॉयलेंस पर बोलते हुए कहा कि अगर हम अपने स्कूल के दिनों में वापस जाएं, तो हमारे स्कूल-कालेजों के दिनों में 10 से 15 दोस्त होते थे। लेकिन आज के वक्त में हमारी जिंदगी में दोस्तों की संख्या कहीं ज्यादा है। हम अपनी निजी समस्याओं के बारे में एक-दूसरे से बात कर लेते हैं और शायद हल भी ढूंढ लेते हैं। लेकिन एक बच्चा या बालिका जो बाल सरंक्षण गृह में रहता है, जिसे बाहर जाने की इजाजत नहीं है, वह अपनी समस्याओं के बारे में किससे बात करे। दूसरे साथी से अपनी समस्या के बारे में बात नहीं कर सकता क्योंकि वह भी उसी समस्या से पीड़ित है। उन्होंने कहा कि बच्चे ‘साइलेंट विक्टम’ हैं, जो हिंसा के खिलाफ अपनी आवाज भी नहीं उठा सकते।
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खुल कर करनी होगी बात
जस्टिस लोकुर के मुताबिक हमें बच्चों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए सोशल मीडिया यहां तक कि सामाजिक समारोह में भी खुल कर बात करनी होगी। उन्होंने कहा जब तक हम बात करना शुरू नहीं करेंगे, समस्या जस की तस बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि कि जब हम इस मुद्दे पर बातचीत शुरू करेंगे, तभी नीति निर्माताओं तक यह बात पहुंचेगी।
रोज 11 बच्चियों के साथ यौन शोषण
प्रतिकात्मक तस्वीर
वहीं इस हैंडबुक की सीनियर रिसर्च फैलो सौम्या कपूर मेहता का कहना है कि हर चार में से तीन बच्चे हिंसा का शिकार हो रहे हैं। रोजाना तकरीबन 11 बच्चियों के साथ यौन शोषण के मामले सामने आते हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन मामलों से निबटने के लिए हमारे पास कोई कारगर उपाय नहीं है। एनसीआरबी के डाटा के मुताबिक 2014 से 2016 के बीच बच्चों के खिलाफ हिंसा में 23 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। उन्होंने कहा कि बच्चों के खिलाफ हिंसा तभी शुरू हो जाती है जब घर में मां घरेलु हिंसा की शिकार होती है, जिसका बच्चों पर नकारात्मक मानसिक प्रभाव पड़ता है।
गौरतलब है कि 2014 में देश के 19 शहरों में बच्चों के साथ हिंसा के 15 हजार 541 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2016 में 23 फीसदी की रफ्तार से बढ़ कर 19 हजार तक पहुंच गए। बड़े शहरों के मुकाबले अकेले दिल्ली में ही बच्चों के खिलाफ हिंसा के 40 फीसदी मामले दर्ज किए गए। लखनऊ में बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामलों में तीन गुना की बढ़ोतरी हुई, वहीं पुणे में यह मामले दोगुने हो गए। जबकि मुंबई और पटना में बच्चों के खिलाफ हिंसा को लेकर डेढ़ गुना की वृद्धि दर्ज की गई।
गौरतलब है कि 2014 में देश के 19 शहरों में बच्चों के साथ हिंसा के 15 हजार 541 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2016 में 23 फीसदी की रफ्तार से बढ़ कर 19 हजार तक पहुंच गए। बड़े शहरों के मुकाबले अकेले दिल्ली में ही बच्चों के खिलाफ हिंसा के 40 फीसदी मामले दर्ज किए गए। लखनऊ में बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामलों में तीन गुना की बढ़ोतरी हुई, वहीं पुणे में यह मामले दोगुने हो गए। जबकि मुंबई और पटना में बच्चों के खिलाफ हिंसा को लेकर डेढ़ गुना की वृद्धि दर्ज की गई।